भौम प्रदोष व्रत कथा

भौम प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा

हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर महीने में दो बार (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में) त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे ‘भौम प्रदोष व्रत’ या ‘मंगल प्रदोष व्रत’ कहा जाता है। मंगलवार का दिन मंगल ग्रह (भौम) और रुद्रावतार भगवान हनुमान जी को समर्पित है। इसलिए इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी प्रकार के रोगों, ऋण (कर्ज) और जीवन की सभी व्याधियों से मुक्ति मिलती है तथा घर में मंगल ही मंगल होता है।

इस व्रत में प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शिव और हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इस दिन व्रती को एक समय केवल गेहूं और गुड़ से बना भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। पूजा में भगवान शिव और हनुमान जी को लाल रंग के पुष्प अर्पित करने चाहिए और व्रती को स्वयं भी लाल वस्त्र धारण करने चाहिए। प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा शाम के समय (प्रदोष काल) में की जाती है। प्रदोष काल में शिव जी का अभिषेक करें और हनुमान जी को भोग लगाकर नीचे दी गई व्रत कथा का पाठ करें।

भौम प्रदोष व्रत कथा

प्राचीन काल की बात है, एक नगर में एक वृद्धा रहती थी। उसका एक ही पुत्र था जिसका नाम मंगलिया था। वह वृद्धा रुद्रावतार भगवान हनुमान जी की बहुत बड़ी भक्त थी। वह हर मंगलवार को पूरे नियम और श्रद्धा के साथ हनुमान जी का व्रत रखती थी और उन्हें विधि-विधान से भोग लगाती थी। अपने व्रत के नियमों का पालन करते हुए वह वृद्धा मंगलवार के दिन न तो अपने घर को लीपती थी और न ही कोई मिट्टी खोदने का काम करती थी।

वृद्धा को इस प्रकार निष्ठापूर्वक व्रत करते हुए कई वर्ष बीत गए। एक दिन भगवान हनुमान जी ने अपनी इस परम भक्त की श्रद्धा की परीक्षा लेने का विचार किया। हनुमान जी ने एक साधु का वेश धारण किया और उस वृद्धा के दरवाजे पर पहुंचकर आवाज लगाई कि, ‘क्या यहाँ कोई हनुमान भक्त है जो मेरी इच्छा पूरी कर सके?’ साधु की पुकार सुनकर वृद्धा तुरंत बाहर आई, उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोली कि, ‘महाराज! आज्ञा दीजिए, मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ?’।

साधु वेशधारी हनुमान जी ने कहा कि, ‘मुझे बहुत तेज भूख लगी है और मैं भोजन करना चाहता हूँ, लेकिन तुम पहले थोड़ी सी जमीन लीप दो।’ यह सुनकर वृद्धा दुविधा में पड़ गई। उसने हाथ जोड़कर साधु से निवेदन किया कि, ‘हे महाराज! आज मंगलवार है, इसलिए मैं मिट्टी खोदने और घर लीपने का काम नहीं कर सकती। इसके अलावा आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसे पूरा करने के लिए तैयार हूँ’।

साधु ने उसकी परीक्षा को और कठिन बनाते हुए कहा कि, ‘ठीक है, तो तुम अपने पुत्र मंगलिया को बुला लाओ। मैं उसे पेट के बल औंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलाऊंगा और उसी आग पर अपना भोजन पकाऊंगा।’ यह भयंकर बात सुनकर वृद्धा के पैरों तले जमीन खिसक गई और वह अत्यंत दुखी हुई। परंतु वह साधु को उनकी हर आज्ञा पूरी करने का वचन दे चुकी थी। अपने वचन की रक्षा के लिए उस माता ने भारी मन से अपने पुत्र मंगलिया को बुलाया और उसे साधु महाराज को सौंप दिया।

साधु के वेश में आए हनुमान जी ने उस वृद्धा की और अधिक परीक्षा लेने के लिए उसी के हाथों से मंगलिया को जमीन पर उल्टा लिटवाया और उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलने के बाद अत्यंत दुखी और व्याकुल मन से वह वृद्धा अपने घर के अंदर चली गई और रोने लगी। कुछ समय बाद जब भोजन पक गया, तब साधु ने वृद्धा को आवाज लगाई और कहा कि, ‘भोजन तैयार है, अब तुम अपने पुत्र मंगलिया को भी पुकारो ताकि वह भी आकर मेरे साथ प्रसाद ग्रहण कर ले’।

यह सुनकर वृद्धा के आंसू छलक पड़े और उसने कहा कि, ‘महाराज! अब उसका नाम लेकर मेरे हृदय को और अधिक कष्ट न दें।’ लेकिन साधु महाराज नहीं माने और उसे बार-बार अपने पुत्र को आवाज लगाने की जिद करने लगे। जब साधु महाराज

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