एकादशी व्रत कथा – चातुर्मास्य के उपरान्त
कामिका एकादशी कथा
सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना और व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी का व्रत करने वाला भक्त विष्णु लोक को प्राप्त करता है और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु को विशेष रूप से पीले फूल, फल, तुलसी पत्र और पीले वस्त्र अर्पित करने का विधान है।शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस व्रत की कथा का श्रवण एवं पाठ करना अनिवार्य है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस कथा को सुनता है, उसे मात्र कथा सुनने से ही यज्ञ के बराबर फल प्राप्त हो जाता है।
कामिका एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है। एक गाँव में एक क्षत्रिय रहता था। वह पराक्रमी तो था परंतु स्वभाव से क्रोधी भी था। एक दिन मार्ग में उसकी किसी बात को लेकर एक ब्राह्मण से कहासुनी हो गई। विवाद इतना बढ़ा कि क्षत्रिय ने क्रोधावेश में आकर ब्राह्मण को धक्का दे दिया। दुर्भाग्यवश, ब्राह्मण गिर पड़ा और उसी समय उसकी मृत्यु हो गई।
इस घटना के पश्चात क्षत्रिय के हृदय में गहरा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण के अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था की और ग्रामवासियों से क्षमा भी माँगी। किंतु गाँव के पंडितों ने स्पष्ट कह दिया
“तुम पर ब्रह्महत्या का दोष है। जब तक इसका प्रायश्चित नहीं करोगे, तब तक हम तुम्हारे साथ किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में सम्मिलित नहीं होंगे।”
यह सुनकर क्षत्रिय अत्यंत चिंतित हो गया। उसने बार-बार प्रार्थना की कि उसे ऐसा उपाय बताया जाए जिससे वह इस पाप से मुक्त हो सके। तब विद्वान ब्राह्मणों ने कहा –
“यदि तुम सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे कामिका एकादशी कहा जाता है, का व्रत श्रद्धापूर्वक करो, भगवान विष्णु की आराधना करो, तुलसीदल अर्पित करो, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दो, तो अवश्य ही तुम्हारे पाप नष्ट हो जाएंगे।”
क्षत्रिय ने उसी क्षण निश्चय किया कि वह व्रत करेगा। नियमानुसार उसने उपवास रखा, भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की, तुलसीदल अर्पित किए और संपूर्ण रात्रि हरिनाम का कीर्तन करते हुए जागरण किया।
उस रात्रि स्वप्न में उसे स्वयं भगवान विष्णु के दर्शन हुए। भगवान प्रसन्न होकर मुस्कराए और बोले –
“हे वत्स! तुमने सच्चे मन से प्रायश्चित किया है। तुम्हारी भक्ति और निष्ठा से मैं प्रसन्न हूँ। अब तुम ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गए हो।”
प्रातः जब क्षत्रिय जागा तो उसका हृदय हल्का और शांत था। ग्रामवासियों ने भी उसकी तपस्या और श्रद्धा को देखकर उसे पुनः समाज में स्वीकार कर लिया।
तभी से कामिका एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। कहा जाता है कि इस व्रत की कथा केवल सुनने मात्र से ही यज्ञ के बराबर फल मिलता है और यदि इसे श्रद्धा से किया जाए तो मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उसे परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुत्रदा एकादशी कथा
श्रावण मास की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में इसका महत्व अत्यंत विशेष माना गया है। माना जाता है कि श्रावण और पौष मास की पुत्रदा एकादशियों का पुण्य समान होता है और ये दोनों एकादशियां संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी हैं।
इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा और आराधना करना अनिवार्य माना गया है। श्रद्धा और निष्ठा से किया गया व्रत न केवल संतान सुख प्रदान करता है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और पितरों की कृपा भी सुनिश्चित करता है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
श्री युधिष्ठिर ने पूछा “हे भगवान! मैंने श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का विस्तारपूर्वक वर्णन सुना। अब कृपया मुझे बताइए कि श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम, व्रत करने की विधि और इसका महत्व क्या है?”
