इंदिरा एकादशी
इंदिरा एकादशी
इंदिरा एकादशी व्रत कथा || Indira Ekadashi Vrat Katha
सतयुग में महिष्मती नगरी नामक एक विशाल और समृद्ध राज्य था। इस राज्य के अधिपति थे राजा इंद्रसेन। वे पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल राजा थे। उनके राज्य में धन-धान्य, ऐश्वर्य और सुख-संपदा की कोई कमी नहीं थी। प्रजा भी अत्यंत सुखी और निश्चिंत जीवन व्यतीत करती थी।
एक दिन देवर्षि नारद मुनि महर्षियों के समान तेजस्वी स्वरूप धारण कर राजा इंद्रसेन की सभा में पधारे। राजा ने अत्यंत विनम्र भाव से उनका स्वागत किया और आसन ग्रहण करने की प्रार्थना की। जब नारद जी विराजमान हुए, तब उन्होंने राजा से कहा
“राजन्! मैं अभी-अभी यमलोक से होकर आ रहा हूँ। वहाँ मेरी भेंट आपके पिताश्री से हुई। उन्होंने आप तक एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश पहुँचाने का आग्रह किया है। वे कह रहे थे कि अपने जीवनकाल में एक बार उन्होंने एकादशी व्रत का पालन अधूरा छोड़ दिया था, जिसके कारण वे अभी तक यमलोक से मुक्त नहीं हो पाए हैं। उनके पापों का बोझ उन्हें स्वर्ग और वैकुण्ठ तक पहुँचने से रोक रहा है। अतः वे आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि आप किसी उपाय द्वारा उन्हें मोक्ष प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करें।”
यह सुनकर राजा इंद्रसेन का हृदय व्याकुल हो उठा। वे गंभीर स्वर में नारद मुनि से बोले – “हे देवर्षि! मेरे पिता ने सदैव धर्म का पालन किया। यदि केवल एकादशी व्रत के भंग होने से उन्हें मुक्ति नहीं मिल रही है, तो कृपया आप मुझे वह उपाय बताइए जिससे मैं अपने पिताश्री को इस दुःखदायी स्थिति से छुटकारा दिला सकूँ।”
नारद जी ने अत्यंत शांत और करुणामय स्वर में उत्तर दिया – “राजन्! यदि आप अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेंगे, तो आपके पिताश्री को अवश्य ही समस्त पापों से मुक्ति मिल जाएगी। इस व्रत के प्रभाव से वे वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करेंगे और आपको भी मृत्यु उपरांत विष्णु लोक की प्राप्ति होगी।”
नारद जी का यह उपदेश सुनकर राजा इंद्रसेन ने दृढ़ संकल्प किया। उन्होंने विधिवत इंदिरा एकादशी व्रत का पालन किया। व्रत के दिन वे प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना करने लगे। उन्होंने धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और जल अर्पित कर पूरे भक्ति भाव से उपवास रखा।
इसके साथ ही उन्होंने अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक श्राद्ध एवं तर्पण किया। ब्राह्मणों को भोजन कराया और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी किया। व्रत का यह प्रभाव अद्भुत रहा। उनके पिताश्री यमलोक से मुक्त होकर वैकुण्ठ धाम को प्रस्थान कर गए।
व्रत के इस पुण्य से राजा इंद्रसे न का हृदय भी संतोष और शांति से भर गया। जब उनकी आयु समाप्त हुई तो वे स्वयं भी दिव्य देह धारण कर भगवान विष्णु के परमधाम वैकुण्ठ लोक को प्राप्त हुए।
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