देव प्रबोधिनी एकादशी

देव प्रबोधिनी एकादशी

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं, चातुर्मास समाप्त होता है। इस दिन से सभी मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।

यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायिनी मानी गई है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस व्रत के फलस्वरूप मनुष्य को हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।

इस व्रत का प्रभाव इतना महान है कि मनुष्य के जीवन के बड़े से बड़े पाप भी क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि पूर्वजन्मों में किए गए अनेक पापकर्म भी इस एकादशी के पालन से मिट जाते हैं।

जो साधक दृढ़ संकल्प लेकर हृदय में यह निश्चय करते हैं कि वे प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करेंगे, उनके भी सौ जन्मों के पाप स्वतः नष्ट हो जाते हैं।

इस एकादशी की विशेषता रात्रि जागरण है। जो भक्त इस दिन रात्रि में प्रभु का स्मरण करते हुए जागरण करते हैं, उनकी बीती हुई और आने वाली दस पीढ़ियाँ विष्णुलोक में वास करती हैं। उनके पितृ नरक के कष्टों से मुक्त होकर परमधाम में सुख का अनुभव करते हैं।

ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी इस पावन रात्रि के जागरण से नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस जागरण का पुण्य अश्वमेध और अन्य यज्ञों से भी बढ़कर माना गया है।

सभी तीर्थयात्राओं का पुण्य, गौदान, स्वर्णदान तथा भूमिदान का फल भी देव प्रबोधिनी एकादशी की रात्रि के जागरण के समान नहीं होता। इस दिन के व्रत और जागरण के प्रभाव से कायिक (शरीर से), वाचिक (वाणी से) तथा मानसिक सभी प्रकार के पापों का शमन होकर साधक को पवित्रता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

देव प्रबोधिनी एकादशी प्रथम व्रत कथा

एक बार माता लक्ष्मी जी ने भगवान श्रीनारायण से निवेदन किया –
“हे नाथ! आप जब जागते हैं तो दिन-रात निरंतर जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो सहस्रों वर्षों तक निद्रा में लीन रहते हैं। आपकी इस दीर्घ निद्रा के समय संपूर्ण चराचर का नाश हो जाता है।

आपका यह नियम देवताओं के लिए और विशेषकर मेरे लिए अत्यंत कष्टप्रद हो जाता है। मैं निरंतर आपकी सेवा में लगी रहती हूँ और मुझे तनिक भी विश्राम का अवसर नहीं मिल पाता। अतः आप प्रतिवर्ष किसी निश्चित समय पर ही निद्रा ग्रहण करें, ताकि मुझे और अन्य देवताओं को कुछ अवकाश मिल सके।”

लक्ष्मी जी की मधुर वाणी सुनकर भगवान श्रीहरि मुस्कराए और बोले –

“देवि! तुम्हारा कथन सत्य है। मेरे जागते रहने से देवताओं को और विशेष रूप से तुम्हें निरंतर सेवा का कष्ट उठाना पड़ता है। इसलिए आज से मैं प्रत्येक वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन करूंगा। इन चार महीनों में तुम्हें और देवगणों को विश्राम का अवसर मिलेगा।

मेरी यह निद्रा ‘अल्पनिद्रा’ कहलाएगी और प्रलय के समय की निद्रा ‘महानिद्रा’ कहलाएगी। यह अल्पनिद्रा मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी और पुण्यवर्धिनी होगी। इस अवधि में जो भी भक्त मेरी शयन भावना करके मेरी सेवा करेंगे तथा मेरे शयन और प्रबोधन के उत्सव श्रद्धा-भक्ति से मनाएंगे, उनके घर में मैं स्वयं तुम्हारे सहित निवास करूंगा और उन्हें अनंत सुख-समृद्धि का वरदान प्रदान करूंगा।”

देव प्रबोधिनी एकादशी द्वितीय व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत बड़े श्रद्धा और नियमपूर्वक करते थे। उस राज्य में ऐसा नियम था कि एकादशी के दिन नौकर-चाकरों से लेकर पशु-पक्षियों तक को भी अन्न नहीं दिया जाता था।

एक दिन किसी अन्य राज्य का एक व्यक्ति उस राजा के पास आया और बोला –

“महाराज! कृपा करके मुझे अपनी सेवा में नौकरी दे दीजिए।”

राजा ने उसकी परीक्षा लेने के लिए शर्त रखी –

“ठीक है, तुम हमारी सेवा में रह सकते हो। परंतु ध्यान रखना, रोज तो तुम्हें भोजन मिलेगा, पर एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा।”

व्यक्ति ने उस समय ‘हाँ’ कह दिया। परंतु जैसे ही एकादशी का दिन आया और उसे फलाहार देने की तैयारी की गई, वह भयभीत होकर राजा के पास गया और विनती करने लगा –
“महाराज! मेरा पेट इससे नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊँगा। कृपया मुझे अन्न दें।”

राजा ने उसे उसकी शर्त याद दिलाई। फिर भी वह अपनी बात पर अड़ा रहा। अंततः राजा ने उसे आटा, दाल और चावल देकर अनुमति दे दी।
व्यक्ति नित्य की भांति नदी के पास गया, स्नान किया और भोजन बनाने लगा। जब भोजन तैयार हुआ, तो उसने भगवान को बुलाया –

“हे भगवान! भोजन तैयार है, कृपया पधारें।”

उसके आह्वान पर पीताम्बर धारण किए हुए भगवान चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए और प्रेमपूर्वक उसके साथ भोजन करने लगे। भोजन करने के बाद भगवान अंतर्धान हो गए और वह व्यक्ति अपने कार्य में लग गया।

भगवान के साथ भोजन का चमत्कार
पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी पर वह व्यक्ति राजा से कहने लगा –

“महाराज! कृपया मुझे दुगुना अन्न दीजिए। आज तो मैं पूरा दिन भूखा रहा।”

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