एकादशी व्रत कथा – चातुर्मास्य से पूर्व

एकादशी व्रत कथा – चातुर्मास्य से पूर्व

उत्पन्ना एकादशी कथा

हिन्दू धर्म में व्रत कथा का अर्थ है – ऐसी धार्मिक कहानियाँ जो किसी देवी-देवता से जुड़ी होती हैं। इन कथाओं को भक्त उपवास या व्रत के दौरान सुनते हैं ताकि उनके व्रत का फल पूर्ण हो सके।

हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की व्रत कथाएँ प्रचलित हैं, जैसे सावन सोमवार व्रत कथा, करवा चौथ व्रत कथा, एकादशी व्रत कथा, प्रदोष व्रत कथा, और गणेश चतुर्थी (संकष्टी) व्रत कथा। इनमें से प्रत्येक कथा किसी न किसी विशिष्ट देवता और व्रत को समर्पित होती है। इन कथाओं का उद्देश्य भक्तों की धार्मिक और व्यक्तिगत मनोकामनाओं की पूर्ति करना है, जैसे – लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, संतान प्राप्ति, धन-समृद्धि, परिवार में शांति, या जीवन की बाधाओं से मुक्ति।

व्रत कथाओं की परंपरा केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि ये कथाएँ पौराणिक प्रसंगों, धार्मिक शिक्षाओं और नैतिक मूल्यों से जुड़ी होती हैं। कथा सुनने या सुनाने से भक्त न केवल देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, बल्कि जीवन में धैर्य, संयम और भक्ति का महत्व भी सीखते हैं।

हिन्दू मान्यता है कि बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है। इसलिए व्रत के दिन पूजा के साथ-साथ कथा का श्रवण करना आवश्यक है। कथा के अंत में आरती और प्रसाद वितरण की परंपरा होती है, जिससे व्रत पूर्ण और फलदायी माना जाता है।

इन व्रत कथाओं में देवी-देवताओं के चमत्कारिक लीलाओं और भक्ति की शक्ति का वर्णन होता है। यही कारण है कि आज भी करोड़ों भक्त श्रद्धा से इन व्रतों का पालन करते हैं और कथाओं को सुनकर अपनी आस्था और विश्वास को और अधिक दृढ़ बनाते हैं।

व्रत कथा सुनने के लाभ

  • व्रत की पूर्णता

    शास्त्रों में कहा गया है कि यदि व्रत के साथ कथा का श्रवण न किया जाए तो व्रत अधूरा माना जाता है। कथा सुनने से व्रत पूर्ण होता है और उसका पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

  • देवी-देवताओं का आशीर्वाद

    कथा के माध्यम से भक्त उस देवता की महिमा और लीलाओं को जान पाते हैं, जिससे उनकी भक्ति गहरी होती है और उन्हें दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • मनोकामनाओं की पूर्ति

    माना जाता है कि व्रत कथा सुनने से भक्त की विशेष इच्छाएँ पूरी होती हैं, जैसे – संतान प्राप्ति, लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, धन-संपत्ति या विवाह में सफलता।

  • मानसिक शांति और एकाग्रता

    कथा सुनने से मन को शांति मिलती है और भक्त का ध्यान अध्यात्म और भक्ति की ओर केंद्रित होता है।

  • धार्मिक ज्ञान और प्रेरणा

    व्रत कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसमें जीवन मूल्यों और नैतिक शिक्षाओं का संदेश भी होता है, जो इंसान को सही राह दिखाता है।

  • कष्ट निवारण

    कई व्रत कथाएँ विशेष रूप से जीवन की कठिनाइयों और ग्रह-दोषों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती हैं, जैसे शनि व्रत कथा या संकष्टी गणेश व्रत कथा।

  • पारिवारिक सुख-शांति

    जब पूरा परिवार मिलकर कथा का श्रवण करता है तो घर में प्रेम, सामंजस्य और आध्यात्मिक वातावरण का विकास होता है।

व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

  1. व्रत केवल शारीरिक उपवास नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि है। इसे सच्चे मन और श्रद्धा से करना चाहिए।
  2. व्रत के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल को शुद्ध करें।
  3. दिन में सोना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे व्रत खंडित हो सकता है।
  4. व्रत के दौरान केवल सात्त्विक भोजन या फलाहार (जैसे सेब, केला, तरबूज, आम आदि) लिया जा सकता है।
  5. व्रत की कथा सुनना या पढ़ना आवश्यक है, अन्यथा व्रत अधूरा माना जाता है।
  6. व्रत के समय निंदा, चुगली, झूठ बोलना, क्रोध करना और किसी का अपमान करना वर्जित है।
  7. शारीरिक और मानसिक शुद्धता बनाए रखने का प्रयास करें।
  8. व्रत के दिन दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत फलदायी होता है।
  9. पूजा और कथा के अंत में आरती करें और प्रसाद बाँटें। इसे पूरे परिवार के साथ ग्रहण करना शुभ माना जाता है।

हिन्दू धर्म में माना जाता है कि जो भी भक्त मोक्षदा एकादशी का व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ करता है, उसे मृत्यु के बाद यमलोक की पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही दिन गीता जयंती का भी प्रतीक है, क्योंकि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को भगवद गीता का उपदेश दिया था।

मोक्षदा एकादशी की पावन तिथि पर भक्तों को श्रीहरि के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए और उन्हें खीर व कमल के फूल अर्पित करने चाहिए। साथ ही, माता लक्ष्मी के 108 नामों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इससे धन से जुड़ी सभी परेशानियाँ दूर होती हैं और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

बहुत समय पहले वैखानस नामक एक राजा गोकुल पर शासन करते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न में देखा कि उनके पिता मृत्यु के बाद नर्क में भयंकर कष्ट झेल रहे हैं। यह दृश्य देखकर राजा का मन व्याकुल हो गया।

सुबह होते ही राजा ने अपने राजपुरोहित को बुलाकर कहा –

“मेरे पिता कष्ट झेल रहे हैं, कृपया मुझे उनकी मुक्ति का कोई उपाय बताइए।”

राजपुरोहित ने उत्तर दिया –

“राजन, इसका समाधान केवल पर्वत नामक महात्मा ही बता सकते हैं, जो त्रिकालदर्शी हैं।”

राजा तुरंत पर्वत महात्मा के आश्रम पहुँचे और उनसे अपने पिता की मुक्ति का मार्ग पूछा।

महात्मा ने ध्यान करके बताया –
“आपके पिता ने अपने पिछले जन्म में एक पाप किया था, उसी कारण उन्हें नर्क की यातना सहनी पड़ रही है।”

राजा ने निवेदन किया –
“गुरुदेव, कृपया कोई उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल सके।”
तब पर्वत महात्मा बोले –

“राजन, मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली मोक्षदा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करो। इस व्रत की शक्ति से आपके पिता नर्क से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे।”

राजा ने गुरु के आदेश का पालन किया और पूरे श्रद्धा-भाव से मोक्षदा एकादशी का व्रत रखा। इसके प्रभाव से उनके पिता को नर्क से छुटकारा मिल गया और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।

इस प्रकार, राजा को न केवल अपने पिता का आशीर्वाद मिला, बल्कि भगवान श्रीहरि का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ।

