मां कालरात्रि

नवरात्रि का सातवां दिन देवी कालरात्रि को समर्पित होता है — वह देवी जिनका तेज़, भयानक लेकिन भक्तवत्सल स्वरूप हर संकट का अंत करता है। देवी कालरात्रि को भद्रकाली, महाकाली, मातृकाली और दक्षिण काली जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। उनके स्वरूप का वर्णन स्वयं उनके नाम में छिपा है — वह रात की कालिमा की तरह गहन, लेकिन भीतर से प्रेममयी हैं।

मां कालरात्रि का शरीर काला है, बाल बिखरे हुए हैं, और गले में चमकदार बिजली जैसी माला विराजमान है। उनके रूप से दुष्टों में भय व्याप्त हो जाता है, लेकिन सच्चे भक्तों को वे स्नेह और सुरक्षा का आशीर्वाद देती हैं। ऐसा माना जाता है कि कलियुग में मां कालरात्रि ही एकमात्र ऐसी देवी हैं जो मनुष्य के कर्मों का फल तुरंत देने वाली हैं। नवरात्रि के इस पावन दिन मां का पूजन करने से बुरे समय का अंत होता है, और जीवन में वीरता, निर्भयता और आत्मबल की स्थापना होती है।

चार भुजाओं वाली कालरात्रि देवी गधे पर विराजमान रहती हैं — यह गधा उनके भक्त के अज्ञान का प्रतीक है, जिसे मां दूर करती हैं और अपने अनुयायियों को ज्ञान और प्रकाश का मार्ग दिखाती हैं।

मां कालरात्रि व्रत कथा

पौराणिक कथा अनुसार, रक्तबीज नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसे वरदान प्राप्त था कि जब भी उसके शरीर से रक्त की एक बूंद धरती पर गिरेगी, उस बूंद से एक और रक्तबीज उत्पन्न हो जाएगा। इस अद्भुत वरदान के कारण वह असुर देवताओं और मनुष्यों के लिए भारी संकट बन गया था। तीनों लोकों में उसका आतंक फैल गया।

देवताओं ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव से सहायता मांगी। भगवान शिव ने उन्हें बताया कि केवल मां पार्वती ही इस संकट का अंत कर सकती हैं। देवताओं की प्रार्थना पर माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया और दैत्य शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। लेकिन जब रक्तबीज से युद्ध हुआ, तो जैसे ही उसका रक्त धरती पर गिरा, वहां अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो गए। यह देखकर देवी ने अपने तेज से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया।

मां कालरात्रि ने युद्ध के दौरान जैसे ही रक्तबीज का वध किया, वैसे ही उसके रक्त को अपने मुख में भर लिया ताकि उसका एक भी कतरा धरती पर न गिरे और कोई नया दैत्य उत्पन्न न हो सके। इस प्रकार मां कालरात्रि ने रक्तबीज की सारी प्रतिछायाओं को समाप्त कर दिया और देवताओं व मनुष्यों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।

जय माता दी!

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