भगवान ने उत्तर दिया:
“यह एकादशी पुत्रदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है। अब आप ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनिए। केवल इसे सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है और व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
द्वापर युग में महिष्मति नामक एक नगरी थी, जिसमें राजा महीजित राज्य करते थे। परंतु, उनके कोई संतान नहीं थी। इसलिए राजा को जीवन में असंतोष और दुःख महसूस होता था। उनका मानना था कि पुत्र न होने पर यह लोक और परलोक दोनों ही दुखद होते हैं।
राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए कई उपाय किए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। वृद्धावस्था आते ही उन्होंने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा:
“हे प्रजाजनों! मैंने हमेशा धर्मपूर्वक शासन किया है। न तो मैंने किसी का धन छीना, न किसी से द्वेष रखा। अपराधियों को दंड दिया और सज्जनों का सम्मान किया। फिर भी मुझे पुत्र नहीं मिला। इसका कारण क्या है?” प्रजा और मंत्रियों ने राजा की बात सुनी और निर्णय लिया कि वे वन में तपस्वी ऋषियों से मार्गदर्शन लेंगे। उन्होंने कई ऋषियों और मुनियों का दर्शन किया और अंततः एक वृद्ध तपस्वी महात्मा लोमश मुनि के आश्रम पहुंचे।
लोमश मुनि अत्यंत ज्ञानी, तपस्वी और धर्मज्ञ थे। उन्होंने पूछा कि आप लोग क्यों आए हैं। जब प्रजा ने अपनी बात बताई, तो मुनि ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्व जन्म का विवरण बताया।
मुनि ने कहा कि राजा महीजित का पूर्व जन्म एक निर्धन वैश्य था। एक बार ज्येष्ठ मास की शुक्ल द्वादशी को भूखा-प्यासा वह जलाशय पर जल पीने गया। वहीं एक गाय पी रही थी। उसने उस गाय को हटा दिया और स्वयं जल पी लिया। इस कारण उसे पुत्र वियोग का दुःख भुगतना पड़ा। लोमश मुनि ने कहा:
“श्रावण शुक्ल एकादशी, जिसे पुत्रदा एकादशी कहते हैं, इस दिन व्रत और जागरण करने से राजा का यह पूर्व जन्म का पाप नष्ट होगा और उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।”
मंत्रियों और प्रजा ने मुनि की आज्ञा अनुसार इस एकादशी का व्रत और जागरण किया।
द्वादशी के दिन राजा को व्रत का फल प्राप्त हुआ। रानी गर्भवती हुई और समय पर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ।
इसी कारण इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी पड़ा।
इस व्रत को करने से न केवल संतान सुख की प्राप्ति होती है, बल्कि सभी पाप भी नष्ट होते हैं। यह व्रत श्रद्धा और भक्ति से करने वाले व्यक्ति को इस लोक में संतान सुख और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति दिलाता है।
अजा एकादशी कथा
भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि यह एकादशी सभी पापों का नाश करने वाली है। जो व्यक्ति श्रद्धा और निष्ठा के साथ भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हुए इस एकादशी का व्रत करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। अजा एकादशी का व्रत करने वाले को इस व्रत की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए, क्योंकि केवल कथा सुनने मात्र से भी अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।
अजा एकादशी व्रत
पौराणिक युग में हरिश्चन्द्र नामक एक धर्मपरायण और सत्यनिष्ठ राजा राज्य करते थे, जो अपनी ईमानदारी और धार्मिक आचरण के लिए सर्वविदित थे। उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने के लिए देवताओं ने योजना बनाई। एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्ववामित्र उनके राज्य के अधिकारी बन गए हैं।
अगले दिन विश्ववामित्र स्वयं उनके द्वार पर आए और कहा कि उन्हें स्वप्न में दान किए गए राज्य का अधिकार प्राप्त है। राजा हरिश्चन्द्र ने अपने धर्म और सत्यनिष्ठा के अनुसार अपना संपूर्ण राज्य ऋषि को सौंप दिया। इसके साथ ही अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप उन्हें अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेचने की आवश्यकता पड़ी। एक डोम ने उन्हें खरीदा, जो श्मशान में मृतक शरीरों का अंतिम संस्कार करता था। राजा हरिश्चन्द्र स्वयं एक चाण्डाल के दास बन गए और कफन लाने का कार्य करने लगे। परन्तु इस कठिन और नीच कार्य में भी उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। कई वर्षों तक उन्होंने इस दुःख और कठिनाइयों में जीवन बिताया। मन ही मन वे चिंतित रहते कि किस प्रकार अपने पापों से मुक्ति पाई जाए। एक दिन जब वे इसी चिंता में बैठे थे, महर्षि गौतम उनके पास पहुँचे। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुःखपूर्ण कथा सुनाई।
