वट सावित्री व्रत कथा

ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागन स्त्रियां वटवृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं। मान्यता है कि इसी वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लिए थे। इस कारण इस दिन व्रत और पूजा का बहुत महत्व होता है। बहुत समय पहले की बात है। एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा – “हे प्रभु! मुझे कोई ऐसी कथा सुनाइए जो स्त्रियों के लिए शुभ हो, पतिव्रता धर्म को मजबूत करने वाली हो और सौभाग्य देने वाली हो।” तब भगवान शिव ने वट सावित्री व्रत की कथा सुनाई।

शिवजी बोले – “बहुत समय पहले मद्र देश में अश्वपति नाम के राजा राज्य करते थे। वे धर्मप्रिय, न्यायी और प्रजा के प्रिय थे, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। उन्होंने देवी सावित्री की तपस्या शुरू की। कई वर्षों तक भक्ति करने के बाद देवी सावित्री ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि उन्हें एक तेजस्वी पुत्री प्राप्त होगी।”

कुछ समय बाद रानी ने एक सुंदर और गुणवान कन्या को जन्म दिया, जिसे सावित्री नाम दिया गया। वह बड़ी होकर बहुत ही सुंदर, तेजस्वी और गुणवान बनी। जब वह विवाह योग्य हुई तो राजा ने कहा – “बेटी, तुम अपने लिए स्वयं वर चुन सकती हो।” तब सावित्री कुछ विद्वान मंत्रियों के साथ वन भ्रमण पर निकली और उसने सत्यवान को अपना पति चुना।

सत्यवान एक निष्कासित राजा द्युमत्सेन का पुत्र था और अपने नेत्रहीन पिता के साथ वन में रहता था। जब सावित्री ने अपने वर के रूप में सत्यवान का नाम बताया, तो वहां मौजूद देवर्षि नारद ने कहा – “सत्यवान बहुत अच्छा युवक है, लेकिन वह अल्पायु है। एक साल बाद उसकी मृत्यु निश्चित है।” सावित्री ने यह सुनकर भी कहा – “मैंने उसे एक बार वर चुना है, अब कोई दूसरा नहीं हो सकता।”

फिर सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया और सावित्री उसके साथ वन में रहने लगी। नारद मुनि की बात याद रखते हुए वह हर दिन की गिनती करती रही। जब सत्यवान की मृत्यु में केवल तीन दिन बचे, तब सावित्री ने उपवास का संकल्प लिया और वटवृक्ष के नीचे बैठकर व्रत और पूजा की।

तीसरे दिन वह अपने पति के साथ लकड़ी लेने वन में गई। वहां सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में लेट गया। तभी सावित्री ने देखा कि एक तेजस्वी पुरुष, पीले वस्त्रों में, मुकुट पहने हुए वहां आए। उन्होंने बताया कि वे यमराज हैं और सत्यवान की आत्मा लेने आए हैं।

यमराज ने सत्यवान की आत्मा को अंगूठे के आकार में निकालकर दक्षिण दिशा की ओर चलना शुरू किया। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने कई बार रोका, लेकिन सावित्री ने हर बार विनम्रता से कहा – “जहां मेरे पति जाएंगे, वहीं मैं भी जाऊंगी। पत्नी का धर्म है कि वह अपने पति का साथ न छोड़े।”

सावित्री की भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने कहा – “मांगो, तुम्हें जो वरदान चाहिए।” सावित्री ने पहला वरदान मांगा – “मेरे सास-ससुर की आंखों की रोशनी लौट आए।”

थोड़ा आगे बढ़ने पर यमराज ने फिर वरदान मांगने को कहा।

सावित्री बोली – “मेरे ससुर को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिले।”

यमराज बोले – “तथास्तु।”

अंत में तीसरी बार वर मांगने पर सावित्री ने कहा – “मुझे सत्यवान से उत्पन्न सौ पुत्रों का वर दीजिए।” यमराज मुस्कुरा दिए और बोले – “तथास्तु।” लेकिन तभी उन्हें ध्यान आया कि ये वर तभी पूरा हो सकता है जब सत्यवान जीवित हो।

अपनी ही बात में फंसकर यमराज ने सत्यवान को जीवनदान दे दिया और कहा – “हे पतिव्रता स्त्री! तुम्हारी भक्ति, तप और सच्चे प्रेम ने मुझे भी पराजित कर दिया। तुम्हारा दांपत्य जीवन लंबा और सुखमय हो – यही मेरा आशीर्वाद है।”

सावित्री सत्यवान को लेकर आश्रम लौटी। वहां देखा कि उनके सास-ससुर की आंखों की रोशनी लौट आई है और उनका राज्य भी उन्हें वापस मिल गया है। समय के साथ सावित्री को सौ पुत्रों की प्राप्ति भी हुई। इस प्रकार सावित्री पतिव्रता नारी की सबसे श्रेष्ठ मिसाल बन गईं और वट सावित्री व्रत की परंपरा चल पड़ी।

यमराज ने कहा – “तथास्तु।”

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