Vrat Katha
एकादशी व्रत कथा
एकादशी व्रत कथाएँ
एकादशी व्रत हर महीने दो बार, हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि (एकादशी) को रखा जाता है—एक बार शुक्ल पक्ष में (जब चंद्रमा बढ़ता है) और एक बार कृष्ण पक्ष में (जब चंद्रमा घटता है)। यह व्रत खासतौर पर भगवान विष्णु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। एकादशी व्रत को तीन दिन की प्रक्रिया के रूप में माना जाता है। व्रत से एक दिन पहले, यानी दशमी को दोपहर में एक बार हल्का और सात्त्विक भोजन लिया जाता है ताकि एकादशी के दिन पेट में कोई अन्न न बचा हो। एकादशी के दिन, व्रती कठोर उपवास करते हैं और दिनभर भगवान विष्णु की पूजा, भजन और ध्यान करते हैं। इस दिन चावल, गेहूं, दाल, मसूर, प्याज, लहसुन जैसी चीज़ें नहीं खाई जातीं। अगले दिन, यानी द्वादशी को सूर्योदय के बाद व्रत खोला जाता है।
एकादशी व्रत के कई तरीके होते हैं, जिन्हें हम अपनी शक्ति और श्रद्धा के अनुसार चुन सकते हैं। जैसे – बिल्कुल पानी नहीं पीना (निर्जल व्रत),या सिर्फ पानी पीना, फलाहार लेना (जैसे फल, दूध या मेवे), या फिर एक बार नमक रहित हल्का भोजन करना।
ध्यान रखें, व्रत किस प्रकार का करना है हमें यह पहले ही संकल्प ले लेना चाहिए।
एकादशी व्रत कैसे करें?
एकादशी व्रत से एक दिन पहले दशमी को प्याज़, मांस, मसूर जैसी चीज़ें नहीं खानी चाहिए। व्रत के दिन कृत्रिम टूथपेस्ट या दातून का उपयोग न करें, उसकी जगह नींबू, जामुन या आम की पत्तियों से मुँह साफ करें या जल से कुल्ला करें। इस दिन पेड़ों से पत्ते तोड़ना, झाड़ू लगाना, ज़्यादा बोलना, बाल कटवाना और झूठ बोलना वर्जित माना गया है। दूसरों के घर का भोजन नहीं लेना चाहिए और फल जैसे आम, अंगूर, केला या बादाम प्रभु को भोग लगाकर ही ग्रहण करना चाहिए।
स्नान करने के बाद भगवान विष्णु के सामने बैठें, गीता का पाठ करें और मन ही मन यह संकल्प लें कि
- किसी को कटु वचन नहीं कहूंगा
- गाय, ब्राह्मण आदि को फल व भोजन अर्पित करूंगा
कभी भी किसी का अपमान न करें। एकादशी का सच्चा रूप है मीठा बोलना, सबको क्षमा करना और धैर्य रखना।
जो भक्त इन नियमों के साथ व्रत करता है, उसे भगवान का आशीर्वाद मिलता है।
अगर भूल से किसी से कठोर बात कह दी हो, तो सूर्य देव को प्रणाम करें और भगवान विष्णु से क्षमा माँगें।
एकादशी व्रत पूजन सामग्री
भगवान विष्णु बिना तुलसी के भोग स्वीकार नहीं करते, इसलिए तुलसी अवश्य अर्पित करें।
पूजा में उपयोग की जाने वाली अन्य वस्तुएं इस प्रकार हैं:
- पंचामृत – दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
- पीले रंग के फूल – जैसे गेंदा या कोई भी अन्य पीला फूल
- दूर्वा
- आम के पत्ते
- पवित्र कुशा
- कुमकुम एवं हल्दी
- धूपबत्ती, दीपक और कपूर
- नारियल
- चंदन का लेप
- मिठाई (प्रसाद हेतु)
यदि इनमें से कोई सामग्री उपलब्ध न हो, तो उसकी जगह अक्षत (साफ-सुथरे चावल) से पूजन किया जा सकता है।
एकादशी व्रत रखने से क्या मिलते हैं लाभ?
ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार
- एकादशी व्रत इतना खास है कि यह देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना गया है।
- यह व्रत भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम को पाने का मार्ग है और तप करने वालों का सबसे श्रेष्ठ व्रत है।
- जैसे श्रीकृष्ण सब देवों में सबसे श्रेष्ठ हैं, वैसे ही एकादशी व्रत सभी व्रतों में सबसे ऊँचा माना गया है।
- इस दिन चावल, दाल, लहसुन, प्याज खाना पाप माना गया है।
- सिर्फ एकादशी का व्रत रखने से भी व्यक्ति को वैकुण्ठ (भगवान का धाम) मिल सकता है।
- सालभर में कई एकादशी आती हैं और हर एक का अलग पुण्य और लाभ होता है।
एकादशी व्रत के वैज्ञानिक लाभ
- उपवास से शरीर को आराम मिलता है, जैसे मशीन को आराम चाहिए होता है।
- फैट घटाता है और मेटाबॉलिज्म सुधारता है।
- ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल संतुलित रहते हैं।
- शरीर हल्का और फुर्तीला महसूस करता है।
- पाचन तंत्र को आराम मिलता है।
- नींद बेहतर होती है।
करें इन मंत्रों का जप
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
- ॐ विष्णवे नमः
- ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात:
- ॐ नारायणाय नम:।।
एकादशी व्रत का उद्यापन
एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका विधिपूर्वक उद्यापन किया जाए। उद्यापन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद किया जाता है। इस दिन व्रती स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें तुलसी दल अर्पित करते हैं और व्रत की पूर्णता के लिए आभार व्यक्त करते हैं। पूजा के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराना, वस्त्र, अन्न और दक्षिणा का दान देना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके पश्चात व्रती स्वयं व्रत खोलते हैं।
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