राजा की कहानी सुनकर महर्षि गौतम अत्यंत दुःखी हुए और उन्होंने कहा कि भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखो और रात्रि जागरण करो। इस व्रत से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। महर्षि के कहने पर राजा हरिश्चन्द्र ने अजा एकादशी के दिन विधिपूर्वक उपवास रखा और रात्रि जागरण किया। उनके श्रद्धापूर्ण व्रत के प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए।
तत्क्षण स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे और पुष्पों की वर्षा होने लगी। राजा ने देखा कि उनके सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देवता खड़े हैं। उनके मृतक पुत्र को जीवित पाया, पत्नी को राजसी वस्त्र और आभूषणों से पूर्ण देखा, और अंततः वे पुनः अपने राज्य में लौट आए। यह वास्तव में ऋषि द्वारा राजा की परीक्षा थी, परंतु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से सभी पाप और माया समाप्त हो गई। अंततः राजा हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित स्वर्गलोक को चले गए। जो व्यक्ति श्रद्धा और निष्ठा के साथ अजा एकादशी का व्रत करता है और रात्रि जागरण करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और कथा श्रवण मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
परिवर्तिनी एकादशी कथा
भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं।
इस व्रत को करने और इसकी कथा सुनने से व्यक्ति सभी पापों से मुक्ति पाता है और उसका जीवन सुखी, समृद्ध और आनंदमय बनता है।
परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की विशेष पूजा की जाती है। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन भगवान वामन का पूजन करता है, वह स्वयं तीनों देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा का फल प्राप्त करता है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
त्रेतायुग में एक महान असुर राजा बलि था। वह असुर था, परंतु अत्यंत दानी, सत्यनिष्ठ और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। राजा बलि धर्म और यज्ञों में अत्यधिक विश्वास करता था। वह तप, यज्ञ और अन्य पुण्यकर्मों में निरंतर लगा रहता था। उसकी यह भक्ति इतनी महान थी कि उसने स्वर्ग में देवराज इन्द्र के स्थान पर राज्य करना शुरू कर दिया।
जब देवताओं को यह ज्ञात हुआ कि असुर राजा बलि स्वर्ग पर राज्य कर रहा है, तो वे भयभीत हो गए। सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुँचे और बलि से रक्षा करने की प्रार्थना की। भक्तिभाव से प्रेरित होकर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण किया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के सामने प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने राजा बलि से कहा, “हे राजन! यदि आप मुझे केवल तीन पग भूमि दान कर देंगे, तो इससे आपको तीनों लोकों—पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक—के दान का फल प्राप्त होगा।” राजा बलि ने भगवान की विनम्र याचना स्वीकार कर ली और दान देने के लिए तैयार हो गए। जैसे ही बलि ने दान का संकल्प लिया, भगवान ने विराट रूप धारण किया।
उन्होंने अपने पहले पांव से पृथ्वी को नापा, दूसरे पांव की एड़ी से स्वर्ग को नापा और अपने तीसरे पांव के पंजे से ब्रह्मलोक को मापा। अब तीसरे पांव के लिए राजा बलि के पास कुछ भी शेष नहीं था। इस पर राजा बलि ने अपने सिर को आगे बढ़ाया और भगवान वामन ने तीसरा पांव उनके सिर पर रख दिया। इस अद्भुत वचन-बद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बना दिया। भगवान ने राजा बलि से वचन लिया कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे। यही कारण है कि परिवर्तिनी एकादशी के दिन, भगवान की एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है और दूसरी प्रतिमा क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करती है। इस दिन भगवान विष्णु सोते समय करवट बदलते हैं, और इस दिन व्रत करने वाले को असीम पुण्य की प्राप्ति होती है।
परिवर्तिनी एकादशी का व्रत विशेष रूप से भक्ति, दान और धर्म पालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे करने से न केवल पापों का नाश होता है, बल्कि मनुष्य के जीवन में सौभाग्य, संपन्नता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इन्दिरा एकादशी कथा
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। इस व्रत का पालन करने से भक्त को मृत्यु के उपरांत श्रीहरि नारायण के लोक की प्राप्ति होती है तथा व्रती के पितरों को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। इस एकादशी के प्रभाव से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से इसका व्रत करते हैं, उनके जीवन से संकट दूर होकर सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। इस व्रत की कथा का श्रवण और स्मरण मात्र भी परम पुण्यदायी माना गया है।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
