Ekadashi
परिवर्तिनी एकादशी
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने पूछा
हे जनार्दन! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या माहात्म्य है? कृपया उसका वर्णन कीजिए।
भगवान श्रीकृष्ण बोले
राजन्! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी परिवर्तिनी नाम से विख्यात है। यह अत्यन्त पुण्य देने वाली और पापों का नाश करने वाली है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा करनी चाहिए।
प्राचीन काल में बलि नाम के एक महान दानी और पराक्रमी राजा थे। वे असुरों के राजा थे, परन्तु धर्मपरायण और सत्यवादी थे। उन्होंने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में गए।
तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया। वे एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुँचे। राजा बलि ने उनका आदर किया और दान माँगने को कहा।
भगवान वामन ने तीन पग भूमि माँगी। गुरु शुक्राचार्य ने बलि को सावधान किया, परन्तु बलि ने अपना वचन निभाया और तीन पग भूमि देने का संकल्प कर लिया।
तब भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी को नाप लिया, दूसरे पग में आकाश को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान शेष नहीं रहा। तब राजा बलि ने अपना सिर प्रस्तुत किया। भगवान ने तीसरा पग उनके सिर पर रख दिया और उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया।
राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे। उसी समय से भगवान क्षीरसागर में शयन करते हैं और भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन करवट बदलते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण बोले
राजन्! जो मनुष्य इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु का पूजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इस दिन दान, जप, तप और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। विशेष रूप से भगवान वामन की पूजा करने से मनुष्य को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
इस एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। अंत में वह विष्णु लोक को प्राप्त होता है।
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