कालाष्टमी व्रत कथा
कालाष्टमी व्रत कथा
हर वर्ष मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भैरव अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। पुराणों में इस दिन व्रत रखने का विशेष महत्व बताया गया है।
कालाष्टमी व्रत कथा
युगों पहले की बात है, जब त्रिलोकी के सर्वोच्च शिखर सुमेरु पर्वत की स्वर्णिम चोटी पर ब्रह्माजी समाधि में लीन थे। उनके चारों मुख से निकलने वाले पवित्र मंत्रों की ध्वनि से सारा आकाश गूंज रहा था।
इसी समय स्वर्गलोक के देवतागण श्रद्धापूर्वक उनके समक्ष उपस्थित हुए। हाथ जोड़कर प्रणाम करने के पश्चात् उन्होंने विनम्रता से प्रश्न किया – “हे जगत्पिता! कृपया हमें बताइए कि इस संसार में वह कौन सा तत्व है जो कभी नष्ट नहीं होता?”
ब्रह्माजी के नेत्रों में अहंकार की चमक आई और वे गर्व से बोले – “हे देवगण! सुनो, इस समस्त सृष्टि में मुझसे महान कोई नहीं है। मैं ही इस जगत का निर्माता हूं, मैं ही इसका पालनकर्ता हूं और मैं ही इसका संहारकर्ता हूं।”
ब्रह्माजी के इन अहंकारपूर्ण वचनों को सुनकर वहीं विराजमान भगवान विष्णु का मन व्यथित हो उठा। उन्होंने शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा – “हे ब्रह्मन्! आप इस प्रकार अपनी स्तुति न करें। वास्तव में आप मेरी आज्ञा से ही सृष्टि की रचना करते हैं। सच्चा अधिपति तो मैं हूं।”
इस पर दोनों त्रिदेवों में तीव्र विवाद छिड़ गया। अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए उन्होंने चारों वेदों को साक्षी बनाया।
वेदों की साक्षी
ऋग्वेद ने दिव्य स्वर में कहा – “हे ब्रह्माजी! हे श्रीहरि! आप दोनों सुनिए। जिनके अंतर्गत यह संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है, वे केवल भगवान शिव हैं।”
यजुर्वेद ने आगे कहा – “उन परम कल्याणकारी भगवान शिव की अनुकंपा से ही हम वेदों को प्रामाणिकता प्राप्त होती है।”
सामवेद ने स्पष्ट किया – “जो इस संपूर्ण जगत को अपनी माया से मोहित रखते हैं और जिनके तेज से यह विश्व आलोकित होता है, वे त्र्यंबकेश्वर महादेव ही हैं।”
अथर्ववेद ने भी इसी सत्य की पुष्टि की।
वेदों के इन दिव्य वचनों को सुनकर ब्रह्माजी और भी क्रोधित हो गए। उन्होंने तिरस्कारपूर्वक कहा – “हे वेदों! तुम्हारे इन शब्दों से तुम्हारी मूर्खता ही प्रकट होती है। भला वह शिव कैसे परम तत्व हो सकता है जो सदैव चिता की भस्म अपने शरीर पर लगाता है, जिसके मस्तक पर उलझी जटाएं हैं, गले में रुद्राक्ष माला है और जो विषधर सर्पों को आभूषण बनाकर धारण करता है?”
इस अपमानजनक वचन को सुनकर सर्वत्र व्याप्त ओंकार की दिव्य ध्वनि गूंजी – “हे अज्ञानियों! भगवान शिव ही समस्त शक्तियों के स्वामी हैं। वे ही परब्रह्म हैं, वे ही सबके कल्याणकर्ता हैं। उनकी दिव्य लीलाओं का रहस्य तुम्हारी समझ से परे है। इस संसार में जो कुछ भी घटित होता है, वह उन्हीं की इच्छा से होता है।”
परंतु ब्रह्मा और विष्णु का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा था। तभी अचानक उन दोनों के मध्य से एक अपरंपार ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। यह दिव्य प्रकाश इतना तेजस्वी था कि उसका न कोई आदि दिखाई दे रहा था और न ही अंत। इस अग्निमय तेज से ब्रह्माजी का पांचवां मुख जलने लगा।
इसी क्षण भगवान शिव अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए। परंतु ब्रह्माजी का अहंकार अभी भी नष्ट नहीं हुआ था। उन्होंने धृष्टता से कहा – “हे शिव! तुम मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।
काल भैरव का प्राकट्य और ब्रह्महत्या
काल भैरव ने ब्रह्मा के पांचवें सिर को अपने छोटी उंगली के नाखून से काट दिया, क्योंकि वह सिर शिव की निंदा कर रहा था।
इस घटना के बाद, काल भैरव पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया और ब्रह्मा का सिर काल भैरव की छोटी उंगली से चिपका रह गया।
शिव ने काल भैरव को इस पाप से मुक्ति पाने के लिए काशी में भ्रमण करने को कहा।
काशी में मुक्ति और कोतवाली
काशी में, गंगा तट पर, काल भैरव के हाथ से ब्रह्मा का सिर छूट गया, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली।
इसके बाद, शिव ने काल भैरव को काशी का कोतवाल नियुक्त किया, और आज भी उन्हें काशी के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
हर हर महादेव!
निर्जला एकादशी व्रत कथा
वरदान मिलते ही महिषासुर का अहंकार बढ़ गया।
उसने पहले पाताल और धरती पर कब्जा कर लिया, फिर स्वर्ग पर हमला किया और देवताओं को भी हरा दिया।
अब समस्या यह थी कि कोई भी पुरुष महिषासुर को मार नहीं सकता था, और इसलिए त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी उसका कुछ नहीं कर पा रहे थे।
देवताओं की विनती और देवी का प्रकट होना
सभी देवता त्रिदेवों के पास गए और उनसे मदद की गुहार लगाई। सारी बात सुनकर तीनों देवता बहुत क्रोधित हुए।
उनके क्रोध से एक तेज ऊर्जा निकली और उसमें से एक शक्तिशाली देवी प्रकट हुईं।
उनकी दस भुजाएं थीं, माथे पर अर्धचंद्र की तरह घंटा सुशोभित था। देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र देवी को अर्पित किए:
- शिवजी ने त्रिशूल दिया
- विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र
- इंद्रदेव ने वज्र
मां चंद्रघंटा का विकराल रूप और युद्ध
इन सभी अस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी का रूप विकराल और तेजस्वी होता गया। माता अब बन चुकी थीं ‘मां चंद्रघंटा’, और वो चल पड़ीं महिषासुर का वध करने।
महिषासुर और माता के बीच भीषण युद्ध हुआ।
आकाश, पाताल और धरती – तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई। माता ने एक-एक कर सारे राक्षसों को मार गिराया, और अंत में महिषासुर का भी वध कर दिया।
इस तरह मां चंद्रघंटा ने देवताओं और मानव जाति की रक्षा की और एक बार फिर यह साबित किया कि जब अधर्म बढ़ता है, तो मां दुर्गा स्वयं प्रकट होकर न्याय करती हैं।
जय माता दी!
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