सतयुग में महिष्मती नगरी नामक एक विशाल और समृद्ध राज्य था। इस राज्य के अधिपति थे राजा इंद्रसेन। वे पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल राजा थे। उनके राज्य में धन-धान्य, ऐश्वर्य और सुख-संपदा की कोई कमी नहीं थी। प्रजा भी अत्यंत सुखी और निश्चिंत जीवन व्यतीत करती थी।
एक दिन देवर्षि नारद मुनि महर्षियों के समान तेजस्वी स्वरूप धारण कर राजा इंद्रसेन की सभा में पधारे। राजा ने अत्यंत विनम्र भाव से उनका स्वागत किया और आसन ग्रहण करने की प्रार्थना की। जब नारद जी विराजमान हुए, तब उन्होंने राजा से कहा “राजन्! मैं अभी-अभी यमलोक से होकर आ रहा हूँ। वहाँ मेरी भेंट आपके पिताश्री से हुई। उन्होंने आप तक एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश पहुँचाने का आग्रह किया है। वे कह रहे थे कि अपने जीवनकाल में एक बार उन्होंने एकादशी व्रत का पालन अधूरा छोड़ दिया था, जिसके कारण वे अभी तक यमलोक से मुक्त नहीं हो पाए हैं। उनके पापों का बोझ उन्हें स्वर्ग और वैकुण्ठ तक पहुँचने से रोक रहा है। अतः वे आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि आप किसी उपाय द्वारा उन्हें मोक्ष प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करें।”
यह सुनकर राजा इंद्रसेन का हृदय व्याकुल हो उठा। वे गंभीर स्वर में नारद मुनि से बोले – “हे देवर्षि! मेरे पिता ने सदैव धर्म का पालन किया। यदि केवल एकादशी व्रत के भंग होने से उन्हें मुक्ति नहीं मिल रही है, तो कृपया आप मुझे वह उपाय बताइए जिससे मैं अपने पिताश्री को इस दुःखदायी स्थिति से छुटकारा दिला सकूँ।”
नारद जी ने अत्यंत शांत और करुणामय स्वर में उत्तर दिया – “राजन्! यदि आप अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेंगे, तो आपके पिताश्री को अवश्य ही समस्त पापों से मुक्ति मिल जाएगी। इस व्रत के प्रभाव से वे वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करेंगे और आपको भी मृत्यु उपरांत विष्णु लोक की प्राप्ति होगी।”
नारद जी का यह उपदेश सुनकर राजा इंद्रसेन ने दृढ़ संकल्प किया। उन्होंने विधिवत इंदिरा एकादशी व्रत का पालन किया। व्रत के दिन वे प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना करने लगे। उन्होंने धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और जल अर्पित कर पूरे भक्ति भाव से उपवास रखा।
इसके साथ ही उन्होंने अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक श्राद्ध एवं तर्पण किया। ब्राह्मणों को भोजन कराया और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी किया। व्रत का यह प्रभाव अद्भुत रहा। उनके पिताश्री यमलोक से मुक्त होकर वैकुण्ठ धाम को प्रस्थान कर गए।
व्रत के इस पुण्य से राजा इंद्रसेन का हृदय भी संतोष और शांति से भर गया। जब उनकी आयु समाप्त हुई तो वे स्वयं भी दिव्य देह धारण कर भगवान विष्णु के परमधाम वैकुण्ठ लोक को प्राप्त हुए।
पापांकुशा एकादशी कथा
आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धा-भक्ति से भगवान विष्णु का पूजन और व्रत करने से साधक को महान पुण्य की प्राप्ति होती है। कहा गया है कि जो मनुष्य यह व्रत करता है, उसे मृत्यु के पश्चात यमलोक के दुःख सहन नहीं करने पड़ते।
शास्त्रों में वर्णन है कि जितना फल मनुष्य कठिन तपस्याओं और कठोर व्रत-उपवास से प्राप्त करता है, उतना ही फल इस एकादशी का व्रत करने से सहज ही मिल जाता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत की गहन वादियों में एक क्रोधन नामक बहेलिया रहता था। उसका जीवन अत्यंत कठोर और पापमय था। वह हिंसा, चोरी, शिकार, मद्यपान और दुष्ट संगति में ही दिन-रात लिप्त रहता था। करुणा और दया उसके हृदय में तनिक भी नहीं थी। पशु-पक्षियों का वध करना और लोगों को कष्ट देना ही उसके जीवन का साधन बन चुका था।
समय बीतता गया और जब उसके जीवन का अंतिम समय समीप आया, तब यमराज के दूत उसके पास प्रकट हुए। उन्होंने कठोर स्वर में कहा “हे क्रोधन! कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है। हम तुम्हें यमलोक ले जाने के लिए आए हैं, तैयार हो जाओ।”
यह सुनते ही बहेलिए का हृदय भय से कांप उठा। मृत्यु का विचार मात्र ही उसे कंपा गया। उसके पाप कर्मों की स्मृति ने उसे अत्यंत चिंतित कर दिया। भयभीत अवस्था में वह पर्वत से उतरकर समीप स्थित महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचा।
वह वहाँ जाकर ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और करुण स्वर में बोला
“हे ऋषिवर! मैंने अपने पूरे जीवन में केवल पाप ही किए हैं। शिकार, हिंसा, मद्यपान और अनैतिक कार्य ही मेरा आधार रहे। अब मृत्यु समीप आ चुकी है। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पाप धुल जाएँ और मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। ऋषि अंगिरा करुणा सागर थे। उन्होंने उसकी विनती सुनकर उसे धर्ममार्ग का उपदेश दिया और कहा
