योगिनी एकादशी

योगिनी एकादशी

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है।

इस व्रत का पुण्य बहुत अधिक है। इसे करने से लगभग अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल मिलता है। योगिनी एकादशी का पालन करने वाले को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।

यह व्रत विशेष रूप से पापों के नाश, पुण्य की प्राप्ति और आत्मा की शुद्धि के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इसके साथ ही, इसे विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी आती है

योगिनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—“श्रीजन! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम और उसका महत्व बताइए।”

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया—“राजन्! आषाढ़ कृष्णपक्ष की यह एकादशी ‘योगिनी’ कहलाती है। यह व्रत बहुत पुण्यदायक है और बड़े पापों को भी नष्ट करने वाला है।”

अलकापुरी में भगवान कुबेर राज करते थे। वे सदा भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। उनके हेममाली नामक यक्ष सेवक थे, जो मंदिर में फूल लाकर पूजा में सहायक होते थे। हेममाली अपनी साधारण जिम्मेदारियों में लापरवाही करने लगा। एक दिन वह समय पर पुष्प लेकर नहीं पहुंचा। कुबेर महाराज जब पूजा कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि हेममाली नहीं आया। क्रोधित होकर उन्होंने पूछा, “हे सेवक! यह विलंब क्यों है?”

सेवकों ने उत्तर दिया—“राजन्! हेममाली अपने निजी कामों में व्यस्त होने के कारण समय पर नहीं आया।”

कुबेर ने तुरंत हेममाली को बुलवाया। हेममाली डर और पछतावे से भरकर महाराज के सामने खड़ा हुआ। कुबेर ने क्रोध में उसे कोढ़ की बीमारी के साथ जंगल में भेज दिया। हेममाली अत्यंत दुखी और बीमार होकर दर-दर भटकने लगा।

इधर, पर्वतों में तपस्या कर रहे महर्षि मार्कण्डेयजी के दर्शन उसे हुए। हेममाली ने अपनी कथा सुनाई और मुनि से मदद मांगी। मार्कण्डेयजी ने उसे समझाया—“हे यक्ष! तुम सच बोल रहे हो। इसलिए मैं तुम्हें कल्याणकारी व्रत का उपदेश देता हूँ। आषाढ़ कृष्णपक्ष की ‘योगिनी’ एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पालन से तुम्हारी सभी बीमारियाँ दूर होंगी और पाप नष्ट होंगे।”

हेममाली ने मुनि के उपदेशानुसार योगिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत करने से उसका शारीरिक कष्ट समाप्त हुआ, कोढ़ दूर हो गई और वह पुनः स्वस्थ तथा प्रसन्नचित्त हो गया।

मुनि ने कहा—“जो व्यक्ति अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसी प्रकार का पुण्य फल उसे भी प्राप्त होता है, जो योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करता है। यह व्रत महान पापों को नष्ट करने वाला और पुण्य फल देने वाला है। इसे पढ़ने या सुनने मात्र से भी मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।”

योगिनी एकादशी व्रत श्रद्धा और विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख, शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल वर्तमान जीवन के लिए, बल्कि पूर्व जन्मों के पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

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