महालक्ष्मी व्रत कथा
एक समय की बात है, एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था जो हर रोज़ श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा करता था।
एक दिन उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और बोले, “वत्स! मैं तुम्हारी पूजा से अत्यंत प्रसन्न हूं, कोई वर मांगो।”
ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर निवेदन किया,
“प्रभु, बस इतना वर दीजिए कि देवी लक्ष्मी सदा मेरे घर में वास करें।”
विष्णुजी मुस्कुराए और बोले,
” मंदिर के सामने एक स्त्री प्रतिदिन उपले थापने आती है। वही महालक्ष्मी हैं। तुम उन्हें सादर अपने घर आने का आमंत्रण देना।”
यह कहकर भगवान विष्णु अंतर्धान हो गए।
अगली भोर होते ही ब्राह्मण मंदिर के पास जाकर बैठ गया। कुछ समय बाद एक साधारण वेशभूषा में स्त्री वहां आई और उपले थापने लगी। ब्राह्मण ने विनम्रता से उन्हें प्रणाम किया और निवेदन किया, “माता, कृपया मेरे घर पधारिए।”
वह स्त्री वास्तव में स्वयं महालक्ष्मी थीं। वे समझ गईं कि विष्णु जी ने ही यह लीला रची है। उन्होंने ब्राह्मण से कहा,
“यदि तुम मुझे अपने घर लाना चाहते हो, तो 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत करो। अंतिम दिन चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करने के बाद तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”
ब्राह्मण ने पूरे नियम से 16 दिनों तक व्रत किया। अंतिम दिन चंद्रमा को अर्घ्य देकर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके देवी लक्ष्मी का आह्वान किया। उसकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी प्रकट हुईं और अपने वचन के अनुसार उसके घर में निवास करने लगीं।
उस दिन से यह महालक्ष्मी व्रत एक पवित्र परंपरा के रूप में मनाया जाने लगा। जो भी भक्त इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करता है, मां लक्ष्मी उस पर कृपा बरसाती हैं और उसके जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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