हे क्रोधन! यदि तुम वास्तव में पश्चाताप करते हो और पापों से मुक्त होना चाहते हो, तो अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से छुटकारा मिलता है और अंततः वह भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त होता है।
ऋषि की वाणी सुनकर बहेलिये ने निश्चय किया और पूरे श्रद्धा भाव से पापांकुशा एकादशी व्रत का पालन किया। उसने उपवास रखा, स्नान-ध्यान किया और भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना की। साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी किया।
व्रत पूर्ण होने पर अद्भुत चमत्कार हुआ। बहेलिये के सभी पाप क्षणभर में नष्ट हो गए। उसका हृदय निर्मल और शांत हो गया। जब यमदूत पुनः उसे लेने आए, तो उन्होंने देखा कि अब वह बहेलिया दिव्य तेज से प्रकाशित हो चुका है और उसे श्रीविष्णु के पार्षद लेने आ पहुंचे हैं। यह देखकर यमदूत विस्मित हो गए और बिना उसे ले जाए ही यमलोक लौट गए।
भगवान विष्णु की कृपा से क्रोधन बहेलिया मृत्यु के पश्चात् विष्णु लोक को प्राप्त हुआ और उसे शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति हुई।
रमा एकादशी कथा
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। इस पावन व्रत का पालन करने से मनुष्य को अपार पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला है और साधक को भौतिक सुखों के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।
इस व्रत का फल इतना महान माना गया है कि इसे करने वाले भक्त तथा उनके पितृगण सबको वैकुण्ठ धाम में स्थान प्राप्त होता है। व्रतधारी पर भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा बनी रहती है और उसके जीवन में शांति, समृद्धि तथा सुख का वास होता है।
रमा एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में एक धर्मनिष्ठ और सत्यवादी राजा मुचकुंद राज्य करते थे। वे बड़े विष्णु भक्त थे और सदैव एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करते थे। उनके राज्य की संपूर्ण प्रजा भी एकादशी व्रत का पालन करती थी। राजा मुचकुंद की एक सुंदर और धर्मपरायणा पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उसका विवाह उन्होंने राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से किया। एक बार कार्तिक मास की रमा एकादशी के अवसर पर सोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ ससुराल आया। उस दिन राजा मुचकुंद ने राज्य भर में घोषणा कर दी “आज रमा एकादशी का पवित्र व्रत है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष को विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करना चाहिए।” राजा की इस घोषणा से संपूर्ण राज्य उपवास और नियमों में प्रवृत्त हो गया। जब सोभन ने यह सुना तो वह चिंतित हो उठा। उसका स्वास्थ्य कमजोर था और उसका हृदय दुर्बल। वह पत्नी चंद्रभागा के पास जाकर बोला “प्रिय! यदि मैंने यह कठोर उपवास किया तो मैं मर जाऊँगा। कृपया मुझे कोई उपाय बताओ जिससे मैं इस व्रत से बच सकूँ।”
चंद्रभागा ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया
“इस राज्य में रमा एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। यहाँ तक कि बालक, वृद्ध और पशु-पक्षी भी आज के दिन अन्न का सेवन नहीं करते। यदि तुम व्रत करने में असमर्थ हो, तो किसी अन्य स्थान पर चले जाओ।” सोभन ने कहा
“नहीं, मैं कहीं और नहीं जाऊँगा। यदि मृत्यु ही नियति है तो मैं व्रत करते-करते ही मरूँगा। मैं इस व्रत का पालन अवश्य करूँगा।” सोभन ने रमा एकादशी व्रत का संकल्प लिया। उसने उपवास किया और रातभर जागरण भी किया। परंतु भूख-प्यास और दुर्बलता से उसका शरीर टूट गया। रात्रि उसके लिए अत्यंत कष्टकारी सिद्ध हुई। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व ही उपवास के कारण सोभन की मृत्यु हो गई। राजा मुचकुंद ने अपने दामाद का अंतिम संस्कार कराया और अपनी पुत्री चंद्रभागा को सती न होने का आदेश दिया। उन्होंने कहा –
“बेटी! तुम्हें सती होने की आवश्यकता नहीं है। भगवान विष्णु पर दृढ़ आस्था रखो और व्रत का पालन करती रहो।”
चंद्रभागा ने पिता की आज्ञा का पालन किया और पूरे भक्ति भाव से व्रत को पूर्ण किया।
रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से अद्भुत चमत्कार हुआ। विष्णु कृपा से सोभन को मंदराचल पर्वत पर देवपुर नामक दिव्य नगर की प्राप्ति हुई। वहाँ स्वर्ण, रत्न और मणियों की प्रचुरता थी।
एक दिन राजा मुचकुंद के नगर का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए देवपुर पहुँचा। उसने वहाँ सोभन को देखा और उससे भेंट की। सोभन ने ब्राह्मण से चंद्रभागा और राजा मुचकुंद का हाल पूछा। ब्राह्मण ने कहा –
“वे सब कुशलपूर्वक हैं। परंतु आप तो रमा एकादशी व्रत करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए थे। कृपया बताइए कि आपको यह सुंदर नगर कैसे प्राप्त हुआ?”
