मौनी अमावस्या व्रत कथा
मौनी अमावस्या व्रत कथा
पवित्र कांचीपुरी धाम में देवस्वामी नाम का एक विद्वान ब्राह्मण निवास करता था। प्रभु की कृपा से उसे आठ संतानों का सुख प्राप्त था – सात पुत्र और एक पुत्री। सभी पुत्रों के मंगल विवाह संपन्न हो चुके थे, किंतु पुत्री गुणवती के भाग्य में वैधव्य योग होने के कारण उसका पाणिग्रहण संस्कार नहीं हो पा रहा था। इस चिंता से व्याकुल होकर देवस्वामी ने विद्वान पंडितों से परामर्श लिया। उन्होंने गहन विचार-विमर्श के पश्चात बताया कि यदि सोमा धोबिन विवाह समारोह में सम्मिलित हो, तो इस अशुभ योग का नाश हो सकता है।
देवस्वामी ने अपने एक पुत्र और पुत्री गुणवती को सोमा धोबिन के दर्शन के लिए भेजा। दैवीय कृपा से गिद्ध माता ने भाई-बहन का मार्गदर्शन किया और वे सकुशल सोमा धोबिन के निवास स्थान पहुंच गए।
दोनों भाई-बहन ने धोबिन परिवार की नि:स्वार्थ सेवा आरंभ की। प्रतिदिन गुप्त रूप से घर की साफ-सफाई, जल भरना और अन्य गृहकार्य संपन्न करते रहे।
रहस्य का भेद खुलना
एक रात्रि में सोमा धोबिन की दृष्टि गुणवती पर पड़ गई जो मौनभाव से सेवाकार्य में लीन थी। जिज्ञासा के वशीभूत होकर धोबिन ने इस गुप्त सेवा का कारण जानना चाहा।
भाई-बहन ने विनम्रतापूर्वक अपनी व्यथा और वैधव्य दोष की संपूर्ण कथा धोबिन को सुनाई।
सोमा धोबिन का हृदय करुणा से भर उठा। वह तुरंत उनके साथ देवस्वामी के निवास चलने को तैयार हो गई।
धोबिन की उपस्थिति में गुणवती का विवाह विधिवत संपन्न हुआ। किंतु हाय! पंडितों की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। विवाह संस्कार पूर्ण होते ही गुणवती के नवविवाहित पति का प्राणांत हो गया।
सोमा धोबिन के संचित पुण्य प्रताप से एक चमत्कार घटित हुआ। गुणवती का पति पुनः जीवित हो उठा। परंतु इसके प्रतिफल में धोबिन के पति, पुत्र और जामाता का देहावसान हो गया।
शोकाकुल सोमा जब अपने घर की ओर प्रस्थान कर रही थी, तो मार्ग में एक पवित्र पीपल वृक्ष के दर्शन हुए। उसने वहीं रुककर जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु की विधिसम्मत आराधना की।
दिव्य फल की प्राप्ति
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