कामिका एकादशी

कामिका एकादशी

सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना और व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी का व्रत करने वाला भक्त विष्णु लोक को प्राप्त करता है और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु को विशेष रूप से पीले फूल, फल, तुलसी पत्र और पीले वस्त्र अर्पित करने का विधान है।शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस व्रत की कथा का श्रवण एवं पाठ करना अनिवार्य है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस कथा को सुनता है, उसे मात्र कथा सुनने से ही यज्ञ के बराबर फल प्राप्त हो जाता है।

कामिका एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल की बात है। एक गाँव में एक क्षत्रिय रहता था। वह पराक्रमी तो था परंतु स्वभाव से क्रोधी भी था। एक दिन मार्ग में उसकी किसी बात को लेकर एक ब्राह्मण से कहासुनी हो गई। विवाद इतना बढ़ा कि क्षत्रिय ने क्रोधावेश में आकर ब्राह्मण को धक्का दे दिया। दुर्भाग्यवश, ब्राह्मण गिर पड़ा और उसी समय उसकी मृत्यु हो गई।

इस घटना के पश्चात क्षत्रिय के हृदय में गहरा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण के अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था की और ग्रामवासियों से क्षमा भी माँगी। किंतु गाँव के पंडितों ने स्पष्ट कह दिया

“तुम पर ब्रह्महत्या का दोष है। जब तक इसका प्रायश्चित नहीं करोगे, तब तक हम तुम्हारे साथ किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में सम्मिलित नहीं होंगे।”

यह सुनकर क्षत्रिय अत्यंत चिंतित हो गया। उसने बार-बार प्रार्थना की कि उसे ऐसा उपाय बताया जाए जिससे वह इस पाप से मुक्त हो सके। तब विद्वान ब्राह्मणों ने कहा –

“यदि तुम सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे कामिका एकादशी कहा जाता है, का व्रत श्रद्धापूर्वक करो, भगवान विष्णु की आराधना करो, तुलसीदल अर्पित करो, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दो, तो अवश्य ही तुम्हारे पाप नष्ट हो जाएंगे।”

क्षत्रिय ने उसी क्षण निश्चय किया कि वह व्रत करेगा। नियमानुसार उसने उपवास रखा, भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की, तुलसीदल अर्पित किए और संपूर्ण रात्रि हरिनाम का कीर्तन करते हुए जागरण किया।

उस रात्रि स्वप्न में उसे स्वयं भगवान विष्णु के दर्शन हुए। भगवान प्रसन्न होकर मुस्कराए और बोले –

“हे वत्स! तुमने सच्चे मन से प्रायश्चित किया है। तुम्हारी भक्ति और निष्ठा से मैं प्रसन्न हूँ। अब तुम ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गए हो।”

प्रातः जब क्षत्रिय जागा तो उसका हृदय हल्का और शांत था। ग्रामवासियों ने भी उसकी तपस्या और श्रद्धा को देखकर उसे पुनः समाज में स्वीकार कर लिया।

तभी से कामिका एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। कहा जाता है कि इस व्रत की कथा केवल सुनने मात्र से ही यज्ञ के बराबर फल मिलता है और यदि इसे श्रद्धा से किया जाए तो मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उसे परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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