मां चंद्रघंटा
मां चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन, भक्त मां चंद्रघंटा की आराधना करते हैं।
यह रूप मां दुर्गा का शांत, पराक्रमी और कल्याणकारी स्वरूप माना जाता है।
मां चंद्रघंटा के पास दस भुजाएं होती हैं। बाईं ओर की चार भुजाओं में गदा, त्रिशूल, तलवार और एक हाथ में युद्ध मुद्रा (तैयारी की मुद्रा) है। दाईं ओर की चार भुजाओं में कमल, धनुष, बाण और एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में होता है। शेष दो भुजाओं में –
एक में कमंडल और दूसरी में जपमाला है।
उनका यह रूप हमें सिखाता है कि शक्ति और शांति, दोनों को संतुलित करना ही सच्चा धर्म है।
मां चंद्रघंटा की पूजा से भय, रोग और शत्रु दूर होते हैं और जीवन में धैर्य, साहस और मन की शांति प्राप्त होती है।
मां चंद्रघंटा की व्रत कथा
बहुत समय पहले धरती पर महिषासुर नाम का एक राक्षस राज करता था।
“महि” का मतलब होता है भैंसा, और महिषासुर का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उसका रूप भी भैंसे जैसा ही था।
वो बहुत ताकतवर था और इतना बलवान कि कोई देवता या राक्षस उसका मुकाबला नहीं कर सकता था।एक दिन, असुरों के गुरु शुक्राचार्य की सलाह पर महिषासुर ने ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या शुरू की।
तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले – “वर मांगो।”
महिषासुर ने पहले अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा जी ने बताया कि पृथ्वी पर जन्म लेने वाले किसी भी प्राणी की मृत्यु तय होती है, इसलिए ऐसा वरदान संभव नहीं है।
तब महिषासुर ने चालाकी से वर मांगा कि उसकी मृत्यु किसी पुरुष के हाथ न हो।
वो सोचता था कि स्त्री सबसे कमजोर होती है, इसलिए स्त्री से मरना संभव नहीं।
ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया।
वरदान मिलते ही महिषासुर का अहंकार बढ़ गया।
उसने पहले पाताल और धरती पर कब्जा कर लिया, फिर स्वर्ग पर हमला किया और देवताओं को भी हरा दिया।
अब समस्या यह थी कि कोई भी पुरुष महिषासुर को मार नहीं सकता था, और इसलिए त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी उसका कुछ नहीं कर पा रहे थे।
देवताओं की विनती और देवी का प्रकट होना
सभी देवता त्रिदेवों के पास गए और उनसे मदद की गुहार लगाई।
सारी बात सुनकर तीनों देवता बहुत क्रोधित हुए।
उनके क्रोध से एक तेज ऊर्जा निकली और उसमें से एक शक्तिशाली देवी प्रकट हुईं।
उनकी दस भुजाएं थीं, माथे पर अर्धचंद्र की तरह घंटा सुशोभित था।
देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र देवी को अर्पित किए:
- शिवजी ने त्रिशूल दिया
- विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र
- इंद्रदेव ने वज्र
और बाकी देवताओं ने भी अपने शस्त्र माता को सौंप दिए।
मां चंद्रघंटा का विकराल रूप और युद्ध
इन सभी अस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी का रूप विकराल और तेजस्वी होता गया।
माता अब बन चुकी थीं ‘मां चंद्रघंटा’, और वो चल पड़ीं महिषासुर का वध करने।
महिषासुर और माता के बीच भीषण युद्ध हुआ।
आकाश, पाताल और धरती – तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई।
माता ने एक-एक कर सारे राक्षसों को मार गिराया, और अंत में महिषासुर का भी वध कर दिया।
इस तरह मां चंद्रघंटा ने देवताओं और मानव जाति की रक्षा की और एक बार फिर यह साबित किया कि
जब अधर्म बढ़ता है, तो मां दुर्गा स्वयं प्रकट होकर न्याय करती हैं।
जय माता दी!
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