पापांकुशा एकादशी
पापांकुशा एकादशी
आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धा-भक्ति से भगवान विष्णु का पूजन और व्रत करने से साधक को महान पुण्य की प्राप्ति होती है। कहा गया है कि जो मनुष्य यह व्रत करता है, उसे मृत्यु के पश्चात यमलोक के दुःख सहन नहीं करने पड़ते।
शास्त्रों में वर्णन है कि जितना फल मनुष्य कठिन तपस्याओं और कठोर व्रत-उपवास से प्राप्त करता है, उतना ही फल इस एकादशी का व्रत करने से सहज ही मिल जाता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा || Papankusha Ekadashi Vrat Katha
प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत की गहन वादियों में एक क्रोधन नामक बहेलिया रहता था। उसका जीवन अत्यंत कठोर और पापमय था। वह हिंसा, चोरी, शिकार, मद्यपान और दुष्ट संगति में ही दिन-रात लिप्त रहता था। करुणा और दया उसके हृदय में तनिक भी नहीं थी। पशु-पक्षियों का वध करना और लोगों को कष्ट देना ही उसके जीवन का साधन बन चुका था।
समय बीतता गया और जब उसके जीवन का अंतिम समय समीप आया, तब यमराज के दूत उसके पास प्रकट हुए। उन्होंने कठोर स्वर में कहा “हे क्रोधन! कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है। हम तुम्हें यमलोक ले जाने के लिए आए हैं, तैयार हो जाओ।”
यह सुनते ही बहेलिए का हृदय भय से कांप उठा। मृत्यु का विचार मात्र ही उसे कंपा गया। उसके पाप कर्मों की स्मृति ने उसे अत्यंत चिंतित कर दिया। भयभीत अवस्था में वह पर्वत से उतरकर समीप स्थित महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचा।
वह वहाँ जाकर ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और करुण स्वर में बोला “हे ऋषिवर! मैंने अपने पूरे जीवन में केवल पाप ही किए हैं। शिकार, हिंसा, मद्यपान और अनैतिक कार्य ही मेरा आधार रहे। अब मृत्यु समीप आ चुकी है। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पाप धुल जाएँ और मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो सके।
ऋषि अंगिरा करुणा सागर थे। उन्होंने उसकी विनती सुनकर उसे धर्ममार्ग का उपदेश दिया और कहा हे क्रोधन! यदि तुम वास्तव में पश्चाताप करते हो और पापों से मुक्त होना चाहते हो, तो अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से छुटकारा मिलता है और अंततः वह भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त होता है।
ऋषि की वाणी सुनकर बहेलिये ने निश्चय किया और पूरे श्रद्धा भाव से पापांकुशा एकादशी व्रत का पालन किया। उसने उपवास रखा, स्नान-ध्यान किया और भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना की। साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी किया।
व्रत पूर्ण होने पर अद्भुत चमत्कार हुआ। बहेलिये के सभी पाप क्षणभर में नष्ट हो गए। उसका हृदय निर्मल और शांत हो गया। जब यमदूत पुनः उसे लेने आए, तो उन्होंने देखा कि अब वह बहेलिया दिव्य तेज से प्रकाशित हो चुका है और उसे श्रीविष्णु के पार्षद लेने आ पहुंचे हैं। यह देखकर यमदूत विस्मित हो गए और बिना उसे ले जाए ही यमलोक लौट गए।
भगवान विष्णु की कृपा से क्रोधन बहेलिया मृत्यु के पश्चात् विष्णु लोक को प्राप्त हुआ और उसे शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति हुई।
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