माता लक्ष्मी के 108 नाम

  1. ऊँ प्रकत्यै नमः
  2. ऊँ विकृत्यै नमः
  3. ऊँ विद्यायै नमः
  4. ऊँ सर्वभूत-हितप्रदायै नमः
  5. ऊँ श्रद्धायै नमः
  6. ऊँ विभूत्यै नमः
  7. ऊँ वसुन्धरायै नमः
  8. ऊँ उदारांगायै नमः
  9. ऊँ हरिण्यै नमः
  10. ऊँ हेममालिन्यै नमः
  11. ऊँ धनधान्य-कर्ये नमः
  12. ऊँ सिद्धायै नमः
  13. ऊँ स्त्रैणसौम्यायै नमः
  14. ऊँ शुभप्रदायै नमः
  15. ऊँ नृपवेश्मगतानन्दायै नमः
  16. ऊँ सुरभ्यै नमः
  17. ऊँ परमात्मिकायै नमः
  18. ऊँ वाचे नमः
  19. ऊँ पद्मालयायै नमः
  20. ऊँ पद्मायै नमः
  21. ऊँ शुच्यै नमः
  22. ऊँ स्वाहायै नमः
  23. ऊँ स्वधायै नमः
  24. ऊँ सुधायै नमः
  25. ऊँ धन्यायै नमः
  26. ऊँ हिरण्मयै नमः
  27. ऊँ लक्ष्म्यै नमः
  28. ऊँ नित्यपुष्टायै नमः
  29. ऊँ विभावर्यै नमः
  30. ऊँ अदित्यै नमः
  31. ऊँ दित्यै नमः
  32. ऊँ दीप्तायै नमः
  33. ऊँ वसुधायै नमः
  34. ऊँ वसुधारिण्यै नमः
  35. ऊँ कमलायै नमः
  36. ऊँ कान्तायै नमः
  37. ऊँ कामाक्ष्यै नमः
  38. ऊँ क्रोधसंभवायै नमः
  39. ऊँ अनुग्रहप्रदायै नमः
  40. ऊँ बुद्धायै नमः
  41. ऊँ अनघायै नमः
  42. ऊँ हरिवल्लभायै नमः
  43. ऊँ अशोकायै नमः
  44. ऊँ अमृतायै नमः
  45. ऊँ दीप्तायै नमः
  46. ऊँ लोकशोकविनाशिन्यै नमः
  47. ऊँ धर्म-निलयायै नमः
  48. ऊँ करुणायै नमः
  49. ऊँ लोकमात्रे नमः
  50. ऊँ पद्मप्रियायै नमः
  51. ऊँ पद्महस्तायै नमः
  52. ऊँ पद्माक्ष्यै नमः
  53. ऊँ पद्मसुन्दर्यै नमः
  54. ऊँ पद्मोद्भवायै नमः
  55. ऊँ भास्कर्यै नमः
  56. ऊँ बिल्वनिलयायै नमः
  57. ऊँ वरारोहायै नमः
  58. ऊँ यशस्विन्यै नमः
  59. ऊँ वरलक्ष्म्यै नमः
  60. ऊँ वसुप्रदायै नमः
  61. ऊँ शुभायै नमः
  62. ऊँ हिरण्यप्राकारायै नमः
  63. ऊँ समुद्रतनयायै नमः
  64. ऊँ पद्ममुख्यै नमः
  65. ऊँ पद्मनाभप्रियायै नमः
  66. ऊँ रमायै नमः
  67. ऊँ पद्ममालाधरायै नमः
  68. ऊँ देव्यै नमः
  69. ऊँ पद्मिन्यै नमः
  70. ऊँ पद्मगन्धिन्यै नमः
  71. ऊँ पुण्यगन्धायै नमः
  72. ऊँ सुप्रसन्नायै नमः
  73. ऊँ प्रसादाभिमुख्यै नमः
  74. ऊँ प्रभायै नमः
  75. ऊँ चन्द्रवदनायै नमः
  76. ऊँ चन्द्रायै नमः
  77. ऊँ चन्द्रसहोदर्यै नमः
  78. ऊँ चतुर्भुजायै नमः
  79. ऊँ विष्णुपत्न्यै नमः
  80. ऊँ प्रसन्नाक्ष्यै नमः
  81. ऊँ नारायणसमाश्रितायै नमः
  82. ऊँ दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः
  83. ऊँ देव्यै नमः
  84. ऊँ सर्वोपद्रव-वारिण्यै नमः
  85. ऊँ नवदुर्गायै नमः
  86. ऊँ महाकाल्यै नमः
  87. ऊँ ब्रह्माविष्णु-शिवात्मिकायै नमः
  88. ऊँ त्रिकालज्ञान-संपन्नायै नमः
  89. ऊँ भुवनेश्वर्यै नमः
  90. ऊँ चन्द्ररूपायै नमः
  91. ऊँ इन्दिरायै नमः
  92. ऊँ इन्दुशीतलायै नमः
  93. ऊँ अह्लादजनन्यै नमः
  94. ऊँ पुष्टायै नमः
  95. ऊँ शिवायै नमः
  96. ऊँ शिवकर्यै नमः
  97. ऊँ सत्यै नमः
  98. ऊँ विमलायै नमः
  99. ऊँ विश्वजनन्यै नमः
  100. ऊँ तुष्टयै नमः
  101. ऊँ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः
  102. ऊँ प्रीतिपुष्करिण्यै नमः
  103. ऊँ शान्तायै नमः
  104. ऊँ शुक्लमाल्यांबरायै नमः
  105. ऊँ श्रियै नमः
  106. ऊँ जयायै नमः
  107. ऊँ मंगलादेव्यै नमः
  108. ऊँ विष्णुवक्षस्थलस्थितायै नमः

ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, जो भक्त सफला एकादशी पर कठोर और पवित्र व्रत करता है, उसे 100 राजसूय यज्ञों और 1000 अश्वमेध यज्ञों के समान या उससे भी अधिक फल प्राप्त होता है। यह व्रत अत्यंत पुण्यकारी माना गया है और जीवन में सौभाग्य, सफलता और आशीर्वाद लाने वाला है।

सफला एकादशी का व्रत करने वाला व्यक्ति अपने दुर्भाग्य और जीवन की कठिनाइयों को बदल सकता है। यह व्रत दुख, विपत्तियों और प्रतिकूल परिस्थितियों को दूर करता है। साथ ही, यह व्रत भक्त को सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष प्रदान करता है।

सफला एकादशी व्रत करने से भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है। यह व्रत न केवल मनोकामनाओं की पूर्ति करता है, बल्कि जीवन में सौभाग्य, संपत्ति और स्वास्थ्य को भी बढ़ाता है। माना जाता है कि व्रत करने वाले भक्त को उनके सभी उद्देश्यों और इच्छाओं की प्राप्ति होती है।

सफला एकादशी व्रत कथा

भविष्य उत्तरपुराण के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर महाराज ने भगवान कृष्ण से पूछा:

“हे मेरे प्रिय भगवान! कृपया मुझे सफला एकादशी का महत्व बताइए। यह व्रत कब मनाया जाता है, इसके देवता कौन हैं और इसे कैसे करना चाहिए?”

भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया:

“हे राजन! मैं तुम्हें सफला एकादशी से संबंधित एक कथा सुनाता हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनो, ताकि इसका महत्व और फल समझ सको।”

कथा का प्रारंभ

बहुत समय पहले, चंपावती नामक एक विशाल राज्य था। उसकी शासिका महिष्मति थीं। उनके चार पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा लूम्बक था। लूम्बक बहुत ही दुष्ट और पापी था। वह परायी पत्नियों के साथ संबंध रखता, मांसाहार करता, जुआ खेलता और वेश्याओं के साथ भी संबंध रखता था।

लूम्बक की बुद्धि इतनी दुष्ट थी कि वह अपने पिता का धन नष्ट करता और देवताओं से ईर्ष्या करता। वह केवल स्वयं को ही सबसे बड़ा मानता और देवताओं की निंदा करता था। उसे अवसर मिलते ही ब्राह्मणों और वैष्णवों की भी निंदा करता। राजा ने देखा कि लूम्बक कभी सुधार नहीं पाएगा, इसलिए उन्होंने उसे घर से निकाल दिया।

घर से निकाले जाने के बाद, लूम्बक दुखी और भ्रमित था। उसका मन पाप से भरा था। उसने सोचा कि दिन में जंगल में रहे और रात को लोगों को लूटे। वह रात में चोरी करता और दिन में जंगल में छिपकर जानवरों का शिकार कर मांस खाता।

लूम्बक का जीवन पूरी तरह पाप और अंधकार में बीत रहा था। उसका दिन पाप से शुरू होता और रात पाप से खत्म होती।

सफला एकादशी की रात, ठंड और कठिन परिस्थितियों के कारण लूम्बक सो नहीं पाया। अगली सुबह उसने महसूस किया कि उसका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया है। अब उसे शिकार करने और मांस खाने की भी शक्ति नहीं थी।

उसने जंगल में गिरे फलों को इकट्ठा किया और बरगद के पेड़ के नीचे रख दिया। बहुत परेशान होकर उसने भगवान हरि से प्रार्थना की कि उसके द्वारा अर्पित फलों को प्रसाद के रूप में स्वीकार करें।

असावधानीवश, लूम्बक ने सफला एकादशी का व्रत कर लिया और भगवान कृष्ण को फल अर्पित किए। इस पवित्र भक्ति से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न हुए।

अगले दिन, एक सफेद घोड़ा लूम्बक के पास आया। उसी समय आकाशवाणी हुई:

“हे लूम्बक! वासुदेव की कृपा से तुम्हारा दुःख समाप्त हो गया है। तुमने सफला एकादशी का व्रत किया है। इसलिए तुम्हारा राज्य वापस तुम्हें प्राप्त होगा।”

