रवि प्रदोष व्रत कथा
रवि प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा
हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर महीने के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (तेरस) तिथि को ‘प्रदोष व्रत’ किया जाता है। यह पावन व्रत भगवान शिव को समर्पित है। जब यह त्रयोदशी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तो इसे ‘रवि प्रदोष व्रत’ कहा जाता है।
रवि प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन काल में शौनक आदि 88,000 ऋषियों ने परमज्ञानी श्री सूतजी महाराज से पूछा, “हे मुनिवर! कलियुग में जब मनुष्य धर्म-कर्म से दूर होकर पाप कर्मों में लिप्त हो जाएंगे, तब उनके दुखों का निवारण और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल उपाय क्या होगा?” ऋषियों का यह लोककल्याणकारी प्रश्न सुनकर सूतजी ने कहा, “हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान शिव ने माता सती को ‘प्रदोष व्रत’ का उपदेश दिया था। यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला और सुख-समृद्धि देने वाला है। मैं आपको इस व्रत के प्रभाव की एक कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनें।”
सूतजी ने बताया एक गांव में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। ब्राह्मण की पत्नी बहुत ही धर्मपरायण थी और वह पूरी श्रद्धा से भगवान शिव का प्रदोष व्रत किया करती थी। उनका एक ही पुत्र था। एक दिन वह बालक गंगा स्नान के लिए घर से निकला। रास्ते में दुर्भाग्य से उसे कुछ डाकुओं ने घेर लिया। डाकुओं ने उसे धमकाते हुए कहा, “तुझे हम छोड़ देंगे, बस यह बता दे कि तेरे पिता ने अपना गुप्त धन कहां छुपा रखा है?”
यह सुनकर बालक डर गया और विनम्रता से बोला, “हे बंधुओं! हम अत्यंत दीन-हीन और गरीब हैं, हमारे पास कोई धन-संपत्ति नहीं है।” एक डाकू ने उसकी पोटली देखकर पूछा, “इसमें क्या है?” बालक ने मासूमियत से जवाब दिया कि मेरी मां ने रास्ते के लिए रोटियां बांध कर दी हैं। उसकी यह दयनीय स्थिति देखकर डाकुओं को दया आ गई और उन्होंने उसे छोड़ दिया।
डाकुओं से बचकर वह बालक एक नगर के पास पहुंचा। वहां एक विशाल बरगद का पेड़ था। थकावट के कारण बालक उसी पेड़ की छाया में सो गया। उसी समय उस नगर के सिपाही डाकुओं की खोज करते हुए वहां पहुंचे। सोते हुए अनजान बालक को देखकर सिपाहियों ने उसे ही चोर समझ लिया और बंदी बनाकर राजा के दरबार में पेश किया। राजा ने बिना जांच किए उस बालक को कारावास (जेल) में डाल दिया।
इधर, बालक की मां भगवान शिव का प्रदोष व्रत कर रही थी और अपने बेटे की सलामती की प्रार्थना कर रही थी। माता के सच्चे व्रत और भक्ति के प्रभाव से उसी रात राजा को सपने में भगवान शिव के दर्शन हुए। शिवजी ने राजा से कहा, “तुमने जिस बालक को बंदी बनाया है, वह निर्दोष है। यदि तुमने उसे सुबह होते ही नहीं छोड़ा, तो तुम्हारा सारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा”।
सुबह होते ही राजा घबराकर उठा। उसने तुरंत उस बालक को दरबार में बुलाया और पूरी घटना पूछी। बालक ने अपनी गरीबी और डाकुओं वाली सारी सच्चाई राजा को बता दी। राजा ने सत्य जानकर तुरंत अपने सिपाहियों को भेजकर बालक के माता-पिता को सम्मान सहित राजमहल बुलवाया। डरे हुए ब्राह्मण दंपत्ति को देखकर राजा ने कहा, “आप भयभीत न हों, आपका पुत्र निर्दोष है। आपकी गरीबी देखकर मैं आपको जीवन-यापन के लिए पांच गांव दान में देता हूँ”।
प्रदोष व्रत के अद्भुत प्रभाव से उस गरीब परिवार की सारी दरिद्रता दूर हो गई और वे भगवान शिव की कृपा से आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
मान्यता है कि रवि प्रदोष का व्रत करने से साधक को उत्तम स्वास्थ्य, मान-सम्मान, सुख-शांति और लंबी आयु की प्राप्ति होती है।
रवि प्रदोष व्रत की सरल पूजा विधि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए सही विधि से पूजा करना आवश्यक है:
- संकल्प और उपवास: प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान शिव के समक्ष व्रत का संकल्प लें। दिनभर निराहार (या फलाहार) रहें और मन में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते रहें।
- प्रदोष काल की पूजा: प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा हमेशा सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल) में की जाती है। शाम के समय पुनः स्नान करके शिव मंदिर जाएं या घर पर ही पूजा करें।
- अभिषेक और श्रृंगार: भगवान शिवलिंग का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें। शिवजी को चंदन का त्रिपुंड तिलक लगाएं और बेलपत्र, भांग, धतूरा, अक्षत तथा मौसमी फल अर्पित करें।
- आरती और दान: धूप-दीप जलाकर रवि प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में आरती करें। रविवार का दिन होने के कारण, पूजा के बाद किसी जरूरतमंद को तांबे का बर्तन, गुड़ या गेहूं का दान करना बहुत शुभ माना जाता है।
लेटेस्ट पोस्ट
लेटेस्ट न्यूज़
वेब स्टोरीज
वेब स्टोरीज
वेब स्टोरीज
देवी-देवताओं पर आधारित उपवास
देवी-देवताओं पर आधारित उपवास



