शिमला की सुंदर पहाड़ियों में स्थित काली बाड़ी मंदिर (Kali Bari Shimla), हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने मंदिरो में से एक है। इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1823 में जाखू पहाड़ी पर रोथनी कैसल के निकट एक बंगाली ब्राह्मण राम चरण ब्रह्मचारी द्वारा की गई थी। यह मंदिर कोलकाता की प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर काली माता को समर्पित है। यहाँ पूजा-पाठ भी बंगाल की परंपरा और दक्षिणेश्वर मंदिर की विधि के अनुसार की जाती है
बाद में अंग्रेजों द्वारा इस मंदिर को बैंटनी हिल में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्ष 1902 में गठित मंदिर ट्रस्ट में मुख्य रूप से बंगाली समुदाय के सदस्य शामिल हैं, जो आज भी इस सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की सेवा और देखभाल कर रहे हैं।
मंदिर की वास्तुकला और निर्माण
काली बाड़ी मंदिर की रूप रेखा पूर्व भारत की देउला वास्तुशैली पर आधारित है और कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर से प्रेरित है। मंदिर में पारंपरिक हिंदू स्थापत्य शैली दिखाई देती है जो इसे शिमला के अन्य मंदिरों से अलग बनाती है।

शिमला का नाम पड़ा माता श्यामला देवी के नाम पर
‘श्यामला’ का अर्थ होता है — श्याम वर्ण वाली या काले रंग की। यह माँ काली का शांत, सौम्य और कृपालु स्वरूप है, जिसे शिमला और आसपास के लोग बड़ी श्रद्धा और आस्था से पूजते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन समय में इस क्षेत्र को ‘श्यामला’ कहा जाता था। समय के साथ यह नाम परिवर्तित होकर ‘शिमला’ बन गया। यानी हिमालय की गोद में बसे इस हिल स्टेशन का नाम भी देवी की कृपा और उपस्थिति से जुड़ा हुआ है।
काली बाड़ी शिमला (Kali Bari Shimla) वही पवित्र स्थान है जो माता श्यामला देवी को समर्पित है। यह मंदिर न केवल शहर की आध्यात्मिक पहचान है, बल्कि यह शिमला को एक पवित्र तीर्थस्थल का दर्जा भी देता है।
नवरात्र का विशेष उत्सव
इस मंदिर में मनाए जाने वाले नवरात्रों की एक खासियत यह है कि यहां पर जो मूर्तियां बनाई जाती है उसके लिए कारीगर विशेष रूप से बंगाल से पहुंचते हैं।
मूर्ति निर्माण की अनूठी परंपरा
इन दिव्य मूर्तियों को बनाने में कारीगरों को लगभग 15 दिन का समय लगता है, लेकिन यह सिर्फ एक कला नहीं, एक तपस्या होती है। मूर्ति निर्माण के दौरान कई कारीगर व्रत रखते हैं – न कुछ खाते हैं, न कोई सांसारिक चीज़ों में लिप्त होते हैं।
सबसे खास बात होती है माता की आंखों का निर्माण, जिसे आख़िरी चरण में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जैसे ही आँखें बनती हैं, देवी की मूर्ति में प्राण आ जाते हैं — और वो केवल मिट्टी की मूर्ति नहीं रह जाती, बल्कि जीवंत प्रतीत होती है।
वेश्यालय की मिट्टी की परंपरा
दुर्गा प्रतिमा के निर्माण में वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग एक पुरानी और विशेष परंपरा है। इसे बिना शामिल किए मूर्ति अधूरी मानी जाती है। इस परंपरा के पीछे एक मान्यता है — प्राचीन समय में एक वेश्या माँ दुर्गा की सच्ची भक्त थी, लेकिन समाज उसे मंदिर में प्रवेश नहीं करने देता था।
अपमान से आहत होकर उसने माँ दुर्गा से प्रार्थना की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने आशीर्वाद दिया कि हर साल नवरात्रि में बनने वाली मेरी प्रतिमा वेश्यालय की मिट्टी से ही बनेगी, ताकि किसी भी भक्त को उसके पेशे या सामाजिक स्थिति के आधार पर छोटा न समझा जाए।
दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए परंपरागत रूप से चार मुख्य चीज़ों का प्रयोग किया जाता है:
- गंगा तट की मिट्टी – शुद्धता का प्रतीक
- गोमूत्र – पवित्रता और औषधीय गुणों के लिए
- गोबर – धार्मिक शुद्धिकरण के लिए
- वेश्यालय की मिट्टी – यह दर्शाती है कि माँ हर भक्त को अपनाती हैं, चाहे वह किसी भी स्थान या स्थिति से जुड़ा हो
इन सभी चीज़ों को मिलाकर बनाई गई मूर्ति को ही पूर्ण और पूजनीय माना जाता है। ये रस्म कई वर्षों से चली आ रही है। इस पूरी रस्म के दौरान सबसे ज्यादा आश्चर्य में डालने वाली बात है अपवित्र माने जाने वाले वेश्यालय की मिट्टी से पवित्र दुर्गा मूर्ति का निर्माण करना। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर की नजर में कोई भी स्थान या व्यक्ति अपवित्र नहीं है।
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महाविद्याओं के अनमोल चित्र
काली बाड़ी मंदिर (Kali Bari Shimla) में आज भी 10 महाविद्याओं के दुर्लभ तेल चित्र मौजूद हैं, जिन्हें प्रसिद्ध कलाकार सनत कुमार चटर्जी ने बनाया था। इन चित्रों में माँ के दसों महाविद्या रूपों को बेहद खूबसूरती और भावपूर्ण तरीके से दर्शाया गया है।
एक बार जर्मनी से आए कुछ विद्वानों ने इन चित्रों को देखकर सनत कुमार चटर्जी को ब्लैंक चेक की पेशकश की थी, ताकि वे इन चित्रों को खरीद सकें। लेकिन चटर्जी जी ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि “महाविद्याओं के ये चित्र मेरे लिए धन का नहीं, आस्था और भक्ति का विषय हैं।”
इसके बाद उन्होंने इन सभी चित्रों को काली बाड़ी मंदिर को भेंट कर दिया, जहाँ ये आज भी दर्शनार्थियों के लिए खुले हैं।
महाविद्याएँ देवी के ऐसे रूप हैं जो ज्ञान, शक्ति और ब्रह्मांडीय रहस्यों से परिपूर्ण हैं। “महाविद्या” का अर्थ है — महान ज्ञान या ब्रह्मांड की प्रचंड ऊर्जा, जिसमें सृष्टि की समस्त शक्तियाँ समाहित होती हैं। सनत कुमार चटर्जी द्वारा बनाए गए ये चित्र न केवल कला की दृष्टि से अद्भुत हैं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान माने जाते हैं।
मंदिर तक कैसे पहुंचें || How to Reach Kali Bari Temple, Shimla?
काली बाड़ी मंदिर शिमला पुराने बस स्टैंड से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ पहुंचने के लिए आप पैदल मार्ग का चयन कर सकते हैं, जो शांति भरा और सुंदर अनुभव देता है।
मॉल रोड से यह मंदिर थोड़ी दूरी पर है, लेकिन वहाँ से भी आप आसानी से पैदल चलकर मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
यदि आप पैदल नहीं जाना चाहते, तो HRTC टैक्सियाँ भी आसानी से उपलब्ध हैं, जो आपको मंदिर के निकट तक पहुँचा देती हैं।
मंदिर परिसर से शिमला के खूबसूरत पहाड़ी नजारे भी देखने को मिलते हैं, जो यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के अनुभव को और भी खास बना देते हैं।
सांस्कृतिक एकता का प्रतीक
काली बाड़ी शिमला (Kali Bari Shimla) आज भी बंगाली और हिमाचली संस्कृति के मेल का अद्भुत उदाहरण है। यह मंदिर दिखाता है कि कैसे विभिन्न संस्कृतियां एक साथ मिलकर एक सुंदर परंपरा का निर्माण कर सकती हैं। 202 साल का यह मंदिर आज भी हजारों भक्तों की आस्था का केंद्र है और भविष्य में भी रहेगा।
यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता का जीवंत प्रमाण है। यहां आने वाला हर व्यक्ति न केवल आध्यात्मिक शांति पाता है बल्कि एक अनमोल इतिहास का भी हिस्सा बनता है।
काली बाड़ी के पास स्थित प्रमुख तीर्थ स्थल
- जाखू मंदिर
- संकट मोचन मंदिर
- तारा देवी मंदिर
- धिंगू माता मंदिर
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