शुक्र प्रदोष व्रत कथा
शुक्र प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा
प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को) आता है, लेकिन जब यह त्रयोदशी तिथि शुक्रवार के दिन पड़ती है, तो इसे विशेष रूप से ‘शुक्र प्रदोष व्रत’ कहा जाता है। शुक्रवार का दिन धन की देवी माता लक्ष्मी और शुक्र देव (शुक्राचार्य) को समर्पित है, इसलिए इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से शुक्र ग्रह के अत्यंत शुभ फल प्राप्त होते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन में सुख, समृद्धि, धन-ऐश्वर्य और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है, और कुण्डली में व्याप्त सभी प्रकार के कष्ट व ग्रह दोष शांत हो जाते हैं।
शुक्र प्रदोष व्रत में सुबह उठकर स्नानादि के बाद स्वच्छ श्वेत (सफेद) या गुलाबी वस्त्र धारण करने चाहिए। दिन भर सात्विक रहते हुए भगवान शिव का मन ही मन ध्यान करें। शुक्र प्रदोष की मुख्य पूजा शाम के समय (प्रदोष काल) में की जाती है। इस समय पुनः स्नान करके शिवलिंग का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें। शिवजी को बेलपत्र, सफेद चंदन, सफेद फूल और अक्षत अर्पित करना बहुत लाभकारी होता है। विशेष रूप से इस दिन भगवान शिव को साबुत चावल की खीर का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में शिव जी की स्तुति करें, ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें और नीचे दी गई कथा का पाठ कर आरती संपन्न करें।
शुक्र प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है, किसी नगर में तीन अभिन्न मित्र रहा करते थे। इनमें से एक राजकुमार था, दूसरा ब्राह्मण का पुत्र और तीसरा एक धनी सेठ का बेटा था। राजकुमार और ब्राह्मण कुमार का विवाह हो चुका था, जबकि सेठ के बेटे की शादी तो हो गई थी, लेकिन अभी उसकी पत्नी का गौना (विदाई) नहीं हुआ था।
एक दिन तीनों दोस्त आपस में स्त्रियों के महत्व पर चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण पुत्र ने कहा, “नारी के बिना घर सूना होता है, पत्नी ही मकान को असली घर बनाती है।” यह बात सुनकर सेठ के बेटे के मन में अपनी पत्नी को घर लाने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। उसने तुरंत घर जाकर अपने माता-पिता से पत्नी की विदाई करा लाने की जिद की।
माता-पिता ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, अभी शुक्र तारा अस्त चल रहा है। शास्त्रों के अनुसार इस समय (शुक्रास्त में) बहू-बेटियों की विदाई कराना अशुभ माना जाता है। तुम शुक्र के उदय होने तक प्रतीक्षा कर लो।” लेकिन वह नहीं माना और अपनी जिद पर अड़ा रहा। आखिरकार वह अपनी पत्नी को विदा कराने ससुराल जा पहुंचा।
ससुराल वालों ने भी उसे शुक्र अस्त होने की बात कहकर रोका, लेकिन वह किसी की सुनने को तैयार नहीं था। दामाद की हठ के आगे विवश होकर सास-ससुर ने अपनी बेटी को विदा कर दिया।
पति-पत्नी जब बैलगाड़ी से अपने नगर की ओर लौट रहे थे, तभी रास्ते में एक भयानक दुर्घटना हो गई। उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया और बैल के पैर में गंभीर चोट आ गई। दोनों गाड़ी से नीचे गिर पड़े और पत्नी को भी गहरी चोटें आईं। फिर भी सेठ का बेटा रुका नहीं और पत्नी को लेकर आगे बढ़ता रहा।
कुछ ही दूरी पर डाकुओं के एक गिरोह ने उन्हें घेर लिया और उनका सारा धन-धान्य लूट लिया। लुटने और घायल होने के बाद जब वे रोते-बिलखते अपने घर पहुंचे, तो एक और विपत्ति ने उन्हें घेर लिया—घर के दरवाजे पर ही सेठ के बेटे को एक जहरीले सांप ने डस लिया।
पिता ने तुरंत नगर के सबसे प्रसिद्ध वैद्यों को बुलाया। वैद्यों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कहा कि इस युवक के पास अब केवल तीन दिन का ही जीवन शेष है।
यह दुखद समाचार जब ब्राह्मण पुत्र को मिला, तो वह तुरंत अपने मित्र के घर पहुंचा। उसने सेठ से कहा, “यह सारी विपत्तियां इसलिए आई हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त के अशुभ समय में अपनी पत्नी की विदाई करा लाया है। आप तुरंत अपने पुत्र और पुत्रवधू को वापस बहू के मायके भेज दें और विधि-विधान से भगवान शिव के ‘शुक्र प्रदोष व्रत’ का संकल्प लें। यदि यह वापस वहां पहुंच गया, तो इसके प्राण बच जाएंगे।”
सेठ ने ब्राह्मण पुत्र की बात मानकर तुरंत अपने बेटे और बहू को वापस ससुराल भिजवा दिया। जैसे ही वे वहां पहुंचे, सेठ के बेटे की हालत में चमत्कारिक रूप से सुधार होने लगा। इस घटना के बाद से दोनों पति-पत्नी ने हर महीने पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव का ‘शुक्र प्रदोष व्रत’ रखना शुरू कर दिया। भगवान शिव की असीम कृपा से उनका बाकी का जीवन अत्यंत सुख और आनंद में बीता और अंत में उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई।
लेटेस्ट पोस्ट
लेटेस्ट न्यूज़
वेब स्टोरीज
वेब स्टोरीज
वेब स्टोरीज
देवी-देवताओं पर आधारित उपवास
देवी-देवताओं पर आधारित उपवास



