UGC नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: ‘वाग और दुरुपयोग योग्य’ बताकर पुराने नियम बहाल!

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1) UGC नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: ‘वाग और दुरुपयोग योग्य’ बताकर पुराने नियम बहाल!

नई दिल्ली: भारत के उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ पर अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन नियमों को ‘प्रथम दृष्टि में अस्पष्ट’, ‘दुरुपयोग की संभावना वाला’ और ‘समाज को बांटने वाला’ करार दिया। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया कि 2012 के पुराने UGC नियम फिलहाल लागू रहेंगे, जब तक आगे के आदेश नहीं आते। इस फैसले से सामान्य वर्ग के छात्रों को बड़ी राहत मिली है, जो इन नियमों को भेदभावपूर्ण बता रहे थे। केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर 19 मार्च तक जवाब मांगा गया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब देशभर में UGC के नए नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए थे। छात्र संगठनों, सामान्य वर्ग के प्रतिनिधियों और कुछ शिक्षाविदों ने इन नियमों को ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का नाम दिया था। आइए, इस पूरे मामले की गहराई से समझते हैं – नियम क्या हैं, विरोध क्यों, कोर्ट में क्या हुआ और आगे क्या हो सकता है।

UGC के नए नियम क्या हैं और क्यों बने?

UGC ने 23 जनवरी 2026 को ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ वाले नए नियम अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना था। मुख्य प्रावधानों में शामिल हैं:

  • हर संस्थान में ‘इक्विटी कमेटी’ का गठन, जिसमें SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं के प्रतिनिधि अनिवार्य।
  • जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा, जो मुख्य रूप से SC, ST और OBC छात्रों पर केंद्रित।
  • शिकायत निवारण तंत्र, जिसमें समयबद्ध जांच और सजा के प्रावधान।
  • संस्थानों को समानता से जुड़ी योजनाएं लागू करने का निर्देश, जैसे हेल्पलाइन और ओम्बड्समैन।

UGC का तर्क था कि ये नियम कैंपस में पिछड़े वर्गों के छात्रों को सुरक्षा प्रदान करेंगे, जहां रैगिंग और भेदभाव की घटनाएं आम हैं। UGC के अनुसार, देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी हैं। हालांकि, इन नियमों में सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों को भेदभाव का शिकार मानने का कोई प्रावधान नहीं था, जिसे विरोधियों ने असंवैधानिक बताया।

ये नियम 2012 के पुराने फ्रेमवर्क से आगे बढ़कर अधिक सख्त और कानूनी रूप से बाध्यकारी थे। 2012 के नियम ज्यादा सलाहकारी थे, जबकि 2026 के नियमों में दंडनीय प्रावधान थे। UGC का कहना है कि ये बदलाव हाल के वर्षों में बढ़ती जातिगत घटनाओं के मद्देनजर जरूरी थे, जैसे कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों में आत्महत्या के मामले।

 

विरोध क्यों और किसने किया? 

नए नियमों का सबसे ज्यादा विरोध सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों से आया। उनका आरोप था कि ये नियम ‘एकतरफा’ हैं और जनरल कैटेगरी के छात्रों को निशाना बना सकते हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि नियमों में SC/ST/OBC के खिलाफ भेदभाव की परिभाषा तो है, लेकिन जनरल छात्रों के लिए कोई सुरक्षा नहीं। इससे झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ सकता है, जो कैंपस माहौल को विषाक्त बना देगा।

देशभर में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में छात्रों ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया। कुछ संगठनों ने इसे ‘संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 15(1) (भेदभाव निषेध)’ का उल्लंघन बताया। याचिकाकर्ता मृत्युंजय तिवारी, विनीत जिंदल और राहुल देवन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें नियमों की धारा 3(c) को चुनौती दी गई। वकील विष्णु शंकर जैन ने कोर्ट में दलील दी कि ये नियम मान लेते हैं कि भेदभाव सिर्फ SC/ST/OBC के खिलाफ होता है, जो गलत धारणा है।

विरोधी तर्क देते हैं कि ये नियम समाज को और बांटेंगे, जबकि आजादी के 75 साल बाद हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए। कुछ शिक्षाविदों ने भी कहा कि कैंपस में समानता के लिए जाति-निरपेक्ष नियम बेहतर होते।

 

सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ? प्रमुख उद्धरण

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में कई महत्वपूर्ण सवाल उठे। CJI सूर्यकांत ने कहा, “हमने जातिविहीन समाज की दिशा में जो हासिल किया है, क्या हम पीछे जा रहे हैं?” उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग हॉस्टल या स्कूल की व्यवस्था से बचना चाहिए। जस्टिस बागची ने नियमों को ‘बहुत व्यापक’ और ‘दुरुपयोग योग्य’ बताया।

कोर्ट ने पूछा:

  • क्या रैगिंग की शिकायत इन नियमों के तहत आएगी? वकील ने जवाब दिया कि रैगिंग की परिभाषा ही नहीं है, जिससे फ्रेशर जेल जा सकता है।
  • यदि SC समुदाय के अंदर ही भेदभाव हो तो क्या उपाय?
  • क्षेत्रीय या सांस्कृतिक भेदभाव (जैसे उत्तर-पूर्व के छात्रों पर तंज) को ये नियम कवर करेंगे?
  • जब पहले से 3 ‘E’ (शायद Equity, Equality, Empowerment) हैं, तो 2 ‘C’ (Caste-specific) की जरूरत क्यों?

CJI ने सुझाव दिया कि केंद्र एक समिति गठित करे, जिसमें प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हों, ताकि नियमों को फिर से तैयार किया जा सके। कोर्ट ने कहा कि भारत की एकता शैक्षणिक संस्थानों में दिखनी चाहिए, न कि विभाजन। 

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अनुच्छेद 14 का हवाला दिया और कहा कि धारा 3(c) पूरी तरह बहिष्कारपूर्ण है। CJI ने स्पष्ट किया कि कोर्ट सिर्फ नियमों की संवैधानिकता जांच रही है, न कि किसी की मंशा पर।

 

आगे क्या? प्रभाव और संभावनाएं

यह अंतरिम आदेश UGC और केंद्र के लिए झटका है, लेकिन अंतिम फैसला 19 मार्च की सुनवाई पर निर्भर करेगा। तब तक 2012 के नियम लागू रहेंगे, जो कम सख्त हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट नियमों को फिर से ड्राफ्ट करने का निर्देश दे सकता है, ताकि वे जाति-निरपेक्ष हों।

इस फैसले से उच्च शिक्षा संस्थानों में तनाव कम हो सकता है, लेकिन बहस जारी रहेगी। SC/ST/OBC संगठन इसे पीछे की ओर कदम बता रहे हैं, जबकि सामान्य वर्ग इसे न्याय मान रहा है। UGC को अब जवाब तैयार करना होगा कि नियम क्यों जरूरी हैं और कैसे दुरुपयोग रोका जाएगा।

कुल मिलाकर, यह मामला भारत के शिक्षा तंत्र में समानता और भेदभाव की जटिल बहस को उजागर करता है। क्या नए नियम समाज को एकजुट करेंगे या बांटेंगे? जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा।

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