लूम्बक ने घोड़े पर बैठकर अपने पिता का राज्य संभाला। उसने भगवान कृष्ण की अनन्य भक्ति और नामस्मरण करना शुरू किया। धीरे-धीरे वह अपने पापमय जीवन से दूर हो गया और धर्म के मार्ग पर चल पड़ा। वृद्धावस्था में उसने राज्य अपने पुत्रों को सौंपा और सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर गोलोक की ओर चला गया।

भगवान कृष्ण ने कहा कि जो भी इस कथा को सुनेगा, उसे राजसू यज्ञ का फल मिलेगा। और जो सफला एकादशी की रात उनके नाम का कीर्तन करेगा, उसे पृथ्वी पर पिछले 5000 वर्षों के तप का फल प्राप्त होगा।

सफला एकादशी का व्रत न केवल पापों को नष्ट करता है, बल्कि भक्त के जीवन में सौभाग्य, समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष भी लाता है।

पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना और व्रत करने से वे विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं।

इस व्रत का पालन करने से न केवल संतानहीन दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति होती है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य भी बढ़ता है। जो व्यक्ति श्रद्धा और निष्ठा से इस व्रत का पालन करता है, उसे भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

बहुत समय पूर्व, महर्षियों और देवताओं से परिपूर्ण द्वापर युग में राजा सुकेतुमान का राज्य था। वे धर्मपरायण और प्रजा-प्रिय राजा थे। किन्तु उनके जीवन में एक बड़ी व्यथा थी – उनकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण राजा और उनकी रानी शैब्या दोनों अत्यंत दुखी रहते थे।

राजा सुकेतुमान अपने मन में विचार करते थे –

“यदि हमारे कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा, तो हमारे पूर्वजों का उद्धार कौन करेगा? उनके मोक्ष का कौन मार्ग प्रशस्त करेगा?”

यह विचार उन्हें दिन-रात पीड़ा देता रहा। उन्हें डर था कि संतान न होने से न केवल उनके पूर्वजों की मुक्ति संभव नहीं होगी, बल्कि वे स्वयं भी मोक्ष की प्राप्ति में असमर्थ रहेंगे।

इस कठिन समय में राजा ने राजसिंहासन त्यागकर वन में तपस्या करने का निश्चय किया। वन में विचरण करते हुए उनकी मुलाकात अनेक ऋषियों और साधु-संतों से हुई। राजा ने अपनी व्यथा और संतानहीनता की पीड़ा ऋषियों को सुनाई।

ऋषियों ने कहा –

“हे राजन्! तुम्हारी यह पीड़ा दूर हो सकती है। इसके लिए तुम्हें पौष मास की पुत्रदा एकादशी का व्रत श्रद्धा और निष्ठा के साथ रखना होगा। इस व्रत का पालन कर भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करो।”

राजा सुकेतुमान ने ऋषियों की आज्ञा का पालन किया। वे राज्य लौटे और अपने प्रजा सहित पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखा। उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की, तुलसी का पूजन किया, फल और फूल अर्पित किए तथा दिनभर उपवास रखा। रात्रि में जागरण करते हुए हरिनाम का संकीर्तन किया।

इस व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति करवाई। रानी शैब्या गर्भवती हुई और समय आने पर उन्हें एक तेजस्वी और गुणवान पुत्र हुआ।
तब से यह व्रत पौष पुत्रदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कहा जाता है कि श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन करने से न केवल संतानहीन दंपत्तियों को संतान प्राप्त होती है, बल्कि भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद भी मिलता है।

महत्व:

यह व्रत संतान सुख की प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय माना जाता है।

व्रती के जीवन में समृद्धि, सुख और ऐश्वर्य आता है।

कथा सुनने मात्र से भी यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।

माघ मास में आने वाली इस एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु का पूजन तिल से करने का विधान है। इस दिन तिल खाने और दान करने का विशेष महत्व है, इसी कारण इसे षटतिला एकादशी कहा जाता है।

यह व्रत माघ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन रखा जाता है। इस दिन व्रत करने वाले को व्रत कथा का पाठ करना चाहिए और पूजन के अंत में भगवान विष्णु की आरती करनी चाहिए। पारण के समय तिल का दान करना भी विशेष फलदायी माना जाता है।

षट्तिला एकादशी व्रत कथा

मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह अपने जीवन में हमेशा व्रत और पूजा करती रहती थी। एक समय उसने लगातार एक माह तक व्रत किया, जिससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। ब्राह्मणी अत्यंत बुद्धिमान थी, लेकिन उसने कभी अन्न या धन का दान नहीं किया था। इसे देखकर भगवान ने सोचा कि उसकी भक्ति से शरीर तो शुद्ध हो गया है और उसे विष्णुलोक तो मिलेगा, परंतु उसने कभी दान नहीं किया, इसलिए उसे संपूर्ण तृप्ति नहीं मिली।

भगवान ने भिखारी का वेश धारण किया और ब्राह्मणी के पास जाकर भिक्षा मांगी।

ब्राह्मणी ने कहा:

“महाराज, आप किसलिए आए हैं?”

भगवान ने कहा:

“मुझे भिक्षा चाहिए।”

ब्राह्मणी ने एक मिट्टी का ढेला उनके भिक्षापात्र में डाल दिया। भगवान उसे लेकर स्वर्ग लौट गए। कुछ समय बाद ब्राह्मणी का शरीर त्याग हो गया और वह भी स्वर्ग में पहुंची।

स्वर्ग में उसे सुंदर महल मिला, लेकिन उसका घर अन्न और अन्य सामग्री से खाली था। ब्राह्मणी ने भगवान से पूछा:

“भगवान! मैंने इतने व्रत और पूजा किए, फिर भी मेरा घर खाली क्यों है?”

भगवान ने उत्तर दिया:

“पहले अपने घर जाओ। देवस्त्रियां आएंगी। उनसे षट्तिला एकादशी का महत्व और विधि जानो, फिर द्वार खोलो।”

ब्राह्मणी जब अपने घर गई, तो देवस्त्रियां उसके पास आईं और द्वार खोलने के लिए कहा। ब्राह्मणी ने उनसे पूछा:

“आप मुझे देखने आई हैं, तो पहले मुझे षट्तिला एकादशी का पुण्य और विधि बताइए।”

देवस्त्रियों ने उसे व्रत का महत्व बताया। ब्राह्मणी ने उनका कथन मानकर षट्तिला एकादशी का व्रत किया।

इस व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी सुंदर और रूपवती बन गई। उसका घर अन्न और समस्त सामग्री से युक्त हो गया। इस व्रत से कष्ट, दुर्भाग्य और दरिद्रता दूर होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, इस दिन व्रत करने से भक्त किसी भी भूत, प्रेत या पिशाच जैसी दुष्ट योनि में नहीं जाते।

जया एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय में इंद्र की सभा में भव्य उत्सव का आयोजन हुआ। सभी देवी-देवता, संत और गंधर्व उसमें शामिल हुए। सभा में गायन और नृत्य का कार्यक्रम चल रहा था। गंधर्व कन्याएं और गंधर्व उत्साहपूर्वक नृत्य और गायन कर रहे थे।

इस दौरान नृत्य कर रही पुष्यवती की दृष्टि गंधर्व माल्यवान पर पड़ी। उसके यौवन और आकर्षण को देखकर पुष्यवती मोहित हो गई और अपनी लय-ताल भूल बैठी। वहीं, माल्यवान भी सही तरीके से गायन नहीं कर रहा था।

सभा में उपस्थित सभी लोग इस व्यवहार को देखकर क्रोधित हो उठे। यह देखकर स्वर्ग नरेश इंद्र भी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने दोनों को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। साथ ही श्राप दिया कि उन्हें प्रेत योनि प्राप्त होगी।

श्राप के कारण माल्यवान और पुष्यवती प्रेत योनि में चले गए। वहां उनका जीवन अत्यंत दुखद और कठिन हो गया।

एक बार माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी पर, दोनों ने अन्न का सेवन नहीं किया और दिन में केवल फलाहार किया। उन्होंने इस दौरान भगवान विष्णु का सुमिरन और भक्ति की।

भक्ति भाव देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने माल्यवान और पुष्यवती को प्रेत योनि से मुक्त किया। उन्हें सुंदर शरीर प्राप्त हुआ और दोनों फिर से स्वर्गलोक लौट गए। वहां पहुंचकर इंद्र को प्रणाम किया, जिससे इंद्र चकित रह गए।

माल्यवान ने सभी को बताया कि जया एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें पिशाच योनि जैसी दुष्ट जन्मों से मुक्ति प्राप्त हुई। इस प्रकार, जो कोई व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति भाव से करता है, उसे भी ऐसे जन्मों से मुक्ति मिलती है। जया एकादशी का व्रत भक्त को मोक्ष और भगवान विष्णु की अनंत कृपा प्रदान करता है। इस दिन उपवास रहना, फलाहार करना और भगवान का स्मरण कर भक्ति करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जो व्यक्ति इस व्रत को भक्ति और श्रद्धा से करता है, उसके सभी कार्य निश्चित रूप से सफल होते हैं। यह व्रत भक्तों को केवल सांसारिक सफलता ही नहीं देता, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक उन्नति, सुख और समृद्धि भी प्रदान करता है।.

