मोहिनी एकादशी
मोहिनी एकादशी
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से न केवल इस जन्म के पाप, बल्कि पूर्वजन्म के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। व्यक्ति सुखमय जीवन व्यतीत करता है और मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है। इसके महत्व के बारे में सबसे पहले भगवान श्रीराम को उनके गुरु वशिष्ठ ने बताया था। बाद में महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने भी युधिष्ठिर को इसका महत्व समझाया था। कहा जाता है कि मोहिनी एकादशी की कथा को केवल पढ़ने या सुनने मात्र से ही हजार गायों के दान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
मोहिनी एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के सुंदर तट पर भद्रावती नाम की नगरी बसी हुई थी। इस नगरी पर चंद्रवंश में उत्पन्न एक धर्मात्मा राजा द्युतिमान राज्य करते थे।
उसी नगर में धनपाल नाम का एक अत्यंत समृद्ध और पुण्यात्मा वैश्य रहता था। धनपाल बहुत ही दानी और धर्मपरायण था। वह लोगों के लिए कुएँ, तालाब, बगीचे, धर्मशालाएँ और मठ बनवाता था। भगवान विष्णु के प्रति उसकी अपार भक्ति थी और वह हर समय पुण्यकर्म में लीन रहता था।
- सुमना
- द्युतिमान
- मेधावी
- सुकृत
- धृष्टबुद्धि
इन पाँचों में सबसे छोटा था धृष्टबुद्धि। उसका स्वभाव बिलकुल विपरीत था। वह पाप कर्मों में लिप्त रहता, जुआ खेलने का शौकीन था और वेश्याओं की संगति में अपना जीवन बिगाड़ता था। न तो उसे देवताओं की पूजा का ध्यान था और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सम्मान की परवाह। धीरे-धीरे उसने पिता का संचित धन भी दुराचार में नष्ट कर दिया। एक दिन धृष्टबुद्धि नगर के चौराहे पर वेश्याओं के साथ घूमता हुआ लोगों को दिख गया। यह देखकर धनपाल ने क्रोधित होकर उसे घर से निकाल दिया। परिवार और संबंधियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया।
अब धृष्टबुद्धि भटकते-भटकते दुख और निराशा से भर गया। भूख, प्यास और तिरस्कार से पीड़ित होकर वह इधर-उधर भटकने लगा।
एक दिन संयोग से वह महान ऋषि कौण्डिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा। उस समय वैशाख मास का शुभ समय था। ऋषि गंगाजी में स्नान कर आश्रम लौट रहे थे। धृष्टबुद्धि, जो अपने पापों और दुखों से व्याकुल था, उनके पास जाकर हाथ जोड़कर बोला –
“हे मुनिवर! कृपा करके मुझे ऐसा कोई व्रत बताइए, जिससे मेरे जीवन के पाप नष्ट हो जाएँ और मुझे मुक्ति का मार्ग मिल सके।” ऋषि कौण्डिन्य ने करुणा पूर्वक उत्तर दिया –
“वत्स! वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करो। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के अनेक जन्मों के पाप, चाहे वे मेरु पर्वत जितने बड़े क्यों न हों, समाप्त हो जाते हैं।”
ऋषि के वचन सुनकर धृष्टबुद्धि के हृदय में आशा और शांति का संचार हुआ। उसने विधि-विधान से मोहिनी एकादशी का व्रत किया और भक्ति भाव से भगवान विष्णु की पूजा की।
इस व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के सारे पाप नष्ट हो गए। उसे दिव्य शरीर प्राप्त हुआ और अंत में वह भगवान विष्णु के धाम को चला गया, जहाँ उसे अनंत सुख की प्राप्ति हुई।
फलश्रुति (संदेश):
मोहिनी एकादशी का व्रत अति पवित्र और कल्याणकारी है। इसके प्रभाव से मनुष्य पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। जो भी भक्त इस व्रत कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे सहस्र गोदान के बराबर पुण्य मिलता है।
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