महाशिवरात्रि व्रत कथा
महाशिवरात्रि व्रत कथा
महाशिवरात्रि की व्रत कथा चित्रभानु नाम के एक भील शिकारी की है, जिसने अनजाने में ही महाशिवरात्रि का व्रत कर लिया था। वह रात भर जागता रहा और बिना जाने ही शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ते गए। इसी पुण्य से उसे मृत्यु के बाद शिवलोक प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन इस कथा का पाठ करने से पाप मिटते हैं और शिवजी की कृपा से शिवलोक की प्राप्ति होती है।
पुराने समय की बात है। चित्रभानु नाम का एक शिकारी था जो शिकार कर अपने परिवार का पालन करता था। उस पर एक साहूकार का कर्ज था, जिसे वह समय पर चुका नहीं पाया। इस कारण साहूकार ने उसे शिव मंदिर में बंदी बना लिया। उसी दिन शिवरात्रि थी। चित्रभानु ने वहां शिवरात्रि व्रत की कथा सुनी। शाम को साहूकार ने उसे बुलाकर कर्ज की बात की और फिर चित्रभानु शिकार पर निकल गया।
रात के पहले पहर में एक गर्भवती हिरणी पानी पीने तालाब पर आई। चित्रभानु जैसे ही उसे मारने वाला था, वह बोली – “मैं गर्भवती हूँ, जल्द ही बच्चे को जन्म दूँगी। मुझे अभी मत मारो। जन्म देने के बाद मैं वापस आ जाऊँगी।” चित्रभानु ने उसे छोड़ दिया। इसी बीच कुछ बेलपत्र फिर शिवलिंग पर गिर पड़े और पहले पहर की पूजा भी पूरी हो गई।
थोड़ी देर बाद दूसरी हिरणी आई। चित्रभानु ने जैसे ही उसे मारना चाहा, वह बोली – “मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ और अपने पति की तलाश में हूँ। उनसे मिलकर तुम्हारे सामने आ जाऊँगी।” चित्रभानु ने उसे भी जाने दिया। कुछ और बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए और यह दूसरा पहर भी पूजित हो गया।
फिर आखिरी पहर में एक हिरणी अपने बच्चों के साथ आई। उसने भी जीवनदान मांगा, और चित्रभानु ने उसे भी छोड़ दिया। फिर एक हिरण आया। चित्रभानु ने सोचा, “अब तो इसे नहीं छोड़ूँगा।” लेकिन हिरण ने निवेदन किया – “थोड़ा समय दो, मैं भी अपने परिवार के साथ लौट आऊँगा। मेरी पत्नी और बच्चे तुम्हारे भरोसे पर गए हैं, मेरी मृत्यु से वे अपना वचन नहीं निभा पाएँगे।” चित्रभानु ने उसे भी जाने दिया।
इस तरह पूरी रात उपवास, जागरण और बेलपत्र अर्पण के साथ अनजाने में ही उसकी शिवरात्रि की पूजा पूरी हो गई। सुबह हुई तो वही हिरण और उसका परिवार लौट आया। उन्हें देखकर चित्रभानु को बहुत पश्चाताप हुआ और उसने सबको जीवनदान दे दिया।
इस अनजाने व्रत के फलस्वरूप चित्रभानु को मोक्ष की प्राप्ति हुई। मृत्यु के समय जब यमदूत उसे लेने आए, तो शिवगणों ने उन्हें रोक दिया और चित्रभानु को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से उसे अपने पिछले जन्म की बातें याद रहीं, जिससे वह अगले जन्म में भी महाशिवरात्रि का पालन करता रहा।
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