विजया एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से फाल्गुन कृष्ण एकादशी, जिसे विजया एकादशी कहा जाता है, के महत्व के बारे में पूछा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो भक्त इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति से रखता है, उसे सफलता और मोक्ष की प्राप्ति होती है, और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।

एक समय की बात है। नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से विजया एकादशी के महत्व को पूछा। ब्रह्मा जी ने बताया कि त्रेतायुग में अयोध्या के राजा दशरथ थे। उनकी पत्नी कैकेयी ने उनसे दो वचन माँगे—एक, कि राम को चौदह वर्षों का वनवास देना, और दूसरा, कि भरत को राज्य सिंहासन देना। पिता की आज्ञा से भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन चले गए।

वन में रावण ने सीता माता का हरण कर लिया। राम और लक्ष्मण माता सीता की खोज में भटकते रहे और वहां उनकी मुलाकात हनुमान जी से हुई।

हनुमान जी के मार्गदर्शन और सुग्रीव से मित्रता के बाद वानर सेना सीता माता की खोज में जुट गई। भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई की योजना बनाई, लेकिन सबसे बड़ी बाधा समुद्र था।

तभी लक्ष्मण ने भगवान राम को बताया कि पास ही वकदालभ्य ऋषि का आश्रम है। राम वहां गए और उनसे मार्गदर्शन माँगा। ऋषि ने कहा कि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करें। इस व्रत को अपने सहयोगियों और प्रियजनों के साथ करें। उन्होंने इस व्रत की पूरी विधि बताई और आश्वासन दिया कि इससे कार्य में सफलता मिलेगी।

भगवान राम ने विजया एकादशी का व्रत विधि-विधान से रखा और भगवान विष्णु की पूजा की। इसके पुण्य से वानर सेना समुद्र पार करने में सफल हुई और लंका पर विजय प्राप्त की। भगवान राम ने रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। इसके बाद वे माता सीता सहित अयोध्या लौट आए।

जो कोई भी श्रद्धा और भक्ति के साथ विजया एकादशी का व्रत करता है, उसे अपने कार्यों में सफलता, सुख, समृद्धि और भगवान विष्णु की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के साथ आंवले के पेड़ की पूजा-अर्चना करने का विशेष विधान है। साथ ही, अन्न और धन का दान करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन आमलकी एकादशी की कथा का पाठ करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और इसे करने वाले साधक को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है।

आमलकी एकादशी व्रत कथा

वैदिक नामक नगर में चंद्रवंशी राजा का राज्य था। नगरवासी भगवान विष्णु के अत्यंत भक्त थे और वे नियमित रूप से एकादशी व्रत करते थे। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी के दिन पूरे नगरवासी विधिपूर्वक व्रत करके भगवान विष्णु की पूजा कर रहे थे।

उसी समय नगर में एक पापी शिकारी आया। वह नगर में ठहरकर भगवान विष्णु की कथा सुनने लगा। शिकारी ने पूरी रात जागरण करते हुए कथा सुनी और भक्ति भाव से समय बिताया। इसके बाद वह घर लौटकर सो गया। कुछ दिनों बाद, इस शिकारी का देहांत हो गया। उसके पापों के कारण उसे नरक में कष्ट भोगने पड़े। लेकिन, उसके पूर्व जन्म में उसने अनजाने में आमलकी एकादशी का व्रत सुना और जागरण किया था। इस पुण्य के प्रभाव से उसे शुभ फल मिला। इसी पुण्य के कारण वह पुनर्जन्म में राजा विदूरथ के घर जन्मा और उसका नाम वसुरथ रखा गया।

एक दिन वसुरथ जंगल में भटकते हुए एक पेड़ के नीचे सो गया। तभी कुछ डाकुओं ने उस पर हमला किया, लेकिन उनके सभी अस्त्र-शस्त्र का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वसुरथ सुरक्षित रहा।

तभी आकाशवाणी हुई कि, “हे वसुरथ! जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने तेरी रक्षा की है। यह सब तुम्हारे पिछले जन्म में आमलकी एकादशी व्रत और कथा सुनने के पुण्य के कारण संभव हुआ।”

चैत्र मास की कृष्ण पक्ष एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन किए जाने वाले उपवास से सभी पापों का नाश होता है और आत्मा शुद्ध होती है। यह व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही, यह दिन श्री हरि विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी होता है।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

राजा मान्धाता ने धर्म के रहस्यों के ज्ञाता महर्षि लोमश से पूछा: “हे ऋषिश्रेष्ठ! मनुष्य अपने पापों से कैसे मुक्ति पा सकता है? कृपया ऐसा सरल उपाय बताइए, जिससे सभी लोग अपने पापों से आसानी से छुटकारा पा सकें।”

महर्षि लोमश ने कहा:

“हे राजन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचिनी कहलाती है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।

प्राचीन काल में ‘चैत्ररथ’ नामक एक सुंदर वन था। वहाँ अप्सराएँ किन्नरों के साथ विचरण किया करती थीं। वहां हमेशा वसंत का मौसम रहता था, फूलों की खुशबू और रंग बिखरे रहते थे। कभी गंधर्व कन्याएँ वहां गाती और नृत्य करतीं, कभी देवता अपनी क्रीड़ाओं में व्यस्त रहते।

उस वन में मेधावी नामक एक ऋषि तपस्या में लीन रहते थे। वे परम शिवभक्त थे। एक दिन मञ्जुघोषा नामक अप्सरा ने उनकी साधना से मोहित होकर उनकी ओर आकर्षित होना चाहा। उसने दूरी से वीणा बजाई और मधुर स्वर में गीत गाना शुरू कर दिया।

इस समय कामदेव भी महर्षि मेधावी को मोहने के प्रयास में लगे। उसने उस सुंदर अप्सरा को अपनी शक्ति से प्रभावित किया।

मेधावी ऋषि युवा और बलशाली थे। यज्ञोपवीत और दण्ड धारण किए हुए थे। उन्होंने मञ्जुघोषा के मधुर गाने और रूप को देखकर, कामदेव के प्रभाव में आकर उसके साथ रमण करना शुरू कर दिया। इतने में उन्हें दिन-रात का ज्ञान ही नहीं रहा। उन्होंने कई समय तक इस मोह में रमण किया।

एक दिन मञ्जुघोषा ने कहा: “हे ऋषिवर! अब मुझे स्वर्ग जाने की अनुमति दें।”

महर्षि ने उत्तर दिया: “अभी नहीं, थोड़ी देर और ठहरो।”

अप्सरा ने कहा: “आप स्वयं ही सोचिए, अब कितने समय से मैं आपके साथ हूँ? क्या अब और ठहरना उचित है?”

