एकादशी व्रत कैसे करें?

एकादशी व्रत कैसे करें?

एकादशी व्रत से एक दिन पहले दशमी को प्याज़, मांस, मसूर जैसी चीज़ें नहीं खानी चाहिए। व्रत के दिन कृत्रिम टूथपेस्ट या दातून का उपयोग न करें, उसकी जगह नींबू, जामुन या आम की पत्तियों से मुँह साफ करें या जल से कुल्ला करें। इस दिन पेड़ों से पत्ते तोड़ना, झाड़ू लगाना, ज़्यादा बोलना, बाल कटवाना और झूठ बोलना वर्जित माना गया है। दूसरों के घर का भोजन नहीं लेना चाहिए और फल जैसे आम, अंगूर, केला या बादाम प्रभु को भोग लगाकर ही ग्रहण करना चाहिए।

स्नान करने के बाद भगवान विष्णु के सामने बैठें, गीता का पाठ करें और मन ही मन यह संकल्प लें कि
  • किसी को कटु वचन नहीं कहूंगा
  • गाय, ब्राह्मण आदि को फल व भोजन अर्पित करूंगा

कभी भी किसी का अपमान न करें। एकादशी का सच्चा रूप है मीठा बोलना, सबको क्षमा करना और धैर्य रखना।

जो भक्त इन नियमों के साथ व्रत करता है, उसे भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

अगर भूल से किसी से कठोर बात कह दी हो, तो सूर्य देव को प्रणाम करें और भगवान विष्णु से क्षमा माँगें।

धनपाल के पाँच पुत्र थे –

  • सुमना
  • द्युतिमान
  • मेधावी
  • सुकृत
  • धृष्टबुद्धि

इन पाँचों में सबसे छोटा था धृष्टबुद्धि। उसका स्वभाव बिलकुल विपरीत था। वह पाप कर्मों में लिप्त रहता, जुआ खेलने का शौकीन था और वेश्याओं की संगति में अपना जीवन बिगाड़ता था। न तो उसे देवताओं की पूजा का ध्यान था और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सम्मान की परवाह। धीरे-धीरे उसने पिता का संचित धन भी दुराचार में नष्ट कर दिया।
एक दिन धृष्टबुद्धि नगर के चौराहे पर वेश्याओं के साथ घूमता हुआ लोगों को दिख गया। यह देखकर धनपाल ने क्रोधित होकर उसे घर से निकाल दिया। परिवार और संबंधियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया।

अब धृष्टबुद्धि भटकते-भटकते दुख और निराशा से भर गया। भूख, प्यास और तिरस्कार से पीड़ित होकर वह इधर-उधर भटकने लगा।

एक दिन संयोग से वह महान ऋषि कौण्डिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा। उस समय वैशाख मास का शुभ समय था। ऋषि गंगाजी में स्नान कर आश्रम लौट रहे थे। धृष्टबुद्धि, जो अपने पापों और दुखों से व्याकुल था, उनके पास जाकर हाथ जोड़कर बोला –

“हे मुनिवर! कृपा करके मुझे ऐसा कोई व्रत बताइए, जिससे मेरे जीवन के पाप नष्ट हो जाएँ और मुझे मुक्ति का मार्ग मिल सके।”
ऋषि कौण्डिन्य ने करुणा पूर्वक उत्तर दिया –

“वत्स! वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करो। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के अनेक जन्मों के पाप, चाहे वे मेरु पर्वत जितने बड़े क्यों न हों, समाप्त हो जाते हैं।”

ऋषि के वचन सुनकर धृष्टबुद्धि के हृदय में आशा और शांति का संचार हुआ। उसने विधि-विधान से मोहिनी एकादशी का व्रत किया और भक्ति भाव से भगवान विष्णु की पूजा की।

इस व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के सारे पाप नष्ट हो गए। उसे दिव्य शरीर प्राप्त हुआ और अंत में वह भगवान विष्णु के धाम को चला गया, जहाँ उसे अनंत सुख की प्राप्ति हुई।

फलश्रुति (संदेश):

मोहिनी एकादशी का व्रत अति पवित्र और कल्याणकारी है। इसके प्रभाव से मनुष्य पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। जो भी भक्त इस व्रत कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे सहस्र गोदान के बराबर पुण्य मिलता है।

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