पापमोचनी एकादशी

पापमोचनी एकादशी

चैत्र मास की कृष्ण पक्ष एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन किए जाने वाले उपवास से सभी पापों का नाश होता है और आत्मा शुद्ध होती है। यह व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही, यह दिन श्री हरि विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी होता है।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

राजा मान्धाता ने धर्म के रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा:                                                                                                         

“हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य अपने पापों से कैसे मुक्ति पा सकता है? कृपया ऐसा सरल उपाय बताइए, जिससे सभी लोग अपने पापों से आसानी से छुटकारा पा सकें।”

महर्षि लोमश ने कहा:

“हे राजन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचिनी कहलाती है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।

प्राचीन काल में ‘चैत्ररथ’ नामक एक सुंदर वन था। वहाँ अप्सराएँ किन्नरों के साथ विचरण किया करती थीं। वहां हमेशा वसंत का मौसम रहता था, फूलों की खुशबू और रंग बिखरे रहते थे। कभी गंधर्व कन्याएँ वहां गाती और नृत्य करतीं, कभी देवता अपनी क्रीड़ाओं में व्यस्त रहते।

उस वन में मेधावी नामक एक ऋषि तपस्या में लीन रहते थे। वे परम शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक अप्सरा ने उनकी साधना से मोहित होकर उनकी ओर आकर्षित होना चाहा। उसने दूरी से वीणा बजाई और मधुर स्वर में गीत गाना शुरू कर दिया।

इस समय कामदेव भी महर्षि मेधावी को मोहने के प्रयास में लगे। उसने उस सुंदर अप्सरा को अपनी शक्ति से प्रभावित किया।

मेधावी ऋषि युवा और बलशाली थे। यज्ञोपवीत और दण्ड धारण किए हुए थे। उन्होंने मञ्जुघोषा के मधुर गाने और रूप को देखकर, कामदेव के प्रभाव में आकर उसके साथ रमण करना शुरू कर दिया। इतने में उन्हें दिन-रात का ज्ञान ही नहीं रहा। उन्होंने कई समय तक इस मोह में रमण किया।

एक दिन मञ्जुघोषा ने कहा: “हे ऋषिवर! अब मुझे स्वर्ग जाने की अनुमति दें।”

महर्षि ने उत्तर दिया: “अभी नहीं, थोड़ी देर और ठहरो।”

अप्सरा ने कहा: “आप स्वयं ही सोचिए, अब कितने समय से मैं आपके साथ हूँ? क्या अब और ठहरना उचित है?”

तभी महर्षि मेधावी को समय का बोध हुआ और उन्होंने देखा कि उनके रमण में ५७ वर्ष बीत चुके हैं। तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और क्रोध आया। क्रोध में उन्होंने अपनी दृष्टि से अप्सरा को श्राप दिया।

महर्षि ने कहा: “तू मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा है। अब तू पिशाचिनी बन जा।”

श्राप से मञ्जुघोषा पिशाचिनी बन गई। वह व्यथित होकर बोली:
“हे ऋषिवर! कृपया मुझे इस शाप से मुक्ति का उपाय बताइए। मैंने आपके साथ कई वर्ष व्यतीत किए हैं। अगर आप प्रसन्न न होंगे तो लोग कहेंगे कि मैं एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर भी पिशाचिनी बन गई।”

अप्सरा की बात सुन महर्षि को अपने क्रोध और भूल पर पछतावा हुआ। उन्होंने मञ्जुघोषा से कहा:

“तुमने मुझे कष्ट दिया, फिर भी मैं तुम्हें इस श्राप से मुक्ति का उपाय बताता हूँ। चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचिनी का व्रत करने से तू इस शाप से मुक्त हो जाएगी।”

मञ्जुघोषा ने उस व्रत का पालन किया और पिशाचिनी का रूप त्यागकर पुनः सुन्दर रूप धारण किया और स्वर्गलोक चली गई।

महर्षि मेधावी भी अपने पापों की क्षमा के लिए अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए। ऋषि ने कहा:

“हे पुत्र! तुम चैत्र मास की पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।”

महर्षि मेधावी ने यह व्रत विधिपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए और उन्हें शांति और पुण्य प्राप्त हुआ।

महर्षि लोमश ने राजा मान्धाता को समझाया:

“हे राजन! पापमोचिनी एकादशी के व्रत और कथा का श्रवण करने से भी अत्यधिक पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत करने से ब्रह्म हत्या, चोरी, मद्यपान जैसे भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अंत में व्यक्ति स्वर्गलोक की प्राप्ति करता है।”

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