तभी महर्षि मेधावी को समय का बोध हुआ और उन्होंने देखा कि उनके रमण में ५७ वर्ष बीत चुके हैं। तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और क्रोध आया। क्रोध में उन्होंने अपनी दृष्टि से अप्सरा को श्राप दिया।

महर्षि ने कहा: “तू मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा है। अब तू पिशाचिनी बन जा।”

श्राप से मञ्जुघोषा पिशाचिनी बन गई। वह व्यथित होकर बोली:

“हे ऋषिवर! कृपया मुझे इस शाप से मुक्ति का उपाय बताइए। मैंने आपके साथ कई वर्ष व्यतीत किए हैं। अगर आप प्रसन्न न होंगे तो लोग कहेंगे कि मैं एक पुण्य आत्मा के साथ रहने पर भी पिशाचिनी बन गई।”

अप्सरा की बात सुन महर्षि को अपने क्रोध और भूल पर पछतावा हुआ। उन्होंने मञ्जुघोषा से कहा:

“तुमने मुझे कष्ट दिया, फिर भी मैं तुम्हें इस श्राप से मुक्ति का उपाय बताता हूँ। चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचिनी का व्रत करने से तू इस शाप से मुक्त हो जाएगी।”

मञ्जुघोषा ने उस व्रत का पालन किया और पिशाचिनी का रूप त्यागकर पुनः सुन्दर रूप धारण किया और स्वर्गलोक चली गई।

महर्षि मेधावी भी अपने पापों की क्षमा के लिए अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए। ऋषि ने कहा:

“हे पुत्र! तुम चैत्र मास की पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।”

महर्षि मेधावी ने यह व्रत विधिपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए और उन्हें शांति और पुण्य प्राप्त हुआ।

महर्षि लोमश ने राजा मान्धाता को समझाया:

“हे राजन! पापमोचिनी एकादशी के व्रत और कथा का श्रवण करने से भी अत्यधिक पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत करने से ब्रह्म हत्या, चोरी, मद्यपान जैसे भयंकर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अंत में व्यक्ति स्वर्गलोक की प्राप्ति करता है।”

देव प्रबोधिनी एकादशी द्वितीय व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत बड़े श्रद्धा और नियमपूर्वक करते थे। उस राज्य में ऐसा नियम था कि एकादशी के दिन नौकर-चाकरों से लेकर पशु-पक्षियों तक को भी अन्न नहीं दिया जाता था।

एक दिन किसी अन्य राज्य का एक व्यक्ति उस राजा के पास आया और बोला –

“महाराज! कृपा करके मुझे अपनी सेवा में नौकरी दे दीजिए।” राजा ने उसकी परीक्षा लेने के लिए शर्त रखी –

“ठीक है, तुम हमारी सेवा में रह सकते हो। परंतु ध्यान रखना, रोज तो तुम्हें भोजन मिलेगा, पर एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा।”

व्यक्ति ने उस समय ‘हाँ’ कह दिया। परंतु जैसे ही एकादशी का दिन आया और उसे फलाहार देने की तैयारी की गई, वह भयभीत होकर राजा के पास गया और विनती करने लगा –

“महाराज! मेरा पेट इससे नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊँगा। कृपया मुझे अन्न दें।”

राजा ने उसे उसकी शर्त याद दिलाई। फिर भी वह अपनी बात पर अड़ा रहा। अंततः राजा ने उसे आटा, दाल और चावल देकर अनुमति दे दी। व्यक्ति नित्य की भांति नदी के पास गया, स्नान किया और भोजन बनाने लगा। जब भोजन तैयार हुआ, तो उसने भगवान को बुलाया –

“हे भगवान! भोजन तैयार है, कृपया पधारें।”

उसके आह्वान पर पीताम्बर धारण किए हुए भगवान चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए और प्रेमपूर्वक उसके साथ भोजन करने लगे। भोजन करने के बाद भगवान अंतर्धान हो गए और वह व्यक्ति अपने कार्य में लग गया।

भगवान के साथ भोजन का चमत्कार पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी पर वह व्यक्ति राजा से कहने लगा –

“महाराज! कृपया मुझे दुगुना अन्न दीजिए। आज तो मैं पूरा दिन भूखा रहा।”

राजा ने कारण पूछा। उसने उत्तर दिया –

“महाराज! भगवान भी मेरे साथ भोजन करते हैं। इसलिए हमारे दोनों के लिए सामान कभी पूरा नहीं होता।” राजा यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गया और बोला –

“मैं विश्वास नहीं कर सकता कि भगवान तुम्हारे साथ भोजन करते हैं। मैं स्वयं तो कई वर्षों से व्रत और पूजा करता आ रहा हूँ, फिर भी उन्होंने मुझे दर्शन नहीं दिए।”

व्यक्ति ने कहा –

“महाराज! यदि आप विश्वास नहीं करते, तो मेरे साथ चलकर देख लें।”

राजा ने एक वृक्ष के पीछे छिपकर देखा। व्यक्ति ने नित्य की भांति भोजन तैयार किया और शाम तक भगवान को बुलाया। परंतु भगवान प्रकट नहीं हुए। अंत में उसने कहा –

“हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूँगा।”

उसके दृढ़ निश्चय और श्रद्धा को देखकर भगवान स्वयं प्रकट हुए, उसे रोका और साथ बैठकर भोजन किया। इसके बाद उन्होंने उसे अपने विमान में बैठाकर अपने धाम में ले गए।

राजा को ज्ञान

यह देखकर राजा को यह सीख मिली कि व्रत-उपवास का वास्तविक फल तभी मिलता है, जब मन पूर्णतः शुद्ध और श्रद्धापूर्ण हो। इसके बाद राजा ने भी मन से व्रत करने का निश्चय किया और अंततः स्वर्ग की प्राप्ति की।

देवप्रबोधिनी एकादशी तृतीय व्रत कथा

एक नगर में एक धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। उसके राज्य में सभी लोग सुख-शांति और समृद्धि के साथ रहते थे। उस नगर में एकादशी का नियम यह था कि उस दिन कोई अन्न न बेचता, न पकाता; सभी केवल फलाहार करते थे और व्रत का पालन करते थे।

एक बार भगवान नारायण ने उस राजा की भक्ति और धर्म की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने एक सुंदरी का रूप धारण किया और नगर की सड़कों पर बैठ गए। राजा जब उधर से निकला, तो उसने उस सुंदरी को देखा और चकित होकर पूछा –

“हे सुंदरी! आप कौन हैं और इस तरह यहां क्यों बैठी हैं?”

सुंदरी के रूप में भगवान बोले –

“मैं निराश्रिता हूँ। नगर में मेरा कोई परिचित नहीं है। किससे सहायता माँगूँ?”

राजा उसके रूप पर मोहित हो गया और बोला –

“तुम मेरे महल में चलो, मेरी रानी बनो और आराम से रहो। मैं तुम्हारी सेवा करूंगा।”

सुंदरी ने कहा –

“यदि मैं आपकी रानी बनूँ, तो राज्य का अधिकार मुझे सौंपना होगा। राज्य पर मेरा पूर्ण अधिकार रहेगा। मैं जो भी बनाऊँगी, आपको उसे स्वीकार करना होगा।”

राजा उसके रूप में मोहित था, अतः उसने सभी शर्तें स्वीकार कर लीं।

अगले दिन एकादशी थी। रानी ने हुक्म दिया कि बाजार में अन्य दिनों की भांति अन्न बिके और घर में मांस, मछली आदि पकवाए जाएँ। उसने राजा से कहा कि वह भोजन करें। राजा ने देखा और कहा –

“महारानी! आज एकादशी है। मैं केवल फलाहार करूंगा।”

रानी ने कहा –

“शर्त याद है न? या तो खाना खाओ, नहीं तो बड़े राजकुमार का सिर कट जाएगा।”

राजा भयभीत हो गया और अपने पुत्र को बचाने का उपाय सोचने लगा। उसने अपनी परेशानी रानी से कह दी।

रानी ने उत्तर दिया –

“महाराज! धर्म न छोड़ें। पुत्र तो फिर मिल जाएगा, पर धर्म खो जाएगा। यदि धर्म बचाना है, तो बड़े राजकुमार का सिर दे देना चाहिए।” इसी समय बड़ा राजकुमार खेलते-खेलते आया। उसने मां की आंखों में आंसू देखे और कारण पूछा। मां ने पूरी बात बताई।

राजकुमार ने निःसंकोच कहा –

“मां! यदि पिता का धर्म बचाने के लिए मेरा बलिदान देना आवश्यक है, तो मैं तैयार हूँ। पिताजी का धर्म सुरक्षित रहेगा।”

राजा दुःखी मन से अपने पुत्र का बलिदान देने को तैयार हुआ। तभी रानी का रूप भगवान विष्णु का वास्तविक रूप बन गया। भगवान बोले –

“राजन! तुमने इस कठिन परीक्षा में अपनी भक्ति, धर्म और साहस का परिचय दिया। तुम सफल हुए।” भगवान प्रसन्न होकर राजा से वरदान

मांगने लगे। राजा ने नम्रता से कहा –

“हे प्रभु! आपका दिया हुआ सब कुछ है। कृपया हमारा उद्धार करें।” तत्क्षण वहाँ एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। राजा ने अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और उस विमान में बैठकर परमधाम की ओर प्रस्थान किया।

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहते हैं। पद्मपुराण में वर्णित है कि जो कामदा एकादशी का व्रत करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

कामदा एकादशी व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। नागपुर नामक एक सुंदर नगर में सोने के महल बने हुए थे। इस नगर में पुण्डरीक नामक नागराज राज्य करता था। यहाँ गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ भी निवास करती थीं।

