करवा चौथ व्रत कथा
करवा चौथ व्रत कथा
बहुत समय पहले इन्द्रप्रस्थपुर नामक नगर में वेदशर्मा नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी लीलावती थी, और उनके सात बेटे व एक प्यारी बेटी थी, जिसका नाम था वीरावती। वीरावती अपने भाइयों की इकलौती बहन थी, इसलिए सभी की लाड़ली थी।
जब वीरावती विवाह योग्य हुई, तो उसका विवाह एक सुयोग्य ब्राह्मण युवक से कर दिया गया। एक बार विवाह के बाद वह अपने मायके आई हुई थी। उसी समय करवा चौथ का पर्व आया और उसने भी अपनी भाभियों के साथ व्रत रखा, अपने पति की दीर्घायु की कामना के लिए।
दिनभर उपवास के बाद शाम को वीरावती अत्यंत कमजोर हो गई और भूख-प्यास के कारण बेहोश हो गई। भाई अपनी बहन की हालत देखकर बेहद दुखी हो गए। वे जानते थे कि वह चाँद देखे बिना व्रत नहीं तोड़ेगी।
तब भाइयों ने एक उपाय निकाला। उन्होंने पीपल के पेड़ पर छलनी और दीपक रखकर ऐसा दृश्य बनाया जिससे चंद्रमा का भ्रम हो। वीरावती को होश आया तो भाइयों ने कहा, “चाँद निकल आया है, चलो दर्शन कर लो।”
छत पर जाकर जब वीरावती ने पेड़ के पीछे दीपक को छलनी में देखा, तो उसे वास्तव में चाँद का उदय लगा। भूख से बेहाल वीरावती ने तुरंत अर्घ्य दिया और व्रत तोड़कर भोजन करने बैठ गई।
जैसे ही उसने पहला कौर लिया, उसमें बाल मिला। दूसरे कौर पर उसे छींक आ गई। तीसरे कौर में ससुराल से बुलावा आ गया। जब वह ससुराल पहुंची, तो सामने पति का मृत शरीर पड़ा था। यह देखकर वह स्तब्ध रह गई और विलाप करने लगी। उसे लगा कि यह सब उसकी गलती से हुआ।
उसका विलाप सुनकर देवी इन्द्राणी, जो इन्द्रदेव की पत्नी थीं, वहां प्रकट हुईं और वीरावती को सांत्वना दी।
वीरावती ने उनसे पूछा, “मेरे व्रत के दिन ही मेरे पति की मृत्यु क्यों हुई?” तब देवी इन्द्राणी ने बताया कि उसने बिना चंद्र दर्शन किए व्रत तोड़ा था, जिससे उसका व्रत अधूरा रह गया और उसका फल नकारात्मक रूप में सामने आया।
देवी ने उसे सलाह दी कि अब वह पूरे वर्ष प्रत्येक चतुर्थी का व्रत नियमपूर्वक करे, और अगली करवा चौथ पर पुनः विधिपूर्वक उपवास रखे। वीरावती ने वैसा ही किया — श्रद्धा और नियम से हर चौथ का व्रत किया।
अंततः, उसकी भक्ति, तपस्या और व्रत के पुण्य से उसका पति पुनः जीवित हो गया।
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