सोभन ने उत्तर दिया –
“हे ब्राह्मण! यह सब रमा एकादशी व्रत का ही फल है। परंतु यह नगर स्थायी नहीं है, क्योंकि मैंने यह व्रत विवशता में किया था, न कि पूरी श्रद्धा से। यदि मेरी पत्नी चंद्रभागा चाहे, तो वह अपने पुण्य बल से इस नगर को स्थिर कर सकती है।”
ब्राह्मण ने यह सब बातें लौटकर चंद्रभागा को सुनाईं। पहले तो वह संदेह में पड़ गई और बोली –
“क्या यह कोई स्वप्न है?”
ब्राह्मण ने कहा –
“नहीं, मैंने स्वयं अपनी आँखों से सब देखा है।”
चंद्रभागा ने उत्साह से कहा –
“यदि ऐसा है तो मैं अपने पति के पास अवश्य जाऊँगी। अपने व्रतों के प्रभाव से मैं उस नगर को स्थिर कर दूँगी।”
फिर ब्राह्मण चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत पर पहुँचा और महर्षि वामदेव से मिलवाया। वामदेव ने उसका अभिषेक किया और मंत्रों से उसका शुद्धिकरण किया। तब चंद्रभागा ने दिव्य देह धारण की और देवपुर पहुँच गई।
वहाँ सोभन ने प्रसन्न होकर उसे अपने सिंहासन पर अपने पास बैठाया।
चंद्रभागा ने कहा
“प्रिय! मैं बचपन से ही, आठ वर्ष की आयु से एकादशी व्रत का पालन करती आ रही हूँ। इन्हीं व्रतों के पुण्य प्रभाव से यह नगर अब स्थिर होगा और प्रलय के अंत तक बना रहेगा।”
इस प्रकार चंद्रभागा और सोभन दोनों पति-पत्नी उस दिव्य नगर में सुखपूर्वक रहने लगे।
प्रबोधिनी एकादशी कथा
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं, चातुर्मास समाप्त होता है। इस दिन से सभी मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।
यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायिनी मानी गई है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस व्रत के फलस्वरूप मनुष्य को हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।
इस व्रत का प्रभाव इतना महान है कि मनुष्य के जीवन के बड़े से बड़े पाप भी क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि पूर्वजन्मों में किए गए अनेक पापकर्म भी इस एकादशी के पालन से मिट जाते हैं।
जो साधक दृढ़ संकल्प लेकर हृदय में यह निश्चय करते हैं कि वे प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करेंगे, उनके भी सौ जन्मों के पाप स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
इस एकादशी की विशेषता रात्रि जागरण है। जो भक्त इस दिन रात्रि में प्रभु का स्मरण करते हुए जागरण करते हैं, उनकी बीती हुई और आने वाली दस पीढ़ियाँ विष्णुलोक में वास करती हैं। उनके पितृ नरक के कष्टों से मुक्त होकर परमधाम में सुख का अनुभव करते हैं।
ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी इस पावन रात्रि के जागरण से नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस जागरण का पुण्य अश्वमेध और अन्य यज्ञों से भी बढ़कर माना गया है।
सभी तीर्थयात्राओं का पुण्य, गौदान, स्वर्णदान तथा भूमिदान का फल भी देव प्रबोधिनी एकादशी की रात्रि के जागरण के समान नहीं होता। इस दिन के व्रत और जागरण के प्रभाव से कायिक (शरीर से), वाचिक (वाणी से) तथा मानसिक सभी प्रकार के पापों का शमन होकर साधक को पवित्रता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
देव प्रबोधिनी एकादशी प्रथम व्रत कथा
एक बार माता लक्ष्मी जी ने भगवान श्रीनारायण से निवेदन किया – “हे नाथ! आप जब जागते हैं तो दिन-रात निरंतर जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो सहस्रों वर्षों तक निद्रा में लीन रहते हैं। आपकी इस दीर्घ निद्रा के समय संपूर्ण चराचर का नाश हो जाता है।