इस नगर में ललिता नामक एक श्रेष्ठ अप्सरा थी। उसके साथ गंधर्व ललित भी था। दोनों पति-पत्नी थे और एक-दूसरे के प्रति अत्यंत प्रेम भाव रखते थे। ललिता के हृदय में हमेशा अपने पति की छवि बसती थी और ललित के हृदय में अप्सरा ललिता का सदा निवास था।

एक दिन नागराज पुण्डरीक अपनी राजसभा में बैठे मनोरंजन कर रहे थे। उसी समय ललित का गान हो रहा था, परन्तु उसकी प्रिय पत्नी ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। गान करते-करते ललित को अपनी पत्नी की याद आई।

नागों में श्रेष्ठ ककर्कोटक ने देखा कि ललित अपने मन में किसी काम से व्यथित हो रहा है। उसने यह बात नागराज पुण्डरीक को बताई। क्रोध से लाल आँखों वाले नागराज ने गाते हुए कामातुर ललित को शाप दिया:

“दुर्बुद्धे! तू मेरे सामने गान करते हुए भी काम के प्रभाव में आ गया, इसलिए अब तू राक्षस बन जा।”

इतना कहते ही ललित गंधर्व से राक्षस में परिवर्तित हो गया। उसका रूप भयंकर और विकराल था, देखने मात्र से भय फैलाने वाला। राक्षस रूप में वह अपने कर्मों का फल भोगने लगा।

ललिता अपने पति को इस विकराल रूप में देखकर बहुत दुःखी हुई। उसने सोचा:

“अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पति पापों के कारण दुःख भोग रहे हैं।”

वह रोते हुए घने जंगलों में उनके पीछे-पीछे चलने लगी।

जंगल में चलते हुए उसे एक सुंदर आश्रम दिखाई दिया, जहाँ एक शांत और दयालु मुनि बैठे थे। ललिता वहां गई, मुनि का प्रणाम किया और अपने दुःख का विवरण सुनाया।

मुनि ने पूछा:

“शुभे! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो? सच-सच बताओ।”

ललिता ने कहा:

“महामुने! मैं वीरधन्वा नामक गंधर्व की पुत्री हूँ। मेरा नाम ललिता है। मेरे पति अपने पापों के कारण राक्षस बन गए हैं। मैं चाहती हूँ कि आप मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पति का राक्षस रूप समाप्त हो और वे पुनः अपने पूर्व रूप में लौट सकें।”

मुनि ने उत्तर दिया:

“भद्रे! इस समय चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की ‘कामदा एकादशी’ आई हुई है। यह एकादशी सभी पापों को हरने वाली और श्रेष्ठ व्रत मानी जाती है। तुम विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करो और इसका पुण्य अपने पति को समर्पित कर दो। ऐसा करने से क्षणभर में ही उनके शाप का दोष दूर हो जाएगा।”

ललिता ने व्रत का पालन किया। द्वादशी के दिन उसने मुनि और भगवान वासुदेव के समक्ष यह संकल्प किया:

“मैंने कामदा एकादशी का उपवास विधिपूर्वक किया। इसका पुण्य मेरे पति पर प्रभावी हो और उनका राक्षस रूप समाप्त हो।”

वास्तव में, ललिता के इस व्रत और पुण्य के प्रभाव से ललित का राक्षस रूप समाप्त हो गया। उसने दिव्य रूप धारण किया और पुनः गंधर्व बनकर अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

मुनि वसिष्ठ जी कहते हैं कि कामदा एकादशी का व्रत न केवल पापों और राक्षसत्व से मुक्ति दिलाता है, बल्कि ब्रह्महत्या, पिशाचत्व और अन्य भयंकर पापों का नाश भी करता है।

इस व्रत की कथा सुनने और पढ़ने मात्र से भी वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत का फल दस हज़ार वर्ष तक कठोर तप करने के समान माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक मन स्वर्णदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से भी मिलता है। इस व्रत को करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोगता है और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति करता है। यदि कोई अभागिनी स्त्री इस व्रत का पालन करती है तो उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इसे कन्या दान के बराबर बताया गया है तथा वरूथिनी एकादशी का व्रत अन्न दान और कन्या दान दोनों के समान पुण्य प्रदान करता है। इस पावन व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और धर्म-लाभ दोनों ही बढ़ते हैं।

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल की बात है। नर्मदा नदी के किनारे एक महान और दानशील राजा राज्य करते थे। उनका नाम था राजा मान्धाता। वे बहुत धर्मप्रिय, दानवीर और तपस्वी स्वभाव के थे। वे प्रजा का पालन भी न्याय और प्रेम से करते थे।

एक दिन राजा मान्धाता जंगल में जाकर गहन तपस्या में लीन हो गए। वे पूरी श्रद्धा और मन से भगवान का ध्यान कर रहे थे। तभी अचानक वहाँ एक भयंकर जंगली भालू आ गया।

भालू ने राजा पर हमला कर दिया और उनका पैर चबाने लगा। यह सब होने पर भी राजा अपनी तपस्या से विचलित नहीं हुए। उन्होंने क्रोध या हिंसा का मार्ग नहीं चुना, बल्कि अपने मन को स्थिर रखते हुए भगवान विष्णु का ध्यान करते रहे।

भालू राजा को घसीटते हुए जंगल के भीतर ले गया। राजा का शरीर पीड़ा से तड़प रहा था, लेकिन फिर भी उन्होंने भगवान विष्णु से करुणा भरे स्वर में प्रार्थना की –

“हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए।” राजा की यह सच्ची पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु वहीं प्रकट हो गए। उन्होंने अपने Sudarshan Chakra (सुदर्शन चक्र) से भालू का वध कर दिया और राजा को उस संकट से बचा लिया। लेकिन तब तक भालू राजा का एक पैर पहले ही खा चुका था। अपने शरीर को अधूरा देखकर राजा मान्धाता बहुत दुःखी और शोकाकुल हो गए।

तब भगवान विष्णु ने करुणा पूर्वक उनसे कहा –

“वत्स! शोक मत करो। यह घटना तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है। लेकिन अब समाधान भी है। तुम मथुरा जाओ और वहाँ जाकर श्रद्धा से वरूथिनी एकादशी का व्रत करो तथा मेरे वराह अवतार की पूजा करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हें पुनः पूर्ण और सुंदर शरीर प्राप्त होगा।”

भगवान विष्णु की आज्ञा पाकर राजा मान्धाता मथुरा पहुँचे। वहाँ उन्होंने पूरे नियम, श्रद्धा और भक्ति से वरूथिनी एकादशी का व्रत किया और भगवान वराह की आराधना की।

इस व्रत की अपार शक्ति से राजा का शरीर शीघ्र ही पहले जैसा सुंदर और संपूर्ण हो गया। वे फिर से स्वस्थ और बलवान बन गए।

इसी वरूथिनी एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा मान्धाता ने न केवल अपना शरीर पाया, बल्कि जीवन के अंत में स्वर्गलोक को भी प्राप्त किया।

जो भी भक्त श्रद्धा से वरूथिनी एकादशी का व्रत करता है और भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा करता है, उसे शारीरिक दुःख, पाप और विपत्तियों से मुक्ति मिलती है। यह व्रत मनुष्य को संपूर्णता, सुख और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाला है।

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से न केवल इस जन्म के पाप, बल्कि पूर्वजन्म के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। व्यक्ति सुखमय जीवन व्यतीत करता है और मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है। इसके महत्व के बारे में सबसे पहले भगवान श्रीराम को उनके गुरु वशिष्ठ ने बताया था। बाद में महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने भी युधिष्ठिर को इसका महत्व समझाया था। कहा जाता है कि मोहिनी एकादशी की कथा को केवल पढ़ने या सुनने मात्र से ही हजार गायों के दान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में सरस्वती नदी के सुंदर तट पर भद्रावती नाम की नगरी बसी हुई थी। इस नगरी पर चंद्रवंश में उत्पन्न एक धर्मात्मा राजा द्युतिमान राज्य करते थे।

उसी नगर में धनपाल नाम का एक अत्यंत समृद्ध और पुण्यात्मा वैश्य रहता था। धनपाल बहुत ही दानी और धर्मपरायण था। वह लोगों के लिए कुएँ, तालाब, बगीचे, धर्मशालाएँ और मठ बनवाता था। भगवान विष्णु के प्रति उसकी अपार भक्ति थी और वह हर समय पुण्यकर्म में लीन रहता था।

