क्या आप जानते हैं कि भारतीय धार्मिक परंपरा में सात चिरंजीवी कौन कौन हैं जो विभिन्न युगों से आज भी जीवित हैं? यह माना जाता है कि ये चिरंजीवी अपनी विशेषता, वरदान या शाप के कारण अमर हैं। इस लेख में हम इन सात चिरंजीवियों के बारे में जानेंगे और उनके वर्तमान निवास स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे।
चिरंजीवी का मतलब?
“चिरंजीवी” का अर्थ है “लंबे समय तक जीवित रहने वाला”। ये सात चिरंजीवी हिंदू धर्म में अच्छाई और धर्म के प्रतीक हैं। माना जाता है कि वे कलियुग के अंत तक जीवित रहेंगे और धर्म की रक्षा करेंगे। इनकी अमरता उनके कर्मों के आधार पर वरदान या अभिशाप के रूप में दी गई है।
सात चिरंजीवी

कौन थे राजा महाबली ? राजा महाबली एक प्रसिद्ध असुर राजा थे, जो अपनी परोपकारी और धर्मपरायण प्रवृत्ति के लिए जाने जाते थे। उनकी लोकप्रियता से भयभीत होकर इंद्र ने भगवान विष्णु से मदद मांगी। विष्णु ने वामन का अवतार लिया और महाबली से तीन पग भूमि मांगी। वामन का आकार बढ़ने पर महाबली ने उन्हें तीसरा पग अपने सिर पर रखने को कहा, जिससे वामन ने बलि को पाताल लोक में भेज दिया। भगवान विष्णु ने महाबली को चिरंजीवी होने का वरदान दिया। महाबली पाताल लोक में निवास करते हैं और कलियुग के अंत में पुनः पृथ्वी पर लौटेंगे।

महर्षि वेदव्यास चार वेदों के रचनाकार हैं और महाभारत जैसे महान ग्रंथ के लेखक हैं। वे हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में निवास करते हैं और वेदों का ज्ञान देने के लिए समय-समय पर प्रकट होते हैं। उनकी अमरता की मान्यता उन्हें उनके ज्ञान और तप के लिए प्राप्त हुई है।

भगवान हनुमान को उनके भगवान राम के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति के कारण अमरता का वरदान मिला। हनुमान अयोध्या, कांचीपुरम, और हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। वे भक्तों की सहायता के लिए समय-समय पर प्रकट होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

विभीषण रावण के छोटे भाई थे और उन्होंने धर्म और न्याय के पक्ष में श्रीराम का साथ दिया। भगवान राम ने उनकी धर्मनिष्ठा के कारण उन्हें अमरता का वरदान दिया। विभीषण आज भी लंका में निवास करते हैं और धर्म का पालन करते हैं।

कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के कुलगुरु थे और महाभारत युद्ध में भाग लिया था। उन्हें शस्त्र विद्या में निपुण माना जाता है। वे कुरुक्षेत्र में निवास करते हैं और समय-समय पर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।

भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने भ्रष्ट क्षत्रियों का नाश किया और भगवान शिव से अजेय शक्ति प्राप्त की। वे महेंद्रगिरि पर्वत पर निवास करते हैं और ध्यान और तपस्या में लीन रहते हैं। वे समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

अश्वत्थामा द्रोणाचार्य और कृपी के पुत्र थे। महाभारत युद्ध के दौरान उनके द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया। श्रीकृष्ण ने उन्हें चिरंजीवी बनने का शाप दिया, जिससे वे लंबे समय तक दुख और पीड़ा में जीवित रहेंगे। आज भी उन्हें उत्तराखंड के जंगलों और हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में देखा जाता है।
अंत में, सात चिरंजीवी भारतीय धार्मिक और पौराणिक इतिहास का अभिन्न हिस्सा हैं। चाहे वह राजा महाबली हों, हनुमान जी, या परशुराम, इनकी कहानियां हमें धर्म, निष्ठा और शक्ति के मूल्य सिखाती हैं। कलियुग के अंत तक, इन चिरंजीवियों की उपस्थिति हमें यह याद दिलाती है कि अच्छाई हमेशा विजयी होती है।
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