
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की सबसे ऊंची चोटी पर, 3,359 मीटर की ऊंचाई पर, एक मंदिर ऐसा भी है जिसकी सबसे बड़ी पहचान वो चीज़ है जो उसके पास नहीं है छत। शिकारी देवी मंदिर पूरी तरह खुले आसमान के नीचे है, और जितनी बार भी किसी ने इस पर छत बनाने की कोशिश की, वो या तो तूफान में उड़ गई या अपने आप ढह गई। यहां तक कि हिमाचल के छह बार मुख्यमंत्री रह चुके वीरभद्र सिंह की कोशिश भी कामयाब नहीं हुई।
यह लेख आपको बताएगा कि shikari devi temple का रहस्य क्या है, इसका इतिहास कहां से शुरू होता है, जंजैहली या करसोग से वहां तक कैसे पहुंचें, यात्रा में कितना खर्च आएगा, और कब जाना सबसे सही रहेगा सब कुछ एक जगह पर।
एक नज़र में शिकारी देवी मंदिर
| जानकारी | विवरण |
| स्थान | जिला मंडी, सेराज घाटी, हिमाचल प्रदेश |
| ऊंचाई (shikari devi temple height) | 3,359 मीटर (लगभग 11,013 फीट) |
| निकटतम बेस टाउन | जंजैहली (18 किमी), करसोग (21 किमी) |
| मंडी से दूरी | लगभग 90-94 किमी (4-5 घंटे) |
| शिमला से दूरी | लगभग 130-171 किमी (5-6 घंटे) |
| आख़िरी चढ़ाई | 550 से 700 सीढ़ियां |
| प्रवेश शुल्क | निःशुल्क |
| खुलने का समय | चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल अंत) से 15 नवंबर तक |
| सबसे अच्छा समय | अप्रैल-जून और सितंबर-अक्टूबर |
| संरक्षित क्षेत्र | शिकारी देवी वन्यजीव अभयारण्य, 7,200 हेक्टेयर |
तीन ऐसे रहस्य जिनका जवाब आज तक किसी वैज्ञानिक के पास नहीं

अधिकतर लेख शिकारी देवी की एक ही बात दोहराते हैं छत नहीं है। असल में यहां तीन अलग-अलग रहस्य एक साथ जुड़े हैं।
पहला रहस्य: छत टिकती क्यों नहीं? स्थानीय मान्यता है कि माता ईंट-पत्थर या लकड़ी से बनी छत स्वीकार नहीं करतीं। इतिहास इसका गवाह है शासकों और भक्तों ने कई बार कोशिश की, हर बार मौसम की मार से छत गिर गई। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने भी दो बार प्रयास किया, दोनों बार असफल रहे। इसके बाद उन्होंने कोशिश छोड़ दी और खुद एक श्रद्धालु के रूप में यहां आने लगे।
दूसरा रहस्य: भारी बर्फबारी में भी मूर्ति पर बर्फ क्यों नहीं जमती? सर्दियों में यहां 8 से 10 फीट तक बर्फ गिरती है और पूरा इलाका सफेद चादर में ढक जाता है। लेकिन खुले आसमान के नीचे रखी माता की मूर्तियों और गर्भगृह की जगह पर बर्फ नहीं ठहरती। हिमाचल सरकार की मंडी जिला पर्यटन वेबसाइट पर भी यह बात दर्ज है कि मंदिर परिसर में बर्फ नहीं जमती, जबकि आस-पास कई फीट बर्फ रहती है। इस पर कोई वैज्ञानिक शोध अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है।
तीसरा रहस्य: यहां का मौसम अपने ही नियम बनाता है। इस ऊंचाई पर मौसम इतना अप्रत्याशित है कि अप्रैल के महीने में भी अचानक भारी बर्फबारी हो सकती है, जब बाकी जगहों पर वसंत शुरू हो चुका होता है। कई बार पुजारी को भी मंदिर का गेट खोलना मुश्किल हो जाता है और वे बाहर से ही धूप जलाकर पूजा करते हैं।
पांडवों का रहस्यमयी मृग, मार्कंडेय की तपस्या और 64 योगिनियाँ

महाभारत काल से जुड़ी मान्यता के अनुसार, जब पांडव अपने 13 साल के अज्ञातवास के दौरान इन घने जंगलों से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने शिकार करते हुए एक अनोखा मृग देखा। मृग का पीछा करते-करते वह अचानक गायब हो गया। ध्यान लगाने पर पांडवों को एहसास हुआ कि वह मृग स्वयं देवी दुर्गा का रूप था, जिन्होंने उन्हें मार्ग दिखाने के लिए यह भेष धरा था। इसी स्थान पर पांडवों ने पत्थर जोड़कर देवी की मूर्ति स्थापित की।
दूसरी मान्यता महर्षि मार्कंडेय से जुड़ी है, जिन्होंने इसी ऊंचाई और एकांत में वर्षों तपस्या की थी। कहा जाता है कि देवी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दर्शन दिए और मंदिर के मूल स्वरूप का मार्गदर्शन दिया।