धनपाल के पाँच पुत्र थे –
  • सुमना
  • द्युतिमान
  • मेधावी
  • सुकृत
  • धृष्टबुद्धि

इन पाँचों में सबसे छोटा था धृष्टबुद्धि। उसका स्वभाव बिलकुल विपरीत था। वह पाप कर्मों में लिप्त रहता, जुआ खेलने का शौकीन था और वेश्याओं की संगति में अपना जीवन बिगाड़ता था। न तो उसे देवताओं की पूजा का ध्यान था और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सम्मान की परवाह। धीरे-धीरे उसने पिता का संचित धन भी दुराचार में नष्ट कर दिया। एक दिन धृष्टबुद्धि नगर के चौराहे पर वेश्याओं के साथ घूमता हुआ लोगों को दिख गया। यह देखकर धनपाल ने क्रोधित होकर उसे घर से निकाल दिया। परिवार और संबंधियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया।

अब धृष्टबुद्धि भटकते-भटकते दुख और निराशा से भर गया। भूख, प्यास और तिरस्कार से पीड़ित होकर वह इधर-उधर भटकने लगा।

एक दिन संयोग से वह महान ऋषि कौण्डिन्य मुनि के आश्रम में जा पहुँचा। उस समय वैशाख मास का शुभ समय था। ऋषि गंगाजी में स्नान कर आश्रम लौट रहे थे। धृष्टबुद्धि, जो अपने पापों और दुखों से व्याकुल था, उनके पास जाकर हाथ जोड़कर बोला –

“हे मुनिवर! कृपा करके मुझे ऐसा कोई व्रत बताइए, जिससे मेरे जीवन के पाप नष्ट हो जाएँ और मुझे मुक्ति का मार्ग मिल सके।” ऋषि कौण्डिन्य ने करुणा पूर्वक उत्तर दिया –

“वत्स! वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करो। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के अनेक जन्मों के पाप, चाहे वे मेरु पर्वत जितने बड़े क्यों न हों, समाप्त हो जाते हैं।”

ऋषि के वचन सुनकर धृष्टबुद्धि के हृदय में आशा और शांति का संचार हुआ। उसने विधि-विधान से मोहिनी एकादशी का व्रत किया और भक्ति भाव से भगवान विष्णु की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से धृष्टबुद्धि के सारे पाप नष्ट हो गए। उसे दिव्य शरीर प्राप्त हुआ और अंत में वह भगवान विष्णु के धाम को चला गया, जहाँ उसे अनंत सुख की प्राप्ति हुई।

फलश्रुति (संदेश):

मोहिनी एकादशी का व्रत अति पवित्र और कल्याणकारी है। इसके प्रभाव से मनुष्य पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। जो भी भक्त इस व्रत कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे सहस्र गोदान के बराबर पुण्य मिलता है।

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है।

इसकी कथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। भगवान ने बताया कि यह एकादशी पुण्य देने वाली है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के भारी से भारी पाप नष्ट हो जाते हैं। अपरा एकादशी से मिटने वाले पाप
  • भूत-योनि में जाने का डर,
  • ब्रह्महत्या का दोष,
  • झूठी गवाही देना,
  • दूसरों की निंदा करना,
  • झूठ बोलना,
  • झूठे शास्त्र बनाना या पढ़ना,
  • परस्त्री गमन,
  • झूठा ज्योतिषी या वैद्य बनना—

ये सब पाप इस एकादशी का व्रत करने से समाप्त हो जाते हैं।

यहां तक कि जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाते हैं और नरकगामी हो जाते हैं, वे भी इस व्रत के प्रभाव से स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेते हैं।

जो शिष्य गुरु से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनकी निंदा करते हैं, वे भी इस पाप से मुक्त होकर सद्गति पाते हैं।

इस व्रत का पुण्यफल

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा –

“राजन्! जो फल कार्तिक पूर्णिमा को तीनों पुष्करों में स्नान करने से मिलता है,

या जो फल गंगाजी के तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है,

वही फल अपरा एकादशी का व्रत करने से मिलता है। इसके अतिरिक्त –

  • मकर संक्रांति पर प्रयागराज में स्नान,
  • शिवरात्रि का व्रत,
  • जब बृहस्पति सिंह राशि में हों तब गोमती नदी में स्नान,
  • केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शन,
  • सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान व दान,
  • स्वर्णदान,
  • या गौदान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है—

उसी के बराबर फल केवल अपरा एकादशी का व्रत करने से मिलता है।”

अपरा एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक राजा था। वह अत्यंत धर्मात्मा, दयालु और प्रजा का हितैषी शासक था। उसकी प्रजा उसे बहुत मानती थी। परंतु उसका छोटा भाई वज्रध्वज स्वभाव से क्रूर, अधर्मी और ईर्ष्यालु था। वह अपने बड़े भाई की लोकप्रियता और धर्मप्रियता से हमेशा जलता रहता था।

ईर्ष्या के वशीभूत होकर वज्रध्वज ने एक दिन रात के समय कपट से अपने ही बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। हत्या करने के बाद उसने राजा के शरीर को जंगल में जाकर एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया।

इस अकाल मृत्यु के कारण राजा महीध्वज की आत्मा प्रेत योनि में भटकने लगी। वह उसी पीपल के पेड़ पर वास करने लगा और दुःख तथा क्रोध के कारण वहां से निकलने वाले लोगों को डराने-धमकाने और उत्पात मचाने लगा। कुछ समय बाद संयोगवश महान तपस्वी और विद्वान ऋषि धौम्य वहां से गुजरे। उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान और तपोबल से समझ लिया कि यह प्रेत वास्तव में धर्मात्मा राजा महीध्वज की आत्मा है, जिसकी हत्या उसके छोटे भाई ने की है। ऋषि धौम्य को उस आत्मा पर दया आ गई। उन्होंने मंत्र शक्ति से प्रेत को पीपल के वृक्ष से नीचे उतारा और उसे धर्म और परलोक विद्या का उपदेश दिया।

इसके बाद ऋषि धौम्य ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया और उस व्रत से प्राप्त पुण्य को राजा महीध्वज की आत्मा को समर्पित कर दिया। ऋषि की करुणा और एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि समाप्त हो गई। वह अपने पापों से मुक्त होकर दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर स्वर्ग जाने के योग्य बन गया।

राजा महीध्वज ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए ऋषि धौम्य को प्रणाम किया और दिव्य पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान कर गया।

जो कोई इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करता है या श्रद्धा से इसकी कथा को सुनता-पढ़ता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उत्तम लोक को प्राप्त करता है।

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है।

सालभर में आने वाली सभी एकादशियों के बराबर का पुण्यफल केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखने से ही प्राप्त होता है। इस दिन जो भी भक्त पूरे विधि-व्यवस्था और श्रद्धा के साथ निर्जला उपवास करते हैं, उन्हें भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा मिलती है और उन्हें वैकुंठ लोक में स्थान प्राप्त होता है।

निर्जला एकादशी का व्रत न केवल पापों को नष्ट करता है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी लाता है। साथ ही, इस व्रत का पालन करने से मनुष्य के पूर्व जन्मों के पाप भी समाप्त हो जाते हैं और वह मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

वेदव्यास जी के अनुसार, एकादशी के दिन भोजन करना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान आदि कर, भगवान श्रीहरि की पूजा करें और अपने सभी काम निपटा कर पहले ब्राह्मणों को भोजन कराएँ, उसके बाद स्वयं भोजन करें। जननाशौच और मृत्युस्नान के समय भी एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए।

भीमसेन ने कहा कि राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव सभी एकादशी का व्रत करते हैं और मुझे भी कहते हैं कि मैं इसे निभाऊँ। पर मैं कहता हूँ कि मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की अग्नि हमेशा जलती रहती है। इसलिए मैं साल में केवल एक बार ही उपवास कर सकता हूँ। यदि संभव हो तो कोई ऐसा उपवास बताइए जिससे मैं स्वर्ग प्राप्त कर सकूँ और कल्याण का फल मिल सके।

व्यास जी ने कहा – भीम, ज्येष्ठ मास में जब सूर्य वृषभ या मिथुन राशि में होता है, उस समय आने वाली एकादशी को निर्जला उपवास के रूप में करें। इस दिन केवल कुल्ला या आचमन के लिए ही जल ग्रहण किया जा सकता है। सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक किसी भी प्रकार का जल न पिएँ। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को जल और दान दें और उसके बाद स्वयं भोजन करें।

