सनकादि ऋषि को ब्रह्मा जी के चिरंजीवी पुत्र कहा जाता है। ये चारों ऋषि सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार आध्यात्मिक ज्ञान, तपस्या, वैराग्य और ब्रह्मज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं। आइए संक्षेप में इनके बारे में जानते हैं।
सनकादि ऋषियों की उत्पत्ति
धर्म ग्रंथों के अनुसार, ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने से पहले घोर तपस्या की, जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में प्रकट हुए। ये चारों मुनि ब्रह्मा जी के पुत्र बने। इन चार मुनियो को मानस पुत्र भी कहा जाता है क्योंकि इनकी उत्पत्ति के लिए ब्रह्मा जी ने घोर तपस्या की थी और ये ब्रह्मा जी के मन से उत्पन्न हुए थे। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए अपने मानस पुत्रों की उत्पत्ति की थी, ताकि वे संसार में जीवों की वृद्धि करें। लेकिन सनकादि ऋषि सांसारिक रचना में शामिल नहीं होना चाहते थे। उनका मन पूर्णतः भक्ति, वैराग्य और आत्मज्ञान की ओर था। उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि वे संसार की मोह-माया में नहीं पड़ेंगे, बल्कि ईश्वर के ध्यान और ब्रह्मज्ञान में ही समय बिताएंगे।इससे ब्रह्मा जी को थोड़ी निराशा हुई, लेकिन उन्होंने उनके निर्णय का सम्मान करते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे चिरंजीवी रहेंगे और ब्रह्मज्ञान के मार्ग को प्रसारित करेंगे।
सनकादि ऋषियों का परिचय
ये चारों भाई सदैव पाँच वर्ष के बालक रूप में ही रहे। न इनकी आयु बढ़ती थी, न घटती थी न ये कभी जवान हुए, न ही वृद्ध। ये सदा एक ही आयु में स्थिर रहे, क्योंकि सनकादि ऋषि भगवान विष्णु के अटल भक्त थे। वे निरंतर “हरिः शरणम्” मंत्र का जप करते रहते थे और हमेशा भगवान विष्णु के साथ रहने की इच्छा रखते थे। इसी कारण वे बाल स्वरूप में ही रहते थे । चारों भाई जहाँ भी जाते, साथ रहते और भगवद् भजन करते। सनक ऋषि सबसे बड़े और प्रमुख ऋषि। इनका स्वभाव अत्यंत गंभीर और मौनप्रिय था। सनन्दन ऋषि ज्ञान और शांति के प्रतीक, अत्यधिक सरलता से गूढ़ विषयों को समझाते हैं। सनातन ऋषि वैराग्य और तपस्या के मार्ग के महान ज्ञाता।सनत्कुमार ऋषि बाल रूप में भी उच्च ज्ञान के धनी। इन्हें “कुमार” रूप में सर्वाधिक पूजनीय माना जाता है। इन चारों ऋषियों ने कभी विवाह नहीं किया और न ही गृहस्थ जीवन अपनाया। ये आज भी ब्रह्मलोक में विद्यमान हैं और उच्च आत्माओं को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
सनकादि ऋषियों का वैकुण्ठ भ्रमण
जब सनकादि ऋषियों के मन में भगवान विष्णु के दर्शन की इच्छा उत्पन्न हुई तो चारों भाई वैकुण्ठ यात्रा पर निकल पड़े। जब वे भगवान विष्णु के निवास स्थान वैकुण्ठ पहुँचे, तो उन्होंने सात द्वार देखे। वे एक-एक करके उनमें प्रवेश करते गए, परन्तु जब वे सातवें द्वार पर पहुँचे, तो उन्हें जय और विजय नाम के दो द्वारपाल मिले। जय और विजय ने सनकादि ऋषियों को बाल रूप में देखकर आश्चर्य किया और उन्हें सामान्य बालक समझकर उपहास करने लगे, जिससे सनकादि ऋषियों को क्रोध आ गया और उन्होंने जय-विजय को श्राप दे दिया कि वे तीन जन्मों तक राक्षसरूप में जन्म लेंगे और भगवान से युद्ध करेंगे। यही श्राप रावण, हिरण्यकश्यप और कंस जैसे राक्षसों के जन्म का कारण बना।जब इस घटना का भगवान विष्णु को पता चला तो वे सनकादि ऋषियों के समक्ष प्रकट हुए। सनकादि ऋषि भगवान विष्णु को अपने समक्ष देखकर रोने लगे। वे भक्ति भाव से उनसे आग्रह करने लगे कि, “प्रभु, हमें स्वीकार करें और हमारे जीवन की मुक्ति अब आपके चरणों में ही हो।” यह सब सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उनका यह आग्रह स्वीकार कर लिया।
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सनत्कुमार का नारद को उपदेश
चतुर्थ स्कंध के श्रीमद्भागवत पुराण में एक महत्वपूर्ण प्रसंग आता है, जिसमें सनत्कुमार, नारद मुनि को आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष का रहस्य समझाते हैं। नारद मुनि ने पूछा कि संसार में इतना दुःख क्यों है, और आत्मा कैसे इस चक्र से मुक्त हो सकती है? तब सनत्कुमार ने कहा जब तक जीव मैं और मेरा के बंधन में फंसा रहता है, तब तक वह दुखी रहेगा। जब वह समझेगा कि आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है, और वह स्वयं परमात्मा का अंश है तभी मुक्ति संभव है।
सनकादि ऋषियों का महत्व आज के समय में
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जब मनुष्य बाहरी भौतिक सुख-सुविधाओं में उलझा हुआ है, तब सनकादि ऋषियों की शिक्षा अधिक प्रासंगिक हो जाती है। वैराग्य का अर्थ भागना नहीं, बल्कि भीतर से संसार के मोह से मुक्त होना है। ब्रह्मज्ञान कोई रहस्यमयी चीज नहीं, बल्कि आत्मा को जानना ही ब्रह्म को जानना है। तपस्या केवल जंगल में नहीं, बल्कि अपने मन को वश में रखना भी तप है। सच्चा जीवन वही है, जो आत्मा के उद्देश्य को समझकर जिया जाए।
उपसंहार
सनकादि ऋषि केवल पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुँचे हुए आत्मज्ञानी मुनि हैं, जिनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही सार्थक हैं जितनी प्राचीन काल में थीं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा सुख न धन में है, न पद में — बल्कि आत्मज्ञान, संतोष और ईश्वर की भक्ति में है। आज जब जीवन में तनाव, भटकाव और भ्रम फैला हुआ है, तब सनकादि ऋषियों की जीवन गाथा और उनकी शिक्षाएं हमें सही दिशा दिखा सकती हैं।
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