एक बात जो ज़्यादातर लेखों में छूट जाती है शिकारी देवी की मुख्य मूर्ति के साथ 64 योगिनियों की स्थापना भी मानी जाती है। यह तांत्रिक शाक्त परंपरा का हिस्सा है, जो सामान्य दुर्गा मंदिरों से अलग है। ओडिशा के हीरापुर और रानीपुर-झरियाल जैसे प्रसिद्ध 64-योगिनी मंदिर भी परंपरागत रूप से खुले आसमान के नीचे ही बनाए जाते हैं। संभव है कि शिकारी देवी की छतरहीनता उसी प्राचीन परंपरा का हिस्सा हो, न कि केवल एक “रहस्य”।
नाम ‘शिकारी देवी’ पड़ने की वजह भी दिलचस्प है स्थानीय शिकारी जंगल में जाने से पहले सुरक्षा और सफलता के लिए यहीं देवी की पूजा करते थे, और इसी वजह से देवी को शिकारियों की रक्षक और इष्ट देवी माना गया।
शिकारी देवी कहाँ है और वहां कैसे पहुंचें

शिकारी देवी मंदिर मंडी जिले की सेराज घाटी में जंजैहली और करसोग के बीच स्थित है। सबसे नज़दीकी और सबसे आसान बेस जंजैहली है।
| कहां से | दूरी | समय | ज़रूरी बात |
| जंजैहली से | 16-18 किमी | 1.5 घंटे जीप + 30-45 मिनट सीढ़ियां | सबसे सीधा और लोकप्रिय रास्ता |
| करसोग/सनारली से | ~21 किमी | करीब 2 घंटे | शिमला के दक्षिणी हिस्से से आने वालों के लिए बेहतर |
| मंडी शहर से | ~90-94 किमी | 4-5 घंटे | पक्की सड़क जंजैहली तक, फिर कच्चा रास्ता |
| शिमला से | ~130-171 किमी | 5-6 घंटे | सुंदरनगर/नेरचौक होकर, सबसे आम तीर्थयात्री रूट |
| भुंतर हवाई अड्डा | 118-200 किमी | 5-7 घंटे | निकटतम एयरपोर्ट, लेकिन कनेक्टिविटी सीमित |
हवाई और रेल मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा भुंतर (कुल्लू) है, हालांकि सर्दियों में उड़ानें अनियमित रहती हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन जोगिंदरनगर (नैरो गेज) है, जो लगभग 150 किमी दूर पड़ता है। ज़्यादातर यात्री सड़क मार्ग से चंडीगढ़-मंडी होकर आना पसंद करते हैं।
बस सेवा: एक अच्छी खबर यह है कि सुंदरनगर-जंजैहली-शिकारी देवी की सीधी HRTC बस सेवा कई सालों के अंतराल के बाद फिर शुरू हुई है, जो जीप की तुलना में काफी सस्ता विकल्प है।
जंजैहली से मंदिर तक: जीप, कच्चा रास्ता और आख़िरी 550 सीढ़ियां
जंजैहली से मंदिर की तलहटी तक करीब 16-18 किलोमीटर का कच्चा वन मार्ग है। यह रास्ता घुमावदार और चुनौतीपूर्ण है, इसलिए सामान्य कार की बजाय जीप या SUV ले जाना बेहतर रहता है। स्थानीय जीप चालक ही इस रास्ते को ठीक से जानते हैं खुद गाड़ी चलाने की कोशिश न करें।
जीप का रास्ता खत्म होने के बाद वाहन पार्क करना पड़ता है, और वहां से मंदिर तक 550 से 700 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं (अलग-अलग स्रोत अलग संख्या बताते हैं, क्योंकि किसी ने भी दोबारा गिनकर पुष्टि नहीं की)। यह चढ़ाई सामान्य फिटनेस वाले वयस्कों और 10 साल से बड़े बच्चों के लिए ठीक है, लेकिन 3,359 मीटर की ऊंचाई पर सांस थोड़ी तेज़ ज़रूर चलेगी इसे फिटनेस की कमी न समझें, यह ऊंचाई का असर है।
यात्रा का खर्च जीप से लेकर ठहरने तक (2026 अनुमानित)
| खर्च | अनुमानित राशि |
| जंजैहली से जीप (आना-जाना) | ₹1,500 – ₹3,000 |
| HPTDC ट्रेकर्स हॉस्टल, जंजैहली | ₹300 – ₹800 प्रति रात |
| सेब के बगीचे वाला होमस्टे | ₹500 – ₹2,000 प्रति रात |
| मार्केट एरिया का होटल | ₹1,500 – ₹3,000 प्रति रात |
| ढाबे में खाना | ₹100 – ₹300 प्रति व्यक्ति |
| मंदिर में प्रवेश | निःशुल्क |
बजट यात्रियों के लिए HRTC बस और होमस्टे मिलाकर पूरी यात्रा ₹2,000-2,500 में हो सकती है।
कब जाएं, कब बिल्कुल न जाएं

मई से अक्टूबर सबसे अच्छा समय है। गर्मियों (मई-जून) में मौसम सुहावना रहता है और हरे-भरे मैदान अपने पूरे रंग में होते हैं ट्रेकिंग और फोटोग्राफी दोनों के लिए बेहतरीन। सितंबर-अक्टूबर में आसमान सबसे साफ रहता है, जिससे 360-डिग्री हिमालय व्यू सबसे अच्छे मिलते हैं।
