हाटकोटी मंदिर हिमाचल प्रदेश के जुब्बल क्षेत्र के हाटकोटी गाँव में स्थित है। यह मंदिर शिमला से लगभग 96 किलोमीटर की दूरी पर पब्बर नदी के किनारे स्थित है। यह प्राचीन मंदिर 10वीं शताब्दी में निर्मित किया गया था। मंदिर माता दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी रूप को समर्पित है। हाटकोटी मंदिर (Hatkoti Temple) में माता की प्रतिमा कांसे की बनी हुई है और देखने में अत्यंत सुंदर है। मंदिर का निर्माण हिमाचल की प्राचीन मीनार शैली में किया गया है, जिसमें मुख्य रूप से लकड़ी और पत्थर का उपयोग हुआ है।
हाटकोटी मंदिर का इतिहास || History Of Hatkoti Temple
माता हाटकोटी मंदिर (Hatkoti Temple) लगभग 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। मान्यताओं के अनुसार, एक ब्राह्मण परिवार में दो बहनें रहती थीं। दोनों बहनें बचपन से ही बहुत धार्मिक और दयालु थीं। उन्होंने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया और सन्यासी बन गईं। दोनों ने मिलकर एक प्रण लिया कि वे अलग-अलग जगहों पर जाकर लोगों की मदद करेंगी, उनके दुख-दर्द को सुनेंगी और उनकी समस्याओं का हल निकालने में मदद करेंगी।
इस नेक काम के लिए दोनों बहनें अलग-अलग रास्ते पर चल पड़ीं। छोटी बहन अपनी यात्रा करते हुए हाटकोटी नाम के एक छोटे से गाँव में पहुँची। यह गाँव बहुत ही शांत और सुंदर था। यहाँ उस कन्या ने एक खुले खेत को अपने ध्यान के लिए चुना।
एक दिन वह कन्या ध्यान में बैठी थी। ध्यान करते-करते वह अचानक गायब हो गई, और जिस स्थान पर वह बैठती थी, वहाँ एक सुंदर पत्थर की मूर्ति दिखाई दी।
गाँव के लोग जब यह अनोखी बात देखी तो वे सभी हैरान रह गए। उनका मानना था कि यह कोई चमत्कार है और उस पवित्र कन्या में दैवीय शक्ति थी। इस अद्भुत घटना की खबर तुरंत जुब्बल के राजा तक पहुँचाई गई।
राजा साहब जब यह कहानी सुनी तो वे तुरंत खुद चलकर हाटकोटी गाँव आए। उन्होंने वह दिव्य मूर्ति देखी तो उनका दिल श्रद्धा से भर गया। राजा ने कहा कि वे मूर्ति के पैरों में सोना चढ़ाना चाहते हैं। जब मूर्ति के सामने ज़मीन खोदी गई तो एक और कमाल की बात हुई – वह गड्ढा दूध से भरने लगा।
इन दो चमत्कारों को देखकर राजा को पूरा यकीन हो गया कि यह जगह बहुत ही पवित्र है। उन्होंने तुरंत वहाँ एक सुंदर मंदिर बनवाने का आदेश दिया। तब से गाँव के लोगों ने उस कन्या को देवी माँ का रूप माना और गाँव के नाम पर उन्हें ‘हाटेश्वरी देवी’ कहकर पूजना शुरू कर दिया।
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हाटकोटी मंदिर ताम्र कलश की कथा || Story of the Copper Kalash at Hatkoti Temple
हाटकोटी मंदिर (Hatkoti Temple) के मुख्य दरवाजे पर एक तांबे का बड़ा बर्तन लोहे की मोटी जंजीर से बंधा हुआ है जिसे स्थानीय भाषा में ‘चरू’ कहते हैं। लोगों का मानना है कि इस जंजीर का दूसरा छोर माँ हाटेश्वरी के पैरों से जुड़ा है। सावन-भादों में जब पब्बर नदी में तेज बाढ़ आती है तो यह चरू सीटी जैसी आवाजें निकालता है और नदी की तरफ भागने की कोशिश करता है, इसलिए इसे जंजीर से बांधा गया है। पुराने समय में यहाँ दो चरू थे लेकिन एक चरू अपनी जंजीर तोड़कर नदी में भाग गया था, सिर्फ एक को पुजारी ने बचाया। इस चरू की सबसे अनोखी बात यह है कि जब आसपास के गाँवों में बड़े त्योहार, शादी-विवाह या यज्ञ होते थे तो लोग इसे ले जाकर इसमें हलवा और पकवान रखते थे। कितने भी लोगों को खाना दिया जाए, चरू का भोजन कभी खत्म नहीं होता था। ऐसे चरू हिमाचल के कई पहाड़ी मंदिरों में देखे जाते हैं और इन्हें बहुत पवित्र माना जाता है।
पांडवों से संबंधित इतिहास || History Related to the Pandavas
पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान कुछ दिन यहाँ बिताए थे। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर में स्थित कुछ स्मारक पांडवों द्वारा बनाए गए थे। मंदिर के अंदर पत्थर से बने हुए पाँच छोटे मंदिर हैं, जिन्हें “देवल” कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, पांडवों ने इन्हीं के अंदर बैठकर देवी की आराधना की थी।
मन्नतें पूरी होने पर चढ़ते हैं सिक्के – हाटकोटी मंदिर की परंपरा
हाटकोटी मंदिर के गर्भगृह का दरवाजा सिक्कों से जड़ा हुआ है। यहाँ बहुत से लोग आकर माता से प्रार्थना करते हैं और मन्नत मांगते हैं। जब उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है तो वे खुशी में आकर द्वार पर सिक्के ठोकते हैं। इसी वजह से पूरा दरवाजा सिक्कों से भरा हुआ दिखता है।
कैसे पहुंचें हाटकोटी मंदिर || how to reach hatkoti temple
हाटकोटी मंदिर जाने के लिए दो मुख्य सड़क के रास्ते हैं। पहला रास्ता शिमला-रोहड़ू सड़क से है जो थियोग, खारा, पत्थर और कोटखाई होकर जाता है। दूसरा और ज्यादा पसंदीदा रास्ता देहरादून-हाटकोटी सड़क है जो टिउणी, चकराता, देवबन और आराकोट से होकर गुजरता है।
हवाई जहाज से
सबसे नजदीकी हवाई अड्डा शिमला एयरपोर्ट है।
रेल मार्ग से
सबसे पास की रेलवे स्टेशन शिमला है जो कालका से नैरो गेज ट्रेन के जरिए जुड़ा हुआ है।
शिमला जिले के प्रमुख तीर्थ स्थल || Major Pilgrimage Sites of Shimla District
- काली बाड़ी मंदिर
- संकट मोचन मंदिर
- जाखू मंदिर
- धिंगू माता (Dhingu Mata) मंदिर
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