रुद्राभिषेक व्रत कथा

रुद्राभिषेक व्रत कथा

सृष्टि के प्रारंभिक काल में क्षीर सागर में भगवान विष्णु शयन कर रहे थे। उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिससे चतुर्मुख ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई।

जब ब्रह्माजी ने चेतना पाई और अपने चारों ओर देखा, तो वे अपनी उत्पत्ति का कारण जानने के लिए उत्सुक हो गए। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और विनम्रतापूर्वक पूछा – “हे प्रभो! मैं कहाँ से आया हूँ? मेरी उत्पत्ति का क्या कारण है?”

भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए कहा – “हे ब्रह्मन्! तुम मेरी नाभि-कमल से उत्पन्न हुए हो। मैं ही तुम्हारा जनक हूँ और तुम्हें सृष्टि रचना का कार्य सौंपा गया है।”

परंतु ब्रह्माजी को यह बात स्वीकार नहीं हुई। उन्होंने कहा – “यह कैसे संभव है? मैं स्वयंभू हूँ। किसी के कारण मेरी उत्पत्ति नहीं हुई है।” इस विवाद के कारण ब्रह्मा और विष्णु के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। दोनों देवता अपनी-अपनी शक्तियों का प्रयोग करने लगे। इस युद्ध से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।

तभी अचानक दोनों के बीच एक अनंत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। इस दिव्य ज्योति का न कोई आदि था न अंत। इसके तेज से दोनों देवता चकाचौंध हो गए।

उसी क्षण उस ज्योतिर्लिंग से भगवान शिव का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ। उन्होंने गर्जना की – “हे ब्रह्मा! हे विष्णु! यह व्यर्थ का विवाद क्यों? मैं ही आदि कारण हूँ, तुम दोनों मेरी ही संकल्प शक्ति से उत्पन्न हुए हो।”

दोनों देवताओं को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने लज्जित होकर भगवान शिव से क्षमा मांगी और सर्वप्रथम उस ज्योतिर्लिंग का जल, दूध, शहद और विभिन्न पवित्र द्रव्यों से अभिषेक किया।

इस अभिषेक से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और यहीं से रुद्राभिषेक की परंपरा का आरंभ हुआ।

द्वितीय कथा - माता पार्वती की जिज्ञासा

एक समय भगवान शिव सपरिवार अपने वृषभ वाहन पर बैठकर त्रिलोकी का भ्रमण कर रहे थे। साथ में माता पार्वती और भगवान गणेश भी थे।

जब वे पृथ्वी लोक के ऊपर से गुजर रहे थे, तो माता पार्वती ने देखा कि मर्त्यलोक में अनेक भक्त शिवलिंग का अभिषेक कर रहे हैं। उन्होंने भगवान शिव से पूछा – “हे नाथ! ये मनुष्य आपकी इस प्रकार पूजा क्यों करते हैं? इसका क्या फल मिलता है?”

भगवान शिव ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया – “हे प्रिये! जो मनुष्य शीघ्र अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहता है, वह मेरे आशुतोष स्वरूप का विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक करता है।”

“जो भक्त शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी मंत्रों के साथ मेरा अभिषेक करता है, मैं उसे शीघ्र ही मनचाहा फल प्रदान करता हूँ। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: – अर्थात रुद्र रूप में मैं सभी दुखों को नष्ट कर देता हूँ।”

विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक के फल

रुद्राभिषेक के प्रमुख द्रव्य एवं उनके आध्यात्मिक फल

  • जल (विशुद्ध जल, तीर्थ जल): शिवलिंग पर जलाभिषेक से साधक को सुख और सौभाग्य की वृद्धि होती है। परंपरा के अनुसार तीर्थ (विशेषकर गंगाजल) से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि शिवजी को जल की धारा अति प्रिय है तथा ज्वर या रोग निवारण हेतु गंगा जल से शिवाभिषेक विशेष फलदायी है।
  • दूध: शिवलिंग पर दूध से अभिषेक करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार दूधाभिषेक से सुश्वा पुत्र की प्राप्ति होती है और वन्ध्य महिलाओं को शीघ्र संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  • दही: पवित्र दही से अभिषेक करने से पशुधन, भवन एवं वाहन आदि की कामनाएं पूरी होती हैं। परंपरागत कथाओं में वर्णित है कि दही से स्नान कराने पर सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है तथा परिवार की वृद्धि होती है।
  • घृत (घी): घृताभिषेक से धन-धान्य की वृद्धि और आयु की दीर्घता होती है। श्रावण माह के रूद्राभिषेक में घृत की धारा से शिवलिंग को स्नान कराने पर वंश का विस्तार बढ़ता है और प्रमेह रोग दूर होते हैं। पुराणोपदेश में घृत से अभिषेक को धार्मिक औषधि तथा रोगशान्ति का उपाय बताया गया है।
  • शहद (मधु): शहद से अभिषेक करने पर ऋण मुक्ति होती है और घर में धन-वैभव बढ़ता है। कई ग्रंथों में मधुभिषेक को संपत्ति वृद्धि का स्रोत माना गया है। इसके अतिरिक्त शहद से अभिषेक करने पर तपेदिक (यक्ष्मा रोग) जैसी बीमारियाँ भी दूर होती हैं।
  • गन्ने का रस (ईक्षु रस): गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी (धन-सम्पदा) की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि इक्षु रस से जलाभिषेक करने पर वैभव, कीर्ति और यश की वृद्धि होती है। अतः घर-परिवार में समृद्धि के लिए रुद्राभिषेक में गन्ने का रस चढ़ाना शुभ माना जाता है।
  • कुश (कुशा) जल: कुश जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है और रोग-व्याधियाँ शान्त होती हैं। परम्परा के अनुसार शिवजी कुशोदय जल चढ़ाने पर प्रसन्न होते हैं, जिससे शरीर और मन का स्वास्थ्य ठीक रहता है। कुश जल को वैदिक मान्यता प्राप्त पवित्र जल माना गया है, इसका अभिषेक रोगनिवारण और वर्षा के लिए किया जाता है।
  • पंचामृत: पंचामृत (दूध, दही, घृत, शहद और चीनी/शक्कर) से अभिषेक करने पर अष्टलक्ष्मी (संपूर्ण ऐश्वर्य) प्राप्त होती है। शिव पुराण में वर्णित है कि पंचामृत अभिषेक से घर में समृद्धि, सौभाग्य व आरोग्य की वृद्धि होती है। यह पांचों द्रव्य मिलकर शिव को अति प्रिय अमृत (अमृतरस) का रूप बना लेते हैं, जिससे भक्त को भी चैतन्य व प्रसन्नता मिलती है।
  • गंगा-तीर्थ जल: विशेषकर गंगा, यमुना इत्यादि तीर्थों का जल शिवलिंग पर चढ़ाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि गंगाजल से अभिषेक करने पर भोग और मोक्ष दोनों ही फल मिलते हैं। अतः श्रद्धालु सावन माह में विष्णुकी वैदिक कथनानुसार गंगाजल से रुद्राभिषेक करते हैं, जिससे जीवन-मरण के बंधन छूटते हैं।

ॐ नमः शिवाय!

इस लेख में
    Add a header to begin generating the table of contents
    इन दिस आर्ट
      Add a header to begin generating the table of contents

      लेटेस्ट पोस्ट

      लेटेस्ट न्यूज़

      वेब स्टोरीज

      himachal richest temple himachal pradesh
      हिमाचल के वो मंदिर जहाँ राक्षसों का हुआ था वध #AncientIndia

      वेब स्टोरीज

      himachal richest temple himachal pradesh
      हिमाचल के वो मंदिर जहाँ राक्षसों का हुआ था वध #AncientIndia

      वेब स्टोरीज