आपका यह नियम देवताओं के लिए और विशेषकर मेरे लिए अत्यंत कष्टप्रद हो जाता है। मैं निरंतर आपकी सेवा में लगी रहती हूँ और मुझे तनिक भी विश्राम का अवसर नहीं मिल पाता। अतः आप प्रतिवर्ष किसी निश्चित समय पर ही निद्रा ग्रहण करें, ताकि मुझे और अन्य देवताओं को कुछ अवकाश मिल सके।”
लक्ष्मी जी की मधुर वाणी सुनकर भगवान श्रीहरि मुस्कराए और बोले –
“देवि! तुम्हारा कथन सत्य है। मेरे जागते रहने से देवताओं को और विशेष रूप से तुम्हें निरंतर सेवा का कष्ट उठाना पड़ता है। इसलिए आज से मैं प्रत्येक वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन करूंगा। इन चार महीनों में तुम्हें और देवगणों को विश्राम का अवसर मिलेगा।
मेरी यह निद्रा ‘अल्पनिद्रा’ कहलाएगी और प्रलय के समय की निद्रा ‘महानिद्रा’ कहलाएगी। यह अल्पनिद्रा मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी और पुण्यवर्धिनी होगी। इस अवधि में जो भी भक्त मेरी शयन भावना करके मेरी सेवा करेंगे तथा मेरे शयन और प्रबोधन के उत्सव श्रद्धा-भक्ति से मनाएंगे, उनके घर में मैं स्वयं तुम्हारे सहित निवास करूंगा और उन्हें अनंत सुख-समृद्धि का वरदान प्रदान करूंगा।”
देव प्रबोधिनी एकादशी द्वितीय व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत बड़े श्रद्धा और नियमपूर्वक करते थे। उस राज्य में ऐसा नियम था कि एकादशी के दिन नौकर-चाकरों से लेकर पशु-पक्षियों तक को भी अन्न नहीं दिया जाता था।
एक दिन किसी अन्य राज्य का एक व्यक्ति उस राजा के पास आया और बोला –
“महाराज! कृपा करके मुझे अपनी सेवा में नौकरी दे दीजिए।” राजा ने उसकी परीक्षा लेने के लिए शर्त रखी –
“ठीक है, तुम हमारी सेवा में रह सकते हो। परंतु ध्यान रखना, रोज तो तुम्हें भोजन मिलेगा, पर एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा।”
व्यक्ति ने उस समय ‘हाँ’ कह दिया। परंतु जैसे ही एकादशी का दिन आया और उसे फलाहार देने की तैयारी की गई, वह भयभीत होकर राजा के पास गया और विनती करने लगा –
“महाराज! मेरा पेट इससे नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊँगा। कृपया मुझे अन्न दें।”
राजा ने उसे उसकी शर्त याद दिलाई। फिर भी वह अपनी बात पर अड़ा रहा। अंततः राजा ने उसे आटा, दाल और चावल देकर अनुमति दे दी। व्यक्ति नित्य की भांति नदी के पास गया, स्नान किया और भोजन बनाने लगा। जब भोजन तैयार हुआ, तो उसने भगवान को बुलाया –
“हे भगवान! भोजन तैयार है, कृपया पधारें।”
उसके आह्वान पर पीताम्बर धारण किए हुए भगवान चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए और प्रेमपूर्वक उसके साथ भोजन करने लगे। भोजन करने के बाद भगवान अंतर्धान हो गए और वह व्यक्ति अपने कार्य में लग गया।
भगवान के साथ भोजन का चमत्कार पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी पर वह व्यक्ति राजा से कहने लगा –
“महाराज! कृपया मुझे दुगुना अन्न दीजिए। आज तो मैं पूरा दिन भूखा रहा।”
राजा ने कारण पूछा। उसने उत्तर दिया –
“महाराज! भगवान भी मेरे साथ भोजन करते हैं। इसलिए हमारे दोनों के लिए सामान कभी पूरा नहीं होता।” राजा यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गया और बोला –
“मैं विश्वास नहीं कर सकता कि भगवान तुम्हारे साथ भोजन करते हैं। मैं स्वयं तो कई वर्षों से व्रत और पूजा करता आ रहा हूँ, फिर भी उन्होंने मुझे दर्शन नहीं दिए।”
व्यक्ति ने कहा –
“महाराज! यदि आप विश्वास नहीं करते, तो मेरे साथ चलकर देख लें।”