निर्जला एकादशी का पुण्य बहुत महान है। वर्षभर में जितनी भी एकादशियां आती हैं, उनके सभी पुण्यफल केवल निर्जला एकादशी के व्रत से प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति इसे विधिपूर्वक करता है, उसके पास कभी भी यमदूत नहीं आते। जब उसका अंतिम समय आता है, तब पीताम्बरधारी, सौम्य और सुदर्शन चक्रधारी विष्णुदूत उसे भगवान श्रीविष्णु के धाम तक ले जाते हैं। स्त्री या पुरुष, चाहे उसने कितने ही बड़े पाप किए हों, निर्जला एकादशी का व्रत करने से वे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन जो भी स्नान, दान, जप, होम आदि करता है, उसका फल अक्षय होता है। व्रत करने वाला ब्रह्म हत्या, चोरी, शराब पीना, गुरु का अपमान जैसी बड़ी गलतियों से भी मुक्त हो जाता है।

निर्जला एकादशी के दिन विशेष रूप से ब्राह्मणों को जल, शक्कर, वस्त्र, मिष्ठान और दक्षिणा का दान करें। यदि संभव हो तो जलमयी गाय या घृतमयी गाय का दान करें। ऐसा करने से ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं और भगवान श्रीहरि भक्त को मोक्ष प्रदान करते हैं। जो लोग इस दिन जागरण, दान और पूजा करते हैं, वे स्वयं और अपनी आने वाली पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के धाम तक पहुँचाते हैं। संध्या में मंत्रोच्चार के साथ जल और घड़े का दान करें:

“देवदेव हृषीकेश, संसार सागर से तारने वाले, इस जल के घड़े का दान करने से मुझे परम गति प्रदान कीजिए।”

भीमसेन ने यह व्रत विधिपूर्वक किया और अपने जीवन में इसे आरंभ किया। तभी से इसे लोक में पाण्डव द्वादशी के नाम से जाना जाता है।

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है।

इस व्रत का पुण्य बहुत अधिक है। इसे करने से लगभग अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल मिलता है। योगिनी एकादशी का पालन करने वाले को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।

यह व्रत विशेष रूप से पापों के नाश, पुण्य की प्राप्ति और आत्मा की शुद्धि के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इसके साथ ही, इसे विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी आती है

योगिनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—“श्रीजन! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम और उसका महत्व बताइए।”
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया—“राजन्! आषाढ़ कृष्णपक्ष की यह एकादशी ‘योगिनी’ कहलाती है। यह व्रत बहुत पुण्यदायक है और बड़े पापों को भी नष्ट करने वाला है।”

अलकापुरी में भगवान कुबेर राज करते थे। वे सदा भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। उनके हेममाली नामक यक्ष सेवक थे, जो मंदिर में फूल लाकर पूजा में सहायक होते थे। हेममाली अपनी साधारण जिम्मेदारियों में लापरवाही करने लगा। एक दिन वह समय पर पुष्प लेकर नहीं पहुंचा। कुबेर महाराज जब पूजा कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि हेममाली नहीं आया। क्रोधित होकर उन्होंने पूछा, “हे सेवक! यह विलंब क्यों है?”

सेवकों ने उत्तर दिया—“राजन्! हेममाली अपने निजी कामों में व्यस्त होने के कारण समय पर नहीं आया।”
कुबेर ने तुरंत हेममाली को बुलवाया।

हेममाली डर और पछतावे से भरकर महाराज के सामने खड़ा हुआ। कुबेर ने क्रोध में उसे कोढ़ की बीमारी के साथ जंगल में भेज दिया। हेममाली अत्यंत दुखी और बीमार होकर दर-दर भटकने लगा।

इधर, पर्वतों में तपस्या कर रहे महर्षि मार्कण्डेयजी के दर्शन उसे हुए। हेममाली ने अपनी कथा सुनाई और मुनि से मदद मांगी। मार्कण्डेयजी ने उसे समझाया—“हे यक्ष! तुम सच बोल रहे हो। इसलिए मैं तुम्हें कल्याणकारी व्रत का उपदेश देता हूँ। आषाढ़ कृष्णपक्ष की ‘योगिनी’ एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पालन से तुम्हारी सभी बीमारियाँ दूर होंगी और पाप नष्ट होंगे।”

हेममाली ने मुनि के उपदेशानुसार योगिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत करने से उसका शारीरिक कष्ट समाप्त हुआ, कोढ़ दूर हो गई और वह पुनः स्वस्थ तथा प्रसन्नचित्त हो गया।

मुनि ने कहा—“जो व्यक्ति अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसी प्रकार का पुण्य फल उसे भी प्राप्त होता है, जो योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करता है। यह व्रत महान पापों को नष्ट करने वाला और पुण्य फल देने वाला है। इसे पढ़ने या सुनने मात्र से भी मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।”

योगिनी एकादशी व्रत श्रद्धा और विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख, शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल वर्तमान जीवन के लिए, बल्कि पूर्व जन्मों के पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं और यह योगनिद्रा चार मास तक रहती है। इस दौरान संसार की समस्त व्यवस्थाएँ भगवान शिव के रुद्र अवतार संभालते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) तक विवाह, यज्ञोपवित और बड़े मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इस समय को साधना, व्रत, कथा-श्रवण और तीर्थयात्रा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत करता है, उसे अवश्य ही देवशयनी एकादशी की कथा सुननी और करनी चाहिए। कथा-श्रवण और व्रत का पालन किए बिना यह व्रत अपूर्ण माना जाता है। इस व्रत के प्रभाव से भक्त के सभी कष्ट दूर होते हैं, पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि तथा मनोकामना-पूर्ति होती है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया – “हे माधव! आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसका महत्व क्या है और इसे करने की विधि क्या है? कृपया मुझे इसका ज्ञान दीजिए।” तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए कहा – “हे राजन्! यह कथा बहुत पावन है। इसे एक समय ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को सुनाया था। वही कथा आज मैं तुम्हें सुनाता हूँ।”

एक समय नारदजी ने ब्रह्माजी से जिज्ञासा प्रकट की और पूछा – आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का क्या नाम है और इसका क्या महत्व है?” तब ब्रह्माजी ने कहा – “सतयुग में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य की प्रजा बहुत सुखी और संपन्न थी। परंतु अचानक एक समय ऐसा आया जब राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। पूरे तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। खेत सूख गए, जलस्रोत सूख गए और प्रजा भूख-प्यास से पीड़ित होने लगी। यज्ञ, हवन, कथा, व्रत और दान जैसे धर्मकर्म भी रुक गए। चारों ओर हाहाकार मच गया और प्रजा राजा के पास अपनी पीड़ा लेकर पहुँची।”

राजा मान्धाता स्वयं भी इस स्थिति से दुखी थे। उन्होंने सोचा – “मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है जो मेरे राज्य में इतनी बड़ी विपत्ति आ गई?” समाधान खोजने की इच्छा से राजा अपने सैनिकों सहित जंगल की ओर चल पड़े। वहाँ वे घूमते-घूमते ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुँचे और उन्हें प्रणाम किया। राजा ने निवेदन करते हुए कहा – “हे महात्मन्! मैं सदा धर्म का पालन करता हूँ, फिर भी मेरे राज्य में यह भयंकर दुर्भिक्ष क्यों पड़ा है? कृपया इसका कारण बताइए और कोई उपाय बताइए।”

महर्षि अंगिरा ने उत्तर दिया – “राजन्! सतयुग धर्म प्रधान युग है। इसमें छोटे से छोटे पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। इसी कारण वर्षा रुक गई है। जब तक वह तपस्वी जीवित रहेगा, तब तक यह अकाल दूर नहीं होगा। उसका अंत करने से ही दुर्भिक्ष समाप्त हो सकता है।”

यह सुनकर राजा मान्धाता धर्मसंकट में पड़ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा – “हे ऋषिवर! मैं किसी निरपराध तपस्वी का वध कर दूँ, यह धर्म के विपरीत है। कृपा कर कोई और उपाय बताइए।” तब महर्षि अंगिरा ने कहा – “हे राजन्! यदि आप आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करेंगे तो उसके प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।” इसके बाद राजा मान्धाता राजधानी लौट आए और समस्त प्रजा के साथ मिलकर विधिपूर्वक पद्मा अर्थात् देवशयनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से राज्य में घनघोर वर्षा हुई, नदियाँ और तालाब जल से भर गए, खेत हरे-भरे हो गए और प्रजा पुनः सुखी हो गई।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन आता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं। इस व्रत से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते हैं, सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

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