भाद्रपद अमावस्या व्रत कथा

भाद्रपद अमावस्या

भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह तिथि पितरों की शांति के लिए अत्यंत पुण्यदायिनी मानी जाती है। इस दिन किए गए तर्पण, श्राद्ध और दान से पितरों को शांति मिलती है और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। विष्णु जी की आराधना करने से समस्त पापों का नाश होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करके दीपक जलाने से समस्त देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है और पितृ दोष भी शांत होता है।

भाद्रपद अमावस्या व्रत कथा

किसी गांव में एक धर्मपरायण ब्राह्मण दम्पति का निवास था। दोनों प्रभुभक्त थे और उनके पास सांसारिक सुख-सुविधाओं की कमी नहीं थी। परंतु एक बात उन्हें सदा कष्ट देती रहती – उनके यहां संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ था। इस अभाव ने उन्हें अत्यंत दुखी कर रखा था।

एक दिन ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा, “हे देवी! मैं वन में जाकर कठोर तप करूंगा। प्रभु की कृपा से अवश्य कोई मार्ग निकलेगा।” इस प्रकार भगवान पर अटूट विश्वास रखकर वह जंगल की राह ले चुका।

घने वन में पहुंचकर उसने कठिन तपस्या आरंभ की। वर्षों तक निरंतर साधना में लीन रहा।

अनेक वर्षों की कठोर तपस्या के पश्चात भी जब कोई फल प्राप्त नहीं हुआ तो ब्राह्मण के मन में वैराग्य जागा। निराशा में डूबकर उसने विचार किया, “अब इस व्यर्थ जीवन को समाप्त कर देना ही उचित है।”

यह सोचकर वह एक वृक्ष की शाखा पर रस्सी का फंदा बनाकर अपना जीवन समाप्त करने को तत्पर हो गया।

सुख अमावस्या का प्राकट्य

उसी क्षण एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई और सुख अमावस्या देवी का रूप धारण कर बोली, “हे ब्राह्मण! रुको! तुम्हारे भाग्य में सात जन्मों तक संतान का योग नहीं लिखा है। किंतु तुम्हारी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें दो कन्याओं का वरदान देती हूं।”

देवी ने आगे कहा, “एक कन्या का नाम अमावस्या और दूसरी का नाम पूनम रखना। अपनी पत्नी से कहना कि वह सुख अमावस्या का नियमित व्रत करे। अमावस्या के दिन चावल से भरा कटोरा लेकर उसमें दक्षिणा रखकर किसी मंदिर में दान करे। यह नियम एक वर्ष तक निरंतर करे।”

ब्राह्मण आनंद से भरकर घर लौटा। उसने सारा वृत्तांत पत्नी को सुनाया। ब्राह्मणी ने श्रद्धापूर्वक अमावस्या का व्रत आरंभ किया।

कुछ समय पश्चात देवी के वचन के अनुसार उनके घर दो कन्याओं का जन्म हुआ। ब्राह्मण ने देवी के आदेशानुसार उनके नाम अमावस्या और पूनम रखे।

दो बहनों के विपरीत स्वभाव

समय बीतने पर दोनों कन्याओं का विवाह हुआ। बड़ी बहन अमावस्या अत्यंत धर्मपरायण और भक्तिपरायण थी। उसके घर में सुख, समृद्धि और वैभव का अक्षय भंडार था।

इसके विपरीत छोटी बहन पूनम का स्वभाव भगवद्भक्ति से दूर था। फलस्वरूप उसके जीवन में दुखों का अंत नहीं था।

जब अमावस्या को अपनी छोटी बहन की दुर्दशा का ज्ञान हुआ तो वह उपहारों से भरी गाड़ी लेकर पूनम के घर पहुंची।

उसने प्रेम से कहा, “प्रिय बहन! तुम भी सुख अमावस्या का व्रत करो। विधिपूर्वक पूजा और उपवास करो। एक वर्ष तक चावल का कटोरा दक्षिणा सहित दान करते रहो। इससे तुम्हारे घर में भी सुख-समृद्धि का भंडार भर जाएगा।”

व्रत का चमत्कारी प्रभाव

पूनम ने बड़ी बहन की सलाह मानकर श्रद्धापूर्वक सुख अमावस्या का व्रत आरंभ किया। कुछ ही समय में उसके घर में भी धन-धान्य की वृद्धि होने लगी और संतान सुख की प्राप्ति हुई।

जो भी व्यक्ति श्रद्धा और विधिपूर्वक सुख अमावस्या का व्रत करता है, उसके घर में देवी की कृपा से सुख-समृद्धि का भंडार भर जाता है।

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