संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
संकष्टी चतुर्थी व्रत: महत्व और पूजा
हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर महीने के कृष्ण पक्ष (पूर्णिमा के बाद) की चतुर्थी तिथि को ‘संकष्टी चतुर्थी’ का व्रत किया जाता है। संकष्टी का अर्थ है ‘संकटों को हरने वाली’। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है और रात में चंद्रमा के दर्शन व अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु का विवाह माता लक्ष्मी के साथ तय हुआ। विवाह की भव्य तैयारियां शुरू हो गईं और सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया, परंतु किसी कारणवश भगवान गणेश को अलग से निमंत्रण नहीं दिया गया। जब बारात प्रस्थान करने वाली थी, तो सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ आ गए, लेकिन गणेश जी वहां नहीं थे। देवताओं ने आपस में चर्चा की कि क्या गणेश जी को नहीं बुलाया गया है?
इस विषय पर भगवान विष्णु से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भगवान शिव को निमंत्रण भेजा गया है, यदि गणेश जी आना चाहते तो पिता के साथ आ सकते थे। देवताओं ने यह भी तर्क दिया कि गणेश जी का भोजन बहुत अधिक है (उन्हें सवा मन चावल, सवा मन मूंग, सवा मन घी और सवा मन लड्डू चाहिए) और उनका वाहन चूहा भी बहुत धीमा चलता है, जिससे वे बारात में बहुत पीछे रह जाएंगे। अंत में यह तय हुआ कि यदि गणेश जी आ भी गए, तो उन्हें घर की रखवाली के लिए द्वारपाल बनाकर दरवाजे पर ही बैठा दिया जाएगा। जब गणेश जी वहां पहुंचे, तो उन्हें मीठी-मीठी बातों में उलझाकर दरवाजे पर बैठा दिया गया और बारात आगे बढ़ गई।
गणेश जी को इस बात से बहुत दुःख हुआ। उसी समय देवर्षि नारद वहां से गुजरे और गणेश जी को दरवाजे पर बैठे देखकर कारण पूछा। गणेश जी ने अपने अपमान की पूरी बात बताई। तब नारद मुनि ने उन्हें सुझाव दिया कि वे अपनी मूषक (चूहों की) सेना को बारात के आगे भेज दें ताकि वे रास्ता खोदकर खोखला कर दें। गणेश जी ने ऐसा ही किया। जब बारात उस रास्ते से गुजरी, तो सभी देवताओं के रथों के पहिए मिट्टी में धंस गए और लाख कोशिशों के बाद भी बाहर नहीं निकले।
जब कोई उपाय काम नहीं आया और रथों के पहिए टूट-फूट गए, तब नारद मुनि ने देवताओं को बताया कि यह सब भगवान गणेश का अपमान करने का परिणाम है। जब तक उन्हें आदर-सत्कार के साथ नहीं मनाया जाएगा, यह बारात आगे नहीं बढ़ सकेगी। यह सुनकर भगवान शिव ने अपने दूत नंदी को भेजा और भगवान गणेश को पूरे आदर-सम्मान के साथ वहां बुलाया गया और उनकी पूजा की गई।
गणेश जी के प्रसन्न होने पर रथ के पहिए तो मिट्टी से बाहर आ गए, लेकिन वे बुरी तरह टूट चुके थे। उन्हें ठीक करने के लिए पास के खेत में काम कर रहे एक खाती (बढ़ई) को बुलाया गया। उस खाती ने अपना काम शुरू करने से पहले मन ही मन “श्री गणेशाय नमः” का उच्चारण कर विघ्नहर्ता का स्मरण किया और देखते ही देखते सभी रथों को ठीक कर दिया।
रथ ठीक करने के बाद खाती ने देवताओं से कहा, “हे देवगण! आप ज्ञानी होकर भी यह कैसे भूल गए कि हम जैसे साधारण मनुष्य भी किसी काम की शुरुआत से पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश का स्मरण करते हैं, लेकिन आपने उनका ही अपमान कर दिया।” देवताओं को अपनी भूल का गहरा पछतावा हुआ। सभी ने एक स्वर में “श्री गणेश भगवान की जय” का जयकारा लगाया। इसके बाद बारात निर्विघ्न आगे बढ़ी और भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
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