वैशाख अमावस्या व्रत कथा

वैशाख अमावस्या व्रत कथा

बहुत पुराने समय की बात है। धर्मवर्ण नाम का एक विद्वान ब्राह्मण था। वह अपने नाम के समान ही धर्म के मार्ग पर चलने वाला था। उसका सारा जीवन भगवद्भक्ति में व्यतीत होता था – प्रभु नाम का जप, व्रत-उपवास, ऋषि-मुनियों की सेवा और उनसे ज्ञान प्राप्ति उसके प्रिय कार्य थे।

एक दिन एक महान पुण्यात्मा ने धर्मवर्ण को अमूल्य ज्ञान दिया। उन्होंने कहा, “हे ब्राह्मण! कलियुग में भगवान विष्णु के नाम स्मरण के समान कोई पुण्य कार्य नहीं है। जो फल अन्य युगों में यज्ञ-हवन से प्राप्त होता था, वह कलियुग में केवल हरि नाम के स्मरण से ही मिल जाता है।”

यह गहन ज्ञान पाकर धर्मवर्ण का हृदय आनंद से भर गया। उसने इस सत्य को अपने हृदय में गांठ बांधकर रख लिया।

इस ज्ञान के पश्चात धर्मवर्ण दिन-रात भगवान हरि का नाम जपने लगा। सांसारिक मोह-माया त्यागकर उसने संन्यास स्वीकार कर लिया और तीर्थाटन करने निकल पड़ा।

निरंतर भगवान के नाम स्मरण करते-करते धर्मवर्ण की आत्मा पितृलोक तक पहुंच गई। वहां पहुंचकर उसने एक हृदयविदारक दृश्य देखा – उसके पूर्वज अत्यधिक कष्ट में थे।

पितरों की दुर्दशा का कारण

चिंतित होकर धर्मवर्ण ने अपने पितरों से पूछा, “हे पूर्वजो! आप इतने कष्ट में क्यों हैं?”

पितरों ने दुखी मन से उत्तर दिया, “हे पुत्र! तुम्हारे संन्यास ग्रहण करने के कारण हमारा पिंडदान करने वाला कोई नहीं रहा। इसी कारण हमें इन कष्टों का सामना करना पड़ रहा है।”

यह सुनकर धर्मवर्ण के हृदय में गहरी ग्लानि हुई।

पितरों ने आगे कहा, “हे वत्स! हमारी मुक्ति का केवल एक ही उपाय है। तुम्हें पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना होगा, संतान उत्पन्न करनी होगी और वैशाख अमावस्या के दिन पूर्ण विधि-विधान से हमारा पिंडदान करना होगा। तभी हमें इन कष्टों से मुक्ति मिल सकेगी।

पितरों की व्यथा सुनकर धर्मवर्ण का हृदय पिघल गया। उसने तुरंत प्रतिज्ञा की, “हे पितरगण! मैं आपको इन कष्टों से अवश्य मुक्त कराऊंगा। इसके लिए मैं संन्यास त्यागकर पुनः गृहस्थ धर्म अपनाऊंगा।”

अपने वचन के अनुसार धर्मवर्ण ने संन्यास जीवन का त्याग किया और पुनः गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। उसने सभी सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन किया और संतान प्राप्ति की।

पिंडदान संस्कार

उचित समय आने पर धर्मवर्ण ने वैशाख अमावस्या के पावन दिन अपने पूर्वजों के लिए पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से पिंडदान किया। इस पुण्य कर्म से उसके पितरों को कष्टों से मुक्ति मिली और वे परमधाम को प्राप्त हुए।

इसीलिए वैशाख मास की अमावस्या तिथि पर पितृ पूजन और पिंडदान का विशेष महत्व है। यह व्रत हमारे पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

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