राजा ने एक वृक्ष के पीछे छिपकर देखा। व्यक्ति ने नित्य की भांति भोजन तैयार किया और शाम तक भगवान को बुलाया। परंतु भगवान प्रकट नहीं हुए। अंत में उसने कहा –
“हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूँगा।”
उसके दृढ़ निश्चय और श्रद्धा को देखकर भगवान स्वयं प्रकट हुए, उसे रोका और साथ बैठकर भोजन किया। इसके बाद उन्होंने उसे अपने विमान में बैठाकर अपने धाम में ले गए।
राजा को ज्ञान
यह देखकर राजा को यह सीख मिली कि व्रत-उपवास का वास्तविक फल तभी मिलता है, जब मन पूर्णतः शुद्ध और श्रद्धापूर्ण हो। इसके बाद राजा ने भी मन से व्रत करने का निश्चय किया और अंततः स्वर्ग की प्राप्ति की।
देवप्रबोधिनी एकादशी तृतीय व्रत कथा
एक नगर में एक धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। उसके राज्य में सभी लोग सुख-शांति और समृद्धि के साथ रहते थे। उस नगर में एकादशी का नियम यह था कि उस दिन कोई अन्न न बेचता, न पकाता; सभी केवल फलाहार करते थे और व्रत का पालन करते थे।
एक बार भगवान नारायण ने उस राजा की भक्ति और धर्म की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने एक सुंदरी का रूप धारण किया और नगर की सड़कों पर बैठ गए। राजा जब उधर से निकला, तो उसने उस सुंदरी को देखा और चकित होकर पूछा –
“हे सुंदरी! आप कौन हैं और इस तरह यहां क्यों बैठी हैं?”
सुंदरी के रूप में भगवान बोले –
“मैं निराश्रिता हूँ। नगर में मेरा कोई परिचित नहीं है। किससे सहायता माँगूँ?”
राजा उसके रूप पर मोहित हो गया और बोला –
“तुम मेरे महल में चलो, मेरी रानी बनो और आराम से रहो। मैं तुम्हारी सेवा करूंगा।”
सुंदरी ने कहा –
“यदि मैं आपकी रानी बनूँ, तो राज्य का अधिकार मुझे सौंपना होगा। राज्य पर मेरा पूर्ण अधिकार रहेगा। मैं जो भी बनाऊँगी, आपको उसे स्वीकार करना होगा।”
राजा उसके रूप में मोहित था, अतः उसने सभी शर्तें स्वीकार कर लीं।
अगले दिन एकादशी थी। रानी ने हुक्म दिया कि बाजार में अन्य दिनों की भांति अन्न बिके और घर में मांस, मछली आदि पकवाए जाएँ। उसने राजा से कहा कि वह भोजन करें। राजा ने देखा और कहा –
“महारानी! आज एकादशी है। मैं केवल फलाहार करूंगा।”
रानी ने कहा –
“शर्त याद है न? या तो खाना खाओ, नहीं तो बड़े राजकुमार का सिर कट जाएगा।”
राजा भयभीत हो गया और अपने पुत्र को बचाने का उपाय सोचने लगा। उसने अपनी परेशानी रानी से कह दी।
रानी ने उत्तर दिया –
“महाराज! धर्म न छोड़ें। पुत्र तो फिर मिल जाएगा, पर धर्म खो जाएगा। यदि धर्म बचाना है, तो बड़े राजकुमार का सिर दे देना चाहिए।” इसी समय बड़ा राजकुमार खेलते-खेलते आया। उसने मां की आंखों में आंसू देखे और कारण पूछा। मां ने पूरी बात बताई।
राजकुमार ने निःसंकोच कहा –
“मां! यदि पिता का धर्म बचाने के लिए मेरा बलिदान देना आवश्यक है, तो मैं तैयार हूँ। पिताजी का धर्म सुरक्षित रहेगा।”
राजा दुःखी मन से अपने पुत्र का बलिदान देने को तैयार हुआ। तभी रानी का रूप भगवान विष्णु का वास्तविक रूप बन गया। भगवान बोले –
“राजन! तुमने इस कठिन परीक्षा में अपनी भक्ति, धर्म और साहस का परिचय दिया। तुम सफल हुए।” भगवान प्रसन्न होकर राजा से वरदान
मांगने लगे। राजा ने नम्रता से कहा –
“हे प्रभु! आपका दिया हुआ सब कुछ है। कृपया हमारा उद्धार करें।” तत्क्षण वहाँ एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। राजा ने अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और उस विमान में बैठकर परमधाम की ओर प्रस्थान किया।
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