वरूथिनी एकादशी

वरूथिनी एकादशी

वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत का फल दस हज़ार वर्ष तक कठोर तप करने के समान माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक मन स्वर्णदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से भी मिलता है। इस व्रत को करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोगता है और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति करता है। यदि कोई अभागिनी स्त्री इस व्रत का पालन करती है तो उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इसे कन्या दान के बराबर बताया गया है तथा वरूथिनी एकादशी का व्रत अन्न दान और कन्या दान दोनों के समान पुण्य प्रदान करता है। इस पावन व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और धर्म-लाभ दोनों ही बढ़ते हैं।

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल की बात है। नर्मदा नदी के किनारे एक महान और दानशील राजा राज्य करते थे। उनका नाम था राजा मान्धाता। वे बहुत धर्मप्रिय, दानवीर और तपस्वी स्वभाव के थे। वे प्रजा का पालन भी न्याय और प्रेम से करते थे।

एक दिन राजा मान्धाता जंगल में जाकर गहन तपस्या में लीन हो गए। वे पूरी श्रद्धा और मन से भगवान का ध्यान कर रहे थे। तभी अचानक वहाँ एक भयंकर जंगली भालू आ गया।

भालू ने राजा पर हमला कर दिया और उनका पैर चबाने लगा। यह सब होने पर भी राजा अपनी तपस्या से विचलित नहीं हुए। उन्होंने क्रोध या हिंसा का मार्ग नहीं चुना, बल्कि अपने मन को स्थिर रखते हुए भगवान विष्णु का ध्यान करते रहे।

भालू राजा को घसीटते हुए जंगल के भीतर ले गया। राजा का शरीर पीड़ा से तड़प रहा था, लेकिन फिर भी उन्होंने भगवान विष्णु से करुणा भरे स्वर में प्रार्थना की –
“हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए।”

राजा की यह सच्ची पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु वहीं प्रकट हो गए। उन्होंने अपने Sudarshan Chakra (सुदर्शन चक्र) से भालू का वध कर दिया और राजा को उस संकट से बचा लिया।

लेकिन तब तक भालू राजा का एक पैर पहले ही खा चुका था। अपने शरीर को अधूरा देखकर राजा मान्धाता बहुत दुःखी और शोकाकुल हो गए।

तब भगवान विष्णु ने करुणा पूर्वक उनसे कहा –

“वत्स! शोक मत करो। यह घटना तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है। लेकिन अब समाधान भी है। तुम मथुरा जाओ और वहाँ जाकर श्रद्धा से वरूथिनी एकादशी का व्रत करो तथा मेरे वराह अवतार की पूजा करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हें पुनः पूर्ण और सुंदर शरीर प्राप्त होगा।”

भगवान विष्णु की आज्ञा पाकर राजा मान्धाता मथुरा पहुँचे। वहाँ उन्होंने पूरे नियम, श्रद्धा और भक्ति से वरूथिनी एकादशी का व्रत किया और भगवान वराह की आराधना की।

इस व्रत की अपार शक्ति से राजा का शरीर शीघ्र ही पहले जैसा सुंदर और संपूर्ण हो गया। वे फिर से स्वस्थ और बलवान बन गए।

इसी वरूथिनी एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा मान्धाता ने न केवल अपना शरीर पाया, बल्कि जीवन के अंत में स्वर्गलोक को भी प्राप्त किया।

जो भी भक्त श्रद्धा से वरूथिनी एकादशी का व्रत करता है और भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा करता है, उसे शारीरिक दुःख, पाप और विपत्तियों से मुक्ति मिलती है। यह व्रत मनुष्य को संपूर्णता, सुख और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाला है।

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