मां शैलपुत्री

नवरात्रि के पहले दिन देवी दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा होती है। मां का स्वरूप अत्यंत सौम्य है। वे एक बैल नंदी पर सवार रहती हैं, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में एक कमल का पुष्प सुशोभित होता है।

मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना गया है, इसलिए उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। उनका पूजन साधकों के मूलाधार चक्र को सक्रिय करने में सहायक होता है। यह चक्र हमारे शरीर की नींव है, जो आत्मिक स्थिरता, सुरक्षा और शक्ति का आधार माना जाता है।

मां शैलपुत्री की उपासना से साधक को आत्मबल, संयम और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है, जिससे आध्यात्मिक यात्रा का प्रथम चरण दृढ़ता से प्रारंभ होता है।

मां शैलपुत्री की व्रत कथा

एक बार दक्ष प्रजापति ने एक बहुत बड़ा यज्ञ आयोजित किया। उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों और ब्राह्मणों को निमंत्रण भेजा, लेकिन जानबूझकर भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया।

जब माता सती को यह पता चला, तो वे बहुत आहत हुईं। उन्होंने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की इच्छा व्यक्त की। शिवजी ने उन्हें समझाया कि जहाँ अपमान हो, वहाँ जाना उचित नहीं। लेकिन माता सती यज्ञ में जाने की जिद पर अड़ी रहीं और अंत में चली गईं।

यज्ञ स्थल पर पहुँचने पर सती ने देखा कि न तो भगवान शिव के लिए यज्ञ में कोई भाग रखा गया है, और न ही किसी ने उनका आदर-सत्कार किया। यह देखकर वे अत्यंत दुखी और अपमानित हुईं।

अपमान की पीड़ा में माता सती ने वहीं यज्ञकुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया।

जब भगवान शिव को इस दुखद घटना का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपनी जटाओं से वीरभद्र और महाकाली को उत्पन्न किया और उन्हें यज्ञ स्थल पर भेजा। वीरभद्र ने वहाँ पहुँचकर यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का संहार कर दिया।

इसके बाद माता सती ने अगले जन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और पार्वती कहलाईं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वे शैलपुत्री नाम से प्रसिद्ध हुईं।

जय माता दी!

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