रमा एकादशी

रमा एकादशी

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को  रमा एकादशी कहा जाता है। इस पावन व्रत का पालन करने से मनुष्य को अपार पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला है और साधक को भौतिक सुखों के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।

इस व्रत का फल इतना महान माना गया है कि इसे करने वाले भक्त तथा उनके पितृगण सबको वैकुण्ठ धाम में स्थान प्राप्त होता है। व्रतधारी पर भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है और उसके जीवन में शांति, समृद्धि तथा सुख का वास होता है।  

रमा एकादशी व्रत कथा || Rama Ekadashi Vrat Katha

प्राचीन काल में एक धर्मनिष्ठ और सत्यवादी राजा मुचकुंद राज्य करते थे। वे बड़े विष्णु भक्त थे और सदैव एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करते थे। उनके राज्य की संपूर्ण प्रजा भी एकादशी व्रत का पालन करती थी। राजा मुचकुंद की एक सुंदर और धर्मपरायणा पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उसका विवाह उन्होंने राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से किया।

एक बार कार्तिक मास की रमा एकादशी के अवसर पर सोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ ससुराल आया। उस दिन राजा मुचकुंद ने राज्य भर में घोषणा कर दी “आज रमा एकादशी का पवित्र व्रत है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष को विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करना चाहिए।”

राजा की इस घोषणा से संपूर्ण राज्य उपवास और नियमों में प्रवृत्त हो गया। जब सोभन ने यह सुना तो वह चिंतित हो उठा। उसका स्वास्थ्य कमजोर था और उसका हृदय दुर्बल। वह पत्नी चंद्रभागा के पास जाकर बोला

“प्रिय! यदि मैंने यह कठोर उपवास किया तो मैं मर जाऊँगा। कृपया मुझे कोई उपाय बताओ जिससे मैं इस व्रत से बच सकूँ।”

चंद्रभागा ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया

“इस राज्य में रमा एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। यहाँ तक कि बालक, वृद्ध और पशु-पक्षी भी आज के दिन अन्न का सेवन नहीं करते। यदि तुम व्रत करने में असमर्थ हो, तो किसी अन्य स्थान पर चले जाओ।” सोभन ने कहा

“नहीं, मैं कहीं और नहीं जाऊँगा। यदि मृत्यु ही नियति है तो मैं व्रत करते-करते ही मरूँगा। मैं इस व्रत का पालन अवश्य करूँगा।”

सोभन ने रमा एकादशी व्रत का संकल्प लिया। उसने उपवास किया और रातभर जागरण भी किया। परंतु भूख-प्यास और दुर्बलता से उसका शरीर टूट गया। रात्रि उसके लिए अत्यंत कष्टकारी सिद्ध हुई।

अगले दिन सूर्योदय से पूर्व ही उपवास के कारण सोभन की मृत्यु हो गई।

राजा मुचकुंद ने अपने दामाद का अंतिम संस्कार कराया और अपनी पुत्री चंद्रभागा को सती न होने का आदेश दिया। उन्होंने कहा –

“बेटी! तुम्हें सती होने की आवश्यकता नहीं है। भगवान विष्णु पर दृढ़ आस्था रखो और व्रत का पालन करती रहो।” चंद्रभागा ने पिता की आज्ञा का पालन किया और पूरे भक्ति भाव से व्रत को पूर्ण किया।

रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से अद्भुत चमत्कार हुआ। विष्णु कृपा से सोभन को मंदराचल पर्वत पर देवपुर नामक दिव्य नगर की प्राप्ति हुई। वहाँ स्वर्ण, रत्न और मणियों की प्रचुरता थी।

एक दिन राजा मुचकुंद के नगर का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए देवपुर पहुँचा। उसने वहाँ सोभन को देखा और उससे भेंट की। सोभन ने ब्राह्मण से चंद्रभागा और राजा मुचकुंद का हाल पूछा। ब्राह्मण ने कहा –

“वे सब कुशलपूर्वक हैं। परंतु आप तो रमा एकादशी व्रत करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए थे। कृपया बताइए कि आपको यह सुंदर नगर कैसे प्राप्त हुआ?” सोभन ने उत्तर दिया –

“हे ब्राह्मण! यह सब रमा एकादशी व्रत का ही फल है। परंतु यह नगर स्थायी नहीं है, क्योंकि मैंने यह व्रत विवशता में किया था, न कि पूरी श्रद्धा से। यदि मेरी पत्नी चंद्रभागा चाहे, तो वह अपने पुण्य बल से इस नगर को स्थिर कर सकती है।”

ब्राह्मण ने यह सब बातें लौटकर चंद्रभागा को सुनाईं। पहले तो वह संदेह में पड़ गई और बोली –

“क्या यह कोई स्वप्न है?”

ब्राह्मण ने कहा –

“नहीं, मैंने स्वयं अपनी आँखों से सब देखा है।”

चंद्रभागा ने उत्साह से कहा –

“यदि ऐसा है तो मैं अपने पति के पास अवश्य जाऊँगी। अपने व्रतों के प्रभाव से मैं उस नगर को स्थिर कर दूँगी।”

फिर ब्राह्मण चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत पर पहुँचा और महर्षि वामदेव से मिलवाया। वामदेव ने उसका अभिषेक किया और मंत्रों से उसका शुद्धिकरण किया। तब चंद्रभागा ने दिव्य देह धारण की और देवपुर पहुँच गई।

वहाँ सोभन ने प्रसन्न होकर उसे अपने सिंहासन पर अपने पास बैठाया।

चंद्रभागा ने कहा

“प्रिय! मैं बचपन से ही, आठ वर्ष की आयु से एकादशी व्रत का पालन करती आ रही हूँ। इन्हीं व्रतों के पुण्य प्रभाव से यह नगर अब स्थिर होगा और प्रलय के अंत तक बना रहेगा।”

इस प्रकार चंद्रभागा और सोभन दोनों पति-पत्नी उस दिव्य नगर में सुखपूर्वक रहने लगे।

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