मासिक दुर्गाष्टमी व्रत कथा
मासिक दुर्गाष्टमी व्रत क्या है?
हर महीने आने वाली अष्टमी तिथि को माँ दुर्गा की पूजा और व्रत किया जाता है, जिसे मासिक दुर्गाष्टमी व्रत कहा जाता है।यह व्रत देवी दुर्गा को समर्पित होता है और मान्यता है कि इसे श्रद्धा से करने पर नवरात्रि व्रत के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।भक्त इस दिन उपवास रखते हैं, माँ का ध्यान करते हैं और उनसे शक्ति, सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
मासिक दुर्गाष्टमी की व्रत कथा
बहुत पुराने समय की बात है। एक राक्षस था जिसका नाम था दंभ, उसके घर एक बेटा पैदा हुआ — महिषासुर। बचपन से ही महिषासुर के मन में अमर होने की बहुत इच्छा थी। इसी इच्छा को पूरा करने के लिए उसने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या शुरू कर दी।
ब्रह्मा जी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और बोले, “वर मांगो!” महिषासुर ने बिना कुछ सोचे कहा, “मुझे अमर कर दीजिए।”
ब्रह्मा जी ने समझाया, “बेटा, अमरता संभव नहीं है। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है।” तब महिषासुर ने चालाकी से कहा, “अगर ऐसा है, तो ऐसा वरदान दीजिए कि मेरी मृत्यु किसी स्त्री के हाथों ही हो। कोई देवता, मनुष्य या राक्षस मुझे न मार सके।”
ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया।
अब वरदान मिलते ही महिषासुर घमंड में चूर हो गया। उसे लगा कि कोई स्त्री उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उसने चारों दिशाओं में युद्ध छेड़ दिया — पहले पृथ्वी, फिर पाताल, और अंत में स्वर्ग लोक पर हमला कर इन्द्र देव को भी हरा दिया। अब वह स्वर्ग का राजा बन बैठा।
चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। कोई भी उसे रोक नहीं पा रहा था। तब सभी देवी-देवता मिलकर त्रिदेवों — ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे और सहायता मांगी।
भगवान विष्णु ने सलाह दी कि अब माँ शक्ति ही महिषासुर का अंत कर सकती हैं।
इस पर सभी देवताओं ने अपने-अपने तेज से एक शक्तिशाली देवी को उत्पन्न किया। इसी दिव्य तेज से प्रकट हुईं माँ दुर्गा — अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और रौद्र रूप वाली। हिमवान ने उन्हें सवारी के लिए सिंह दिया, और सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने शस्त्र भेंट किए।
माँ दुर्गा जब स्वर्ग पहुंचीं तो महिषासुर उन्हें देख कर मोहित हो गया। उसने अपने दूत के ज़रिए माँ दुर्गा को विवाह का प्रस्ताव भेजा। यह सुनकर माँ बहुत क्रोधित हो गईं और महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा।
वरदान के घमंड में अंधा महिषासुर युद्ध के लिए तैयार हो गया।
फिर शुरू हुआ एक भयंकर युद्ध। नौ दिनों तक माँ दुर्गा और महिषासुर के बीच भीषण संग्राम चलता रहा। माँ दुर्गा ने उसकी पूरी सेना का संहार कर दिया। महिषासुर ने कई बार अपना रूप बदलकर माँ को छलने की कोशिश की, लेकिन माँ हर बार उस पर भारी पड़ीं।
अंततः, माँ दुर्गा ने अपने चक्र से महिषासुर का सिर काट दिया और उसे मार गिराया।
इस तरह माँ दुर्गा ने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोक को महिषासुर के अत्याचार से मुक्त कराया। माना जाता है कि जिस दिन महिषासुर का वध हुआ, उसी दिन से ‘दुर्गा अष्टमी’ का पर्व मनाया जाने लगा।
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