बृहस्पति व्रत कथा
बृहस्पति व्रत कथा
बहुत पहले की बात है। भारत में एक राजा था जो बहुत दानी और धर्मात्मा था। वह रोज मंदिर जाता, पूजा करता और गरीबों की मदद करता था। लेकिन उसकी रानी को ये सब पसंद नहीं था। उसे न दान में रुचि थी, न पूजा में।
एक दिन जब राजा शिकार पर गया हुआ था, तो एक साधु (बृहस्पतिदेव) भिक्षा माँगने महल आए। रानी ने दान देने से मना कर दिया और उल्टा कहने लगी, “मुझे इस धन से छुटकारा चाहिए! राजा हर समय दान करता रहता है, मैं इससे तंग आ गई हूँ।”
साधु ने कहा, “धन से कौन दुखी होता है? इससे तो पुण्य कार्य करो, दान दो, कुएं-बावड़ी बनवाओ, ज़रूरतमंदों की मदद करो।”
लेकिन रानी पर कोई असर नहीं हुआ। उसने फिर ज़िद की कि सारा धन नष्ट हो जाए।
साधु बोले, “अगर तुम धन नाश चाहती हो तो ऐसा करो:
- बृहस्पतिवार को घर लीपो,
- बाल पीली मिट्टी से धोओ,
- राजा से दाढ़ी बनवाओ,
- मांस-मदिरा का सेवन करो,
- कपड़े धोबी को दो।
अगर ऐसा करोगी तो सात गुरुवार में ही सारा धन खत्म हो जाएगा।
साधु ये कहकर अंतर्ध्यान हो गए।
रानी ने वैसा ही किया और कुछ ही दिनों में धन-संपत्ति, सुख-सुविधा सब चला गया। राजा और रानी को खाने के भी लाले पड़ गए। राजा ने तय किया कि वह परदेश जाकर काम करेगा। वह लकड़ियाँ काटकर शहर में बेचने लगा।
इधर रानी बहुत दुखी रहने लगी। सात दिन तक भूखे रहने के बाद, उसने दासी को अपनी बहन के पास भेजा कि “थोड़े बेझर (अनाज) मांग लाओ।”
जब दासी गई तो उसकी बहन बृहस्पतिवार व्रत कथा सुन रही थी। दासी को कोई उत्तर नहीं मिला। वह दुखी होकर लौट आई।
रानी ने दुखी होकर कहा, “यह सब मेरे कर्मों का फल है। भगवान जो चाहे करेंगे।” लेकिन बाद में उसकी बहन खुद मिलने आई और बताया कि कथा के दौरान न उठते हैं न बोलते हैं, इसलिए उत्तर नहीं दे सकी।
बहन ने कहा, “घर में जाकर देखो, शायद कुछ अनाज मिल जाए।” दासी जब अंदर गई तो पूरा घड़ा भरा हुआ था!
अब रानी को विश्वास हुआ। दासी बोली, “जब हम भूखे रहते हैं, वो भी तो एक तरह से व्रत ही है, तो क्यों न हम भी बृहस्पतिवार का व्रत करें?”
बृहस्पतिवार व्रत विधि
रानी की बहन ने बताया:
- केले के पेड़ की जड़ में विष्णु भगवान का पूजन करें।
- चना, गुड़, मुनक्का से पूजा करें।
- पीले रंग का खाना खाएं और एक समय ही भोजन करें।
रानी और दासी ने ऐसा ही किया। खाने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन बृहस्पतिदेव साधारण व्यक्ति बनकर पीला भोजन दो थालों में लेकर आए और दे गए।
फिर से खुशियाँ लौटीं
रानी ने पूजन किया और हर गुरुवार व्रत करने लगी।
धन-संपत्ति लौट आई, लेकिन फिर आलस्य करने लगी।
तब दासी ने उसे समझाया – “अब फिर से वही गलती मत करना। इस बार धन को अच्छे कामों में लगाओ – दान, कुएं-बावड़ी, कन्यादान, धर्मशाला आदि में खर्च करो।”
रानी ने बात मानी और शुभ कर्म करने लगी। उसका यश फैल गया।
राजा की वापसी और स्वप्न संकेत
रानी और दासी ने बृहस्पति देव से प्रार्थना की कि राजा जहाँ भी हों, वापस लौट आएं।
उधर, राजा को स्वप्न में बृहस्पतिदेव ने दर्शन दिए और कहा – अपनी पत्नी तुम्हें याद करती है, घर लौट जाओ।
अगली सुबह साधु वेश में फिर बृहस्पति देव जंगल में राजा से मिले और बोले:
“तुम्हारी पत्नी ने अब व्रत शुरू कर दिया है। तुम भी व्रत करो, सब ठीक हो जाएगा।”
राजा ने कहा कि उसके पास साधन नहीं हैं, लेकिन साधु ने भरोसा दिलाया कि भगवान खुद राह बनाएंगे।
राजा ने गुरुवार को पूजा की और उसी दिन दोगुनी आमदनी हुई। अब वह भी व्रत करने लगा।
Brihaspativar Vrat Ka Mahatva (महत्त्व)
- इस व्रत से धन, संतान, सुख और सम्मान मिलता है।
- गुरु ग्रह मज़बूत होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है।
- जो भी इस कथा को श्रद्धा से सुनता/पढ़ता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
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