हरियाली तीज व्रत कथा

बहुत समय पहले की बात है — माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कई वर्षों तक कठोर तप किया।

एक दिन देवर्षि नारद जी पार्वती जी के घर पहुंचे और उनके पिता राजा हिमालय से कहा: “भगवान विष्णु माता पार्वती से विवाह करना चाहते हैं। यह उनका प्रस्ताव है।”

राजा हिमालय इस बात से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने विवाह के लिए हामी भर दी। नारद मुनि ने यह संदेश भगवान विष्णु को दे दिया।

जब यह बात मां पार्वती को पता चली तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा – “मैं तो भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी हूं। मैं किसी और से विवाह नहीं कर सकती।”

अपने मन का दुःख लेकर माता पार्वती महल से दूर एक गुफा में चली गईं और वहां उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए फिर से तपस्या शुरू कर दी। इस बार उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की।

मां पार्वती की गहरी भक्ति और तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने दर्शन देकर कहा – “तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी। मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूं।”

अगले दिन माता पार्वती ने व्रत का पारण किया और पूजा सामग्री गंगा में प्रवाहित कर दी।

इधर राजा हिमालय को जब यह सब पता चला, तो वे चिंतित हो गए कि उन्होंने भगवान विष्णु से विवाह का वादा कर दिया था। वे पार्वती को ढूंढ़ते हुए उस गुफा में पहुंचे।

मां पार्वती ने उन्हें सब सच बताया और कहा कि भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया है।

फिर राजा हिमालय ने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी और अपनी पुत्री की इच्छा के अनुसार भगवान शिव और पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ।

कजरी तीज

बहुत समय पहले एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। उनकी स्थिति इतनी खराब थी कि दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल था। जब भाद्रपद मास की तृतीया तिथि आई, तो ब्राह्मणी ने कजरी तीज का व्रत करने का निश्चय किया।

उसने अपने पति से कहा, “आज मैंने कजली माता का व्रत रखा है, कृपया चने का सत्तू ले आइए।” ब्राह्मण दुखी होकर बोला, “घर में एक पैसा नहीं है, सत्तू कहां से लाऊं?” पत्नी ने कहा, “चाहे जैसे भी हो, चोरी करो या कहीं से मांग कर लाओ, पर मुझे व्रत के लिए सत्तू चाहिए।”

अब ब्राह्मण मजबूरी में रात को निकला और एक साहूकार की दुकान में चुपचाप घुस गया। वहां सब सो रहे थे। ब्राह्मण ने दुकान से सवा-सवा किलो चने की दाल, घी और शक्कर इकट्ठा किया ताकि सत्तू बना सके। तभी दुकान में आवाज हुई और नौकर जाग गए। उन्होंने चिल्लाकर ब्राह्मण को पकड़ लिया और साहूकार को बुला लिया।

साहूकार ने जब ब्राह्मण से पूछताछ की, तो ब्राह्मण ने पूरी सच्चाई बता दी — “मैं चोर नहीं हूं। मेरी पत्नी ने व्रत रखा है और व्रत का सत्तू लाना जरूरी था, इसलिए मैं मजबूरी में आया। आप चाहें तो मेरी तलाशी ले सकते हैं।”

जब तलाशी ली गई तो उसके पास सिवाय व्रत की सामग्री के और कुछ नहीं मिला।

ब्राह्मण ने फिर कहा, “अब तो चांद भी निकल आया होगा, मेरी पत्नी मेरा इंतज़ार कर रही होगी।”

साहूकार की आंखें भर आईं। वह बोला, “आज से तुम्हारी पत्नी मेरी धर्म बहन हुई।” साहूकार ने ब्राह्मण को न केवल सत्तू दिया, बल्कि बहुत से गहने, कपड़े, मेहंदी, लच्छा और धन देकर आदरपूर्वक विदा किया।

घर लौटकर ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने श्रद्धा से कजली माता की पूजा की। माता प्रसन्न हुईं और उनके जीवन में सुख-समृद्धि आने लगी। कहते हैं — जो भी यह कथा श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उस पर कजली माता की विशेष कृपा होती है। उसके जीवन में भी ऐसे ही अच्छे दिन आते हैं।

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