पूर्णिमा व्रत कथा

पूर्णिमा व्रत कथा

हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है, लेकिन शरद पूर्णिमा की बात करें तो इसका महत्व सबसे अधिक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ तिथि को माता लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे माता लक्ष्मी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों को धन, वैभव और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन करना अति शुभ माना जाता है। इसके साथ यदि श्रद्धा से शरद पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ किया जाए, तो व्रत का पुण्यफल और भी बढ़ जाता है। आइए जानें शरद पूर्णिमा की संपूर्ण व्रत कथा और इसका धार्मिक महत्व।

पूर्णिमा व्रत कथा

द्वापर युग की बात है। एक दिन यशोदा माता ने श्रीकृष्ण से पूछा –

“हे कृष्ण! तुम ही संसार के रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हो। ऐसा कोई व्रत बताओ जिससे इस धरती पर स्त्रियाँ सदा सुहागन रहें और किसी को विधवा होने का दुःख न भोगना पड़े। साथ ही वह व्रत सबकी मनोकामनाएँ पूरी करने वाला हो।”

श्रीकृष्ण ने कहा – “हे माता! यह बहुत शुभ प्रश्न है। मैं तुम्हें एक ऐसा व्रत बताता हूँ, जो स्त्रियों को अचल सौभाग्य, सुख और संतान देता है। इस व्रत का नाम है – बत्तीस पूर्णिमा व्रत। इस व्रत को करने से स्त्रियों को सुख, समृद्धि, संतान और शिवजी की कृपा मिलती है।”

यशोदा जी ने फिर पूछा – “इस व्रत को सबसे पहले किसने किया था? कृपया पूरी कथा विस्तार से बताइए।”

श्रीकृष्ण ने कहा – “पृथ्वी पर एक नगरी थी जिसका नाम था कातिका। वहाँ चंद्रहास नाम के राजा का राज्य था। उसी नगर में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों बहुत धर्मात्मा और सुखी थे, उनके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उन्हें संतान नहीं थी। इसी कारण वे दोनों बहुत दुखी रहते थे।

एक दिन एक योगी उस नगर में आया। वह रोज़ गंगा किनारे जाकर भोजन करता, लेकिन वह धनेश्वर के घर से भिक्षा नहीं लेता था। यह देखकर धनेश्वर ने एक दिन पूछा –

‘हे योगी! आप सभी घरों से भिक्षा लेते हैं, पर मेरे घर से क्यों नहीं?’

योगी ने उत्तर दिया – ‘हे ब्राह्मण! संतानहीन गृहस्थ से भिक्षा लेना तप और धर्म के विरुद्ध माना गया है। जब तुम्हारे घर संतान होगी, तभी मैं तुम्हारे घर से भिक्षा लूँगा।’

धनेश्वर यह सुनकर बहुत दुखी हुआ और योगी के चरणों में गिरकर बोला – ‘हे प्रभु! मेरी सहायता करें, मुझे संतान प्राप्ति का उपाय बताइए। मेरे घर में धन है, पर संतान के बिना जीवन अधूरा है।’

योगी ने कहा – ‘तुम माँ चंडी की आराधना करो और एकांत में उपवास रखो। वह प्रसन्न होंगी तो तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।’

धनेश्वर ने घर जाकर यह बात पत्नी को बताई और फिर वन में जाकर चंडी देवी की तपस्या में लग गया। उसने लगातार 16 दिन तक उपवास किया और माँ चंडी का ध्यान किया।

16वें दिन माँ चंडी ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा – “हे धनेश्वर! तुम धन्य हो। तुम्हें पुत्र होगा, लेकिन उसकी आयु 16 वर्ष होगी। अगर तुम और तुम्हारी पत्नी 32 पूर्णिमाओं का व्रत करोगे और शिवजी का पूजन करोगे, तो वह दीर्घायु होगा। पूरी श्रद्धा से घी के दीपक जलाना, और एक भी पूर्णिमा न छोड़ना। इसके बाद सुबह उठकर एक आम के पेड़ से फल तोड़कर पत्नी को देना। वह फल खाकर गर्भ धारण करेगी।”

सुबह होते ही धनेश्वर को वह आम का पेड़ दिखाई दिया। वह पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन सफल नहीं हो पा रहा था। तब उसने भगवान गणेश का ध्यान किया – “हे विघ्नहर्ता! कृपा करें कि मैं इस पेड़ पर चढ़कर फल ला सकूं।”

गणेशजी की कृपा से वह फल लेकर घर आया। उसकी पत्नी ने स्नान कर शिवजी का ध्यान किया और फल खा लिया। कुछ समय बाद वह गर्भवती हो गई और फिर एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। उन्होंने उसका नाम रखा – देवीदास।

देवीदास सुंदर, सुशील और विद्वान था। माता-पिता ने पूरे विश्वास से 32 पूर्णिमा का व्रत करना शुरू कर दिया। लेकिन जब देवीदास 16 साल का होने वाला था, तो माता-पिता चिंतित हो उठे। उन्होंने अपने बेटे को काशी भेजने का निर्णय लिया ताकि उसके सामने कोई अनहोनी न हो।

देवीदास अपने मामा के साथ काशी के लिए निकल पड़ा। रास्ते में वे एक गांव में रुके जहाँ एक ब्राह्मण की कन्या का विवाह हो रहा था। विवाह के समय अचानक वर बीमार हो गया। लड़की के पिता ने कहा – “यह युवक (देवीदास) मेरे बेटे जैसा है, क्यों न इसका विवाह मेरी बेटी से करवा दें?”

मामा ने कुछ शर्तों के साथ विवाह के लिए हाँ कर दी। शादी हो गई। लेकिन देवीदास बहुत चिंतित था। उसने अपनी पत्नी को सच्चाई बता दी – “मेरी आयु बहुत कम है, मैं ज्यादा दिन नहीं जी पाऊँगा।”

उसकी पत्नी ने कहा – “मैंने तुम्हें पति रूप में स्वीकार किया है, तुम्हारी ही रहूँगी।”

देवीदास ने पत्नी को एक अंगूठी और रुमाल देकर कहा – “एक बगिया बनाना, उसमें एक सफेद फूल (नव मल्लिका) लगाना। जिस दिन फूल सूखे, समझना मेरी मृत्यु हो गई। और जिस दिन वह हरा हो जाए, समझना मैं जीवित हो गया।”

फिर देवीदास काशी चला गया।

कुछ समय बाद, एक साँप देवीदास को डसने आया लेकिन व्रत के प्रभाव से कुछ नहीं हुआ। इसके बाद यमराज पहुँचे, लेकिन तभी माता पार्वती और गणेशजी वहाँ आए। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की –

“इसकी माता ने 32 पूर्णिमाएँ पूरी की हैं, कृपा कर इसे जीवनदान दीजिए।” भगवान शिव ने उसे जीवनदान दे दिया।

उधर उसकी पत्नी ने देखा कि बगिया का फूल सूख गया है, लेकिन कुछ समय बाद वह फिर हरा हो गया। वह जान गई कि उसका पति जीवित है।

फिर देवीदास अपने मामा के साथ लौट आया। रास्ते में ससुराल के लोग मिल गए। सबने खुशी से उसका स्वागत किया और अपनी बेटी को सौंप दिया। देवीदास अपनी पत्नी के साथ अपने घर लौट आया।

जब माता-पिता को यह समाचार मिला तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब देवीदास ने आकर उनके चरण छुए, तो माता-पिता की आंखों में आँसू आ गए। उन्होंने पुत्र को गले से लगा लिया और ब्राह्मणों को खूब दान-दक्षिणा दी।

श्रीकृष्ण ने अंत में कहा –

“जो भी स्त्रियाँ बत्तीस पूर्णिमा व्रत करती हैं, उन्हें संतान, सुख, दीर्घायु पति, और अचल सौभाग्य प्राप्त होता है। यह व्रत सभी मनोकामनाएँ पूरी करने वाला और भगवान शिव की विशेष कृपा दिलाने वाला है।”

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