षष्ठी माता व्रत कथा
षष्ठी माता व्रत कथा
षष्ठी माता का परिचय षष्ठी माता हिन्दू धर्म की एक महान देवी हैं, जिन्हें मुख्य रूप से बच्चों की रक्षक और संतान देने वाली माता के रूप में पूजा जाता है। वह भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की पत्नी और शिव परिवार की ज्येष्ठ बहू हैं। माता षष्ठी को वनस्पतियों की देवी और प्रजनन में सहायक भी माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को इनका व्रत किया जाता है। वैसे तो इनकी पूजा हर शुक्रवार को भी होती है, लेकिन मुख्य रूप से यह पूजा ‘छठ पर्व’ के दौरान (विशेषकर बिहार में) बहुत ही धूमधाम और आस्था के साथ की जाती है। इनकी पूजा से परिवार में खुशहाली और वंश की वृद्धि होती है।
षष्ठी व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत थे। वे स्वभाव से योगी थे और तपस्या में ही लीन रहना चाहते थे, लेकिन ब्रह्मा जी की आज्ञा मानकर उन्होंने विवाह कर लिया। विवाह के कई वर्षों बाद भी जब राजा और रानी मालिनी को कोई संतान नहीं हुई, तब महर्षि कश्यप ने उनसे ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ करवाया। यज्ञ के प्रताप से रानी ने खीर ग्रहण की और वे गर्भवती हुईं। समय आने पर रानी ने एक अत्यंत सुंदर बालक को जन्म दिया, परंतु दुर्भाग्यवश वह बालक मृत पैदा हुआ। पुत्र शोक में रानी मूर्छित हो गईं।
अपने मृत पुत्र को लेकर दुखी राजा प्रियव्रत श्मशान गए और एकांत में उसे छाती से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगे। तभी वहां आसमान से मणियों और रत्नों से जड़ा एक दिव्य, चमकता हुआ विमान उतरा। उस विमान में सफेद चंपा के फूल जैसी उज्ज्वल और अत्यंत सुंदर एक देवी विराजमान थीं। राजा ने आदरपूर्वक बालक को जमीन पर रख दिया और हाथ जोड़कर देवी की स्तुति करते हुए पूछा “हे सुशोभने! आप कौन हैं और किसकी पुत्री हैं?”
देवी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “हे राजन! मैं ब्रह्मा जी की मानसी कन्या ‘देवसेना’ हूँ। देवता जब दैत्यों से हार गए थे, तब मैंने सेना बनकर देवताओं को विजय दिलाई थी। मैं भगवान कार्तिकेय की पत्नी हूँ। सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण मुझे ‘षष्ठी’ कहा जाता है। मैं ही लोगों को सुयोग्य संतान, धन और कर्मों का फल प्रदान करती हूँ।” इसके बाद देवी ने राजा को समझाया कि संसार में सुख-दुख, संतान का जीवित रहना या न रहना, रोग और स्वास्थ्य यह सब मनुष्य के अपने कर्मों का ही फल होता है।
यह कहकर देवी षष्ठी ने उस मृत बालक को उठाया और अपने दिव्य ज्ञान व प्रभाव से खेल-खेल में ही उसे तुरंत जीवित कर दिया। जब देवी उस जीवित बालक को अपने साथ आकाश में ले जाने लगीं, तो राजा ने घबराकर पुनः उनकी स्तुति की। तब देवी ने कहा, “हे राजन! तुम तीनों लोकों में मेरी पूजा का प्रचार करो और स्वयं भी मेरी पूजा करो। तब मैं तुम्हें यह गुणी और यशस्वी पुत्र सौंप दूंगी।”
राजा प्रियव्रत ने देवी की आज्ञा सहर्ष स्वीकार कर ली। देवी उन्हें पुत्र देकर स्वर्ग लौट गईं। राजा खुशी-खुशी महल लौटे और राज्य में मांगलिक कार्य करवाए। तभी से हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को, बच्चे के जन्म के छठे दिन (छठी), इक्कीसवें दिन और अन्नप्राशन के शुभ अवसर पर देवी षष्ठी की पूजा यत्नपूर्वक की जाने लगी।
षष्ठी माता की पूजा विधि और मंत्र:
- माता षष्ठी की पूजा शालिग्राम, कलश, बरगद के पेड़ की जड़ या दीवार पर चित्र (पुत्तलिका) बनाकर की जानी चाहिए।
- देवी को श्वेत चंपा के समान उज्ज्वल और कल्याणकारी जगत माता मानकर उनका ध्यान करें।
- देवी को जल, गंध, पुष्प, धूप, दीप और सुंदर फलों का नैवेद्य अर्पित करें।
- पूजा के दौरान इस महामंत्र का उच्चारण करें: “ऊँ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा”
- ब्रह्मा जी के अनुसार, जो व्यक्ति मन शांत करके श्रद्धापूर्वक इस अष्टाक्षर महामंत्र का जाप करता है, देवी की कृपा से उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसे अवश्य ही उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
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