श्रावण पुत्रदा एकादशी
श्रावण पुत्रदा एकादशी
श्रावण मास की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में इसका महत्व अत्यंत विशेष माना गया है। माना जाता है कि श्रावण और पौष मास की पुत्रदा एकादशियों का पुण्य समान होता है और ये दोनों एकादशियां संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी हैं।
इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा और आराधना करना अनिवार्य माना गया है। श्रद्धा और निष्ठा से किया गया व्रत न केवल संतान सुख प्रदान करता है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और पितरों की कृपा भी सुनिश्चित करता है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
श्री युधिष्ठिर ने पूछा “हे भगवान! मैंने श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का विस्तारपूर्वक वर्णन सुना। अब कृपया मुझे बताइए कि श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम, व्रत करने की विधि और इसका महत्व क्या है?”
भगवान ने उत्तर दिया:
“यह एकादशी पुत्रदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है। अब आप ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनिए। केवल इसे सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है और व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
द्वापर युग में महिष्मति नामक एक नगरी थी, जिसमें राजा महीजित राज्य करते थे। परंतु, उनके कोई संतान नहीं थी। इसलिए राजा को जीवन में असंतोष और दुःख महसूस होता था। उनका मानना था कि पुत्र न होने पर यह लोक और परलोक दोनों ही दुखद होते हैं।
राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए कई उपाय किए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। वृद्धावस्था आते ही उन्होंने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा:
“हे प्रजाजनों! मैंने हमेशा धर्मपूर्वक शासन किया है। न तो मैंने किसी का धन छीना, न किसी से द्वेष रखा। अपराधियों को दंड दिया और सज्जनों का सम्मान किया। फिर भी मुझे पुत्र नहीं मिला। इसका कारण क्या है?”
प्रजा और मंत्रियों ने राजा की बात सुनी और निर्णय लिया कि वे वन में तपस्वी ऋषियों से मार्गदर्शन लेंगे। उन्होंने कई ऋषियों और मुनियों का दर्शन किया और अंततः एक वृद्ध तपस्वी महात्मा लोमश मुनि के आश्रम पहुंचे।
लोमश मुनि अत्यंत ज्ञानी, तपस्वी और धर्मज्ञ थे। उन्होंने पूछा कि आप लोग क्यों आए हैं। जब प्रजा ने अपनी बात बताई, तो मुनि ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्व जन्म का विवरण बताया।
मुनि ने कहा कि राजा महीजित का पूर्व जन्म एक निर्धन वैश्य था। एक बार ज्येष्ठ मास की शुक्ल द्वादशी को भूखा-प्यासा वह जलाशय पर जल पीने गया। वहीं एक गाय पी रही थी। उसने उस गाय को हटा दिया और स्वयं जल पी लिया। इस कारण उसे पुत्र वियोग का दुःख भुगतना पड़ा।
लोमश मुनि ने कहा: “श्रावण शुक्ल एकादशी, जिसे पुत्रदा एकादशी कहते हैं, इस दिन व्रत और जागरण करने से राजा का यह पूर्व जन्म का पाप नष्ट होगा और उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।”
मंत्रियों और प्रजा ने मुनि की आज्ञा अनुसार इस एकादशी का व्रत और जागरण किया।
द्वादशी के दिन राजा को व्रत का फल प्राप्त हुआ। रानी गर्भवती हुई और समय पर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ।
इसी कारण इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी पड़ा।
इस व्रत को करने से न केवल संतान सुख की प्राप्ति होती है, बल्कि सभी पाप भी नष्ट होते हैं। यह व्रत श्रद्धा और भक्ति से करने वाले व्यक्ति को इस लोक में संतान सुख और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति दिलाता है।
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