जुलाई-अगस्त (मानसून) से बचें। पहाड़ी रास्तों पर भूस्खलन का खतरा बहुत बढ़ जाता है और कच्चा वन मार्ग कीचड़ से भर जाता है।
नवंबर से मार्च तक मंदिर बंद रहता है। इस दौरान 8-10 फीट बर्फ जमा हो जाती है, रास्ता बंद हो जाता है, और पुजारी भी नीचे उतर आते हैं। सर्दियों में अकेले ट्रेकिंग करना बेहद खतरनाक है इससे जुड़े गंभीर हादसे भी हो चुके हैं, इसलिए बिना अनुभवी गाइड के इस मौसम में जाने से पूरी तरह बचें।
कहाँ ठहरें और क्या खाएं

मंदिर के पास एक फॉरेस्ट रेस्ट हाउस (FRH) है, जहां रुका जा सकता है, लेकिन बुकिंग प्रक्रिया थोड़ी पुरानी ढंग की है फ़ोन पर डिविज़नल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) से संपर्क करना पड़ता है और स्थानीय चौकीदार को भी सूचित करना ज़रूरी है। कुछ अस्थायी सराय (शेयर्ड रूम) भी मंदिर के पास मिल जाते हैं। ज़्यादातर यात्रियों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प जंजैहली में होटल या होमस्टे बुक करना है, जहां ATM, पेट्रोल पंप और बुनियादी सुविधाएं भी मौजूद हैं मंदिर के आस-पास इनमें से कुछ नहीं मिलेगा।
खाने में जंजैहली के ढाबों पर राजमा-चावल, दाल-रोटी जैसा सामान्य पहाड़ी खाना मिलता है। अगर मंडी-कुल्लू का असली स्वाद चाहिए तो सिड्डू ज़रूर आज़माएं अखरोट या गुड़-घी भरी हुई भाप में पकी रोटी, जो इसी बेल्ट की खासियत है।
शिकारी देवी वन्यजीव अभयारण्य: मोनल से हिम तेंदुए तक

मंदिर असल में 7,200 हेक्टेयर में फैले एक संरक्षित वन्यजीव अभयारण्य के बीचोबीच स्थित है, जिसकी स्थापना 1962 में हुई थी। यहां देवदार और चीड़ के घने जंगलों से लेकर ऊंचे अल्पाइन घास के मैदान तक कई तरह के वन-क्षेत्र मिलते हैं। BirdLife International ने इसे एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (Important Bird Area) घोषित किया है।
यहां हिमालयन काला भालू, तेंदुआ, गोरल, कस्तूरी मृग, हिमालयन मोनल (हिमाचल का राज्य पक्षी), वेस्टर्न ट्रैगोपैन और हिमालयन पाम सिवेट जैसे दुर्लभ वन्यजीव पाए जाते हैं। हिम तेंदुए के देखे जाने की खबरें भी आती हैं, हालांकि इनकी पुष्टि नहीं हुई है। सुबह-सुबह शांति से चलें तो मोनल दिखने की संभावना काफी अच्छी रहती है।
पास में और क्या घूमें शिकारी देवी सर्किट
अगर आप इतनी दूर आ ही रहे हैं, तो मंडी जिले के तीन बड़े रहस्यमयी शक्ति-स्थलों को एक साथ जोड़ा जा सकता है:
- कामरूनाग झील – शिकारी देवी से करीब 16 किमी दूर, एक पुराने रिज ट्रेक से जुड़ी हुई। श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर झील में सोने-चांदी के सिक्के अर्पित करते हैं, जो सदियों से पानी के अंदर जमा हैं।
- पराशर झील -मंडी का सबसे मशहूर पर्यटन स्थल, जहां एक तैरता हुआ टापू और 13वीं सदी का लकड़ी का पैगोडा मंदिर है।
- जंजैहली घाटी – सेब के बागानों से भरी शांत घाटी, कैंपिंग और हल्की ट्रेकिंग के लिए अच्छी जगह।
तीनों जगहों को मिलाकर 4-5 दिन का एक सर्किट बनाया जा सकता है, जो अकेले शिकारी देवी जाने से कहीं ज़्यादा यादगार अनुभव देगा।
यात्रियों के लिए ज़रूरी सलाह
- गर्मियों में भी ठंडी और तेज़ हवाएं चलती हैं – गर्म जैकेट या विंडचीटर साथ रखें
- 550+ सीढ़ियां चढ़नी हैं, इसलिए मजबूत ग्रिप वाले ट्रेकिंग शूज़ पहनें
- मंदिर के पास दुकानें सीमित हैं – पानी, ज़रूरी दवाइयां और स्नैक्स साथ रखें
- जंजैहली/करसोग आख़िरी जगह हैं जहां ATM और मैकेनिक मिलेंगे – कैश साथ रखें
- संरक्षित अभयारण्य होने के कारण प्लास्टिक कचरा बिल्कुल न फैलाएं और वन्यजीवों को परेशान न करें
- मानसून और बर्फबारी के मौसम में जाने से बचें – दोनों ही मौसम में गंभीर हादसे हो चुके हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. Shikari Devi Temple कहाँ स्थित है?
शिकारी देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में, जंजैहली और करसोग घाटियों के बीच, सेराज क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित है। यह पूरा क्षेत्र शिकारी देवी वन्यजीव अभयारण्य के अंदर आता है।
Q2. शिकारी देवी मंदिर की ऊंचाई (height) कितनी है?
मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,359 मीटर (करीब 11,013 फीट) की ऊंचाई पर है, जो इसे मंडी जिले का सबसे ऊंचा बिंदु बनाता है इसे ‘क्राउन ऑफ मंडी’ भी कहा जाता है।
Q3. मंदिर तक कैसे पहुंचा जा सकता है?
जंजैहली या करसोग तक सड़क मार्ग से पहुंचें, फिर वहां से 16-18 किमी के कच्चे वन मार्ग पर जीप लें। जीप का रास्ता खत्म होने के बाद मंदिर तक 550-700 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। कुल समय लगभग 2-2.5 घंटे।
Q4. शिकारी देवी मंदिर में छत क्यों नहीं है?
मान्यता है कि देवी ईंट-पत्थर या लकड़ी की छत स्वीकार नहीं करतीं। इतिहास में जब भी छत बनाने की कोशिश हुई, वह तूफान या मौसम की मार से गिर गई पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के दो प्रयास भी इसी तरह असफल रहे।
Q5. क्या सर्दियों में मंदिर पर बर्फ जमा होती है?
आस-पास के पूरे इलाके में 8-10 फीट तक बर्फ जमा हो जाती है, लेकिन खुले आसमान के नीचे रखी मुख्य मूर्तियों और मंदिर परिसर में बर्फ नहीं टिकती। हिमाचल सरकार की पर्यटन वेबसाइट पर भी यह तथ्य दर्ज है, हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक कारण अभी तक सामने नहीं आया है।
Q6. क्या सर्दियों में शिकारी देवी जाया जा सकता है?
नहीं। नवंबर से मार्च तक मंदिर बंद रहता है, भारी बर्फबारी के कारण रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है और यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। यात्रा का सबसे सही समय मई से अक्टूबर के बीच है।
Q7. जंजैहली से शिकारी देवी की दूरी कितनी है?
जंजैहली से मंदिर की तलहटी (जहां जीप रुकती है और सीढ़ियां शुरू होती हैं) तक की दूरी लगभग 16-18 किलोमीटर है।
Q8. शिकारी देवी मंदिर का इतिहास क्या है?
मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान एक रहस्यमयी मृग का पीछा करते हुए यहां देवी दुर्गा के दर्शन किए और उसी स्थान पर मूर्ति स्थापित की। एक अन्य मान्यता महर्षि मार्कंडेय की तपस्या से जुड़ी है। मंदिर में 64 योगिनियों की स्थापना भी मानी जाती है, जो इसे प्राचीन शाक्त तांत्रिक परंपरा से जोड़ती है।
Q9. यात्रा में कुल कितना खर्च आएगा?
जीप किराया ₹1,500-3,000, ठहरने का खर्च ₹300-3,000 प्रति रात (विकल्प के अनुसार), और खाना ₹100-300 प्रति व्यक्ति। बजट यात्रा ₹2,000-2,500 में भी पूरी हो सकती है।
Q10. क्या मंदिर के पास ठहरने की सुविधा है?
मंदिर के पास एक फॉरेस्ट रेस्ट हाउस और कुछ अस्थायी सराय हैं, लेकिन बुकिंग प्रक्रिया जटिल है। ज़्यादातर यात्रियों के लिए जंजैहली या करसोग में होटल/होमस्टे बुक करना